एक चूल्हा, एक दिल
सुबह के सात बजे थे।
रसोई में कुकर की सीटी, तवे की छन-छन और चाय की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी।
रीता जल्दी-जल्दी नाश्ता बना रही थी।
“आज तो सब बोलेंगे—वाह रीता बहु, क्या नाश्ता बनाया है,”
खुद से ही मुस्कुराते हुए उसने पराठों में मक्खन लगाया।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“रीता, जरा जल्दी करो। बच्चों को स्कूल जाना है।”
ये आवाज़ थी उसकी जेठानी सुनीता की।
“बस बन ही गया,”
रीता ने थोड़ा रूखे स्वर में जवाब दिया।
नाश्ते की मेज़ पर सब बैठ गए।
बच्चे खाने लगे, ससुर जी अख़बार पढ़ रहे थे, और सास कमला देवी चुपचाप सबको देख रही थीं।
“अरे, आज आलू के पराठे?”
सुनीता ने कहा,
“कल ही तो बने थे। कुछ अलग नहीं बन सकता था?”
रीता को बुरा लगा।
“आपने ही तो कहा था कि बच्चों को आलू पसंद है,”
उसने धीरे से कहा।
“हर बार बच्चों का नाम लेकर अपनी पसंद का ही खाना बनाती हो,”
सुनीता ताना मार बैठी।
यहीं से बात बिगड़ने लगी।
दिन बीतते गए।
कभी नमक कम, कभी तेल ज़्यादा—
हर बात पर तकरार होने लगी।
“आज सब्ज़ी क्यों नहीं बनी?”
“मैं ही रोज़ क्यों बनाऊँ?”
“आप घर पर रहती हैं, मैं भी तो काम करती हूँ!”
रसोई अब सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं रही थी,
वो बहस का मैदान बन गई थी।
एक दिन सुनीता गुस्से में बोली—
“मां जी, अब मुझसे नहीं होता।
मुझे अलग रसोई चाहिए।”
रीता भी चुप कहाँ रहने वाली थी—
“मुझे भी।
कम से कम चैन से अपनी मर्ज़ी का खाना तो बनाऊँगी।”
कमला देवी अवाक् रह गईं।
“एक ही घर में दो रसोई?”
उन्होंने भारी मन से कहा,
“ये सही नहीं है बहुओं…”
लेकिन दोनों बहुओं ने एक न सुनी।
अलग रसोई, अलग परेशानियाँ...
घर के एक कोने में सुनीता ने चूल्हा जमा लिया।
रीता ने स्टोर रूम में अपनी रसोई बना ली।
शुरुआत में दोनों खुश थीं।
“अब कोई टोका-टोकी नहीं,”
रीता ने राहत की साँस ली।
“अब मेरी रसोई, मेरे नियम,”
सुनीता भी संतुष्ट थी।
लेकिन ये खुशी ज़्यादा दिन नहीं चली।
कभी दाल बनी तो चावल नहीं।
कभी सब्ज़ी थी तो रोटी नहीं।
“आज फिर बाहर से खाना?”
रीता के पति थककर बोले।
“सुबह से काम कर रही हूँ,
अब मुझसे नहीं होगा,”
रीता झुंझला गई।
उधर सुनीता के यहाँ भी हाल बुरा था।
“रोज़ खिचड़ी?”
उसके बच्चे मुँह बना लेते।
“इतना सब अकेले कैसे बनाऊँ?”
सुनीता खुद से ही बड़बड़ाती।
जब सच्चाई सामने आई...
एक दिन घर में पूजा रखी गई।
मेहमान आने वाले थे।
कमला देवी ने साफ कहा—
“आज सब मिलकर खाना बनेगा।”
दोनों बहुएँ चुप रहीं,
लेकिन काम देखकर हाल बेहाल हो गया।
रीता से हलवा नहीं संभल रहा था।
सुनीता की सब्ज़ी जलने लगी।
तभी रीता बोली—
“अगर हम साथ होते,
तो इतना मुश्किल नहीं होता…”
सुनीता ने पहली बार उसकी बात मानी।
“शायद… हम दोनों जिद में गलत कर बैठे।”
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
बिना कुछ कहे काम बाँट लिया।
पूजा का खाना समय पर बन गया।
मेहमानों ने तारीफ की।
“बहुओं, आज खाने में बहुत प्यार है,”
एक बुज़ुर्ग महिला बोली।
कमला देवी की आँखें भर आईं।
रात को सुनीता ने कहा—
“रीता, माफ करना।
मैंने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।”
रीता मुस्कुराई—
“गलती मेरी भी थी।
अलग होकर सुकून नहीं,
साथ होकर समझदारी मिलती है।”
अगले ही दिन
दोनों की रसोई फिर एक हो गई।
सीख:
घर दीवारों से नहीं,
दिलों से बनता है।
रसोई अलग करने से
बर्तन तो बंट सकते हैं,
पर रिश्ते नहीं।
जब काम बाँटा जाए,
तो बोझ हल्का हो जाता है।
और जब मन बाँटा जाए,
तो घर स्वर्ग बन जाता है।

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