मीठा बाँटना सीखो
सुबह के दस बजे थे। रसोई से घी की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। मालती जी बड़े मन से गोंद के लड्डू बना रही थीं। सर्दियाँ शुरू होते ही उनके घर में लड्डू बनना एक त्योहार जैसा माना जाता था।
उधर बहू अनुष्का आटा छान रही थी।
तभी मालती जी ने देखा कि अनुष्का काजू-बादाम को बारीक पीसने के लिए मिक्सर में डाल रही है।
“अरे बहू! ये क्या कर रही हो?”
मालती जी ने तुरंत टोका।
“काजू-बादाम ऐसे पूरी तरह पीसकर क्यों डाल रही हो? तेरे देवर रोहन को तो इनके टुकड़े बहुत पसंद आते हैं।"
अनुष्का मुस्कुराकर बोली—
“मम्मी जी, मुझे चबाने में दिक्कत होती है। इसलिए मैं अपने हिस्से में पिसा हुआ डाल दूँगी, और रोहन के लड्डू में टुकड़े ही रख दूँगी।”
“अरे कैसी बातें करती हो बहू!”
मालती जी ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा,
“ये दो किलो आटे के लड्डू मैं सिर्फ हम लोगों के लिए बना रही हूँ। तुझे खाने हैं तो तेरी माईके से बनवाकर ले आना। मैं भी तो अपनी बेटी कृतिका को भेजने के लिए बना रही हूँ।”
ये सुनते ही अनुष्का के हाथ रुक गए।
उसके मन में चुभन हुई, पर चुप रह गई।
घर के लड्डू, कौन खाए—कौन नहीं?...
अनुष्का को अपनी माँ की याद आ गई।
उनके घर में जब लड्डू बनते थे,
तो सबके लिए बनते थे—बहू, बेटी, बेटा, सब बराबर।
पर यहाँ…
उसने मिक्सर में डाले हुए काजू-बादाम वापस निकाल दिए और लड्डू बाँधने में मालती जी का हाथ बँटाने लगी।
लड्डू तैयार होकर स्टील के बड़े डिब्बे में भर दिए गए।
मालती जी उन्हें उठाकर अपने कमरे में रखते हुए बोलीं—
“ये हमारी तरफ के हैं। अलग से जो मैंने कृतिका के लिए बनवाए हैं, वो शाम को दे आउँगी।”
अनुष्का बस चुपचाप देखती रही।
छुपकर खाए गए काजू-बादाम...
शाम को अनुष्का का पति आदित्य ऑफिस से आया,
मालती जी उसे लेकर कृतिका के घर लड्डू दे आईं।
वापसी में ड्राइफ्रूट्स का पैकेट भी खरीद लाई।
पर जैसे ही घर आईं,
वो पैकेट रसोई में रखने के बजाय अपने कमरे में ले जाकर बंद कर दिया।
अनुष्का को शक हुआ कि जरूर कुछ खास है,
पर वह कुछ पूछ न सकी।
अगले दिन शाम को वह सब्जी पूछने मालती जी के कमरे में गई।
जैसे ही दरवाज़ा खुला, उसने देखा—
मालती जी एक कटोरी में काजू-बादाम खा रही थीं।
अनुष्का को देखते ही उन्होंने कटोरी पीछे छुपा दी।
“क्या काम है बहू?”
उन्होंने सामान्य बनने की कोशिश की।
अनुष्का बस बोली—
“कौन सी सब्जी बनाऊँ?”
“आलू-मटर बना ले… और आगे से कमरे में आने से पहले दरवाज़ा खटखटा कर आया कर।”
अनुष्का बिना कुछ बोले वापस आ गई।
सच्चाई सामने आती है...
रात को खाना खाते समय आदित्य बोला—
“अरे! आलू-मटर? मैंने तो काजू-करी कहा था।”
अनुष्का ने झुककर शांत स्वर में कहा—
“घर में काजू थे ही नहीं…”
आदित्य चौंका—
“क्या? कल ही तो मैं और मम्मी ड्राइफ्रूट्स लाए थे!”
अनुष्का ने हल्का सा व्यंग्य किया—
“मुझे तो नहीं दिखाई दिए। शायद कहीं… छुपा दिए होंगे।”
यह सुनकर आदित्य रुक गया।
उसने तुरंत मालती जी की ओर देखा—
“मम्मी… आपने बहू को बताया नहीं?”
मालती जी बगलें झाँकने लगीं।
दोबारा पूछने पर बोलीं—
“लाए थे बेटा… लेकिन मैं अपने कमरे में रख आई। कुछ चीजें नज़र से दूर होनी चाहिए। वर्ना नज़र लग जाती है।”
आदित्य की आँखों में हैरानी साफ दिख रही थी।
“नज़र? और वो भी बहू से?
मम्मी, ये घर में बाहर वाला कौन है?
अगर आप बहू से इतनी चीजें छुपाएँगी,
तो कल को बहू भी अपनी चीजें अपने कमरे में रखने लगेगी…
तब कैसा लगेगा आपको?”
मालती जी चुप हो गईं।
पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि वो गलत थीं।
कुछ देर बाद मालती जी उठीं,
रसोई में गईं और काजू-बादाम का पैकेट अलमारी से निकालकर वापस रसोई में ले आईं।
फिर अनुष्का की तरफ देखकर बोलीं—
“बहू… तुम भी तो घर की बेटी जैसी हो।
तुम्हारे लिए भी सर्दी के खास लड्डू बनाने हैं।
बताओ, किस तरह चाहिए?”
अनुष्का की आँखें चमक उठीं।
उसने धीमे से कहा—
“जैसे मुझे पसंद हैं… पिसे हुए काजू-बादाम वाले।”
मालती जी मुस्कुराईं—
“बस! आज ही बनाती हूँ।”
उस दिन पहली बार
अनुष्का ने महसूस किया कि
घर सिर्फ दीवारों से नहीं, दिलों के खुलने से बनता है।
कहानी का संदेश:
घर लड्डू बाँटने से नहीं,
अपनापन बराबर बाँटने से बनता है।
जहाँ बहू को “बाहर वाला” नहीं,
घर का अपना समझा जाए—
वहीं रिश्तों की असली मिठास बसती है।

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