अमीर सहेली, गरीब सहेली और एक अधूरा करवाचौथ
गांव के आख़िरी छोर पर बनी कच्ची-पक्की बस्ती में राधा अपनी मां के साथ रहती थी। टीन की छत, मिट्टी की दीवारें और बरसात में टपकता हुआ पानी—यही उसकी दुनिया थी। मां घर-घर बर्तन मांजती थी और राधा पास के स्कूल में पढ़ाती थी। ज़िंदगी कठिन थी, लेकिन राधा के चेहरे की मुस्कान कभी फीकी नहीं पड़ती थी।
राधा की सबसे अच्छी सहेली थी साक्षी—शहर के सबसे बड़े व्यापारी की बेटी। बड़ा-सा मकान, कार, नौकर-चाकर, सब कुछ था उसके पास। लेकिन साक्षी का दिल उतना ही सादा था, जितनी राधा की दुनिया।
दोनों की दोस्ती ऐसी थी जैसे धूप और छांव—अलग होते हुए भी एक-दूसरे के बिना अधूरी।
एक रात की कॉल...
उस रात राधा मां के पास ज़मीन पर बिछे पुराने गद्दे पर लेटी थी। अचानक मोबाइल की घंटी बजी।
“इतनी रात कौन…?”
स्क्रीन पर नाम चमका—साक्षी
“हैलो साक्षी, सब ठीक तो है? आवाज़ कांप क्यों रही है?”
“अरे पगली, डर गई क्या? मुझे नींद नहीं आ रही थी… सोचा तुझे कॉल कर लूं।”
राधा मुस्कुरा दी।
“जान निकाल दी थी तूने।”
थोड़ी देर बाद साक्षी बोली—
“राधा, अजय ने कहा है कि इस साल करवाचौथ का व्रत रखूं। शादी तो तय है, पर अभी हुई नहीं…”
“तो रख ले ना,” राधा बोली, “दिल से रिश्ता है तो रस्म में क्या बुराई?”
“बस… तू कल आकर मुझे तैयार कर देना। तेरे बिना तो मेरा मन ही नहीं लगेगा।”
अगले दिन राधा साक्षी के घर पहुंची। कंगन, बिंदी, साड़ी—सब कुछ उसने अपने हाथों से पहनाया।
“आज तो दुल्हन से कम नहीं लग रही,” राधा हँसी।
तभी साक्षी की होने वाली सास, कमला देवी, कमरे में आईं।
ऊपर से नीचे तक राधा को देखा और ठंडी आवाज़ में बोलीं—
“साक्षी, इन लोगों से थोड़ा दूरी रखा करो। गरीब लोग बस फायदा उठाना जानते हैं।”
राधा के कानों में जैसे सीसा घुल गया। बिना कुछ कहे वो चुपचाप निकल आई।
दो रास्ते, दो ज़िंदगियाँ...
कुछ महीनों बाद शादी हो गई। साक्षी बड़े ठाठ से बहू बनकर उस घर में आई।
उसी घर में राधा भी आई—लेकिन देवरानी बनकर।
साक्षी को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।
“राधा… तू?”
“हां साक्षी… मैं और राहुल एक-दूसरे से प्यार करते हैं।”
पर साक्षी का दिल टूट चुका था।
“तूने मेरे साथ धोखा किया,” कहकर उसने मुंह फेर लिया।
कमला देवी को तो जैसे मौका मिल गया।
ऊपर का आलीशान हिस्सा साक्षी को मिला और नीचे का सीलन भरा कमरा राधा को।
करवाचौथ आया।
ऊपर झूमर की चमक थी, रंग-बिरंगी लाइटें जगमगा रही थीं, मेहमानों की चहल-पहल और पकवानों की खुशबू पूरे माहौल को उत्सव में बदल रही थी।
नीचे एक कोने में रखा जलता हुआ दीया, चौथ माता की छोटी-सी तस्वीर और सन्नाटे से भरा खाली कमरा था।
साक्षी नीचे आई और ताने मारते हुए बोली—
“ये बचा हुआ प्रसाद है। फेंकने से अच्छा है, तुम खा लो।”
राधा की आंखें भर आईं, पर कुछ बोली नहीं।
एक गिरावट, एक एहसास...
सीढ़ियों से जाते वक्त साक्षी का पैर फिसला।
धड़ाम—वो नीचे गिर पड़ी। खून बहने लगा।
सब घबरा गए, लेकिन सबसे पहले राधा दौड़ी।
रात भर अस्पताल में उसी ने उसका हाथ थामे रखा।
होश में आते ही साक्षी रो पड़ी—
“मुझे माफ कर दे राधा… मैंने दोस्ती नहीं निभाई।”
राधा मुस्कुरा दी—
“दोस्ती में हिसाब नहीं होता।”
नया सवेरा...
घर लौटने के बाद कमला देवी का दिल भी बदला।
नीचे का हिस्सा ठीक कराया गया।
दोनों बहुएं साथ रसोई में काम करने लगीं।
उस शाम, टूटी हुई दोस्ती फिर से जुड़ गई और दोनों ने साथ बैठकर करवाचौथ का व्रत खोला—
न कोई अमीर, न गरीब…
बस दो सहेलियाँ।
संदेश:
👉 रिश्ते पैसे से नहीं, दिल से निभते हैं।
👉 दोस्ती अगर सच्ची हो, तो टूटकर भी जुड़ जाती है।

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