खोई हुई चप्पल
सुबह का आसमान धूसर रंग में डूबा हुआ था।
न धूप पूरी निकली थी, न बादल खुले थे।
मीना ने खिड़की से बाहर देखा और लंबी साँस ली।
आज फिर देर हो रही थी।
“आरव… जल्दी करो बेटा, बस निकल जाएगी।”
अंदर कमरे में आरव स्कूल यूनिफॉर्म पहने खड़ा था।
एक जूता पहन चुका था, दूसरा हाथ में लिए बैठा था।
“मम्मी… ये पट्टी फिर ढीली हो गई।”
उसकी आवाज़ में डर था।
मीना झुकी और पट्टी ठीक करने लगी।
उसके हाथ काँप रहे थे—थकान से नहीं,
उस डर से जो रोज़ उसे जकड़ लेता था।
आरव को संतुलन की समस्या थी।
दौड़ना, सीढ़ियाँ चढ़ना, भीड़ में चलना—
हर चीज़ उसके लिए परीक्षा थी।
पहले…
जब अभय था—
तो मीना निश्चिंत रहती थी।
अब…
हर सुबह उसके जीवन की एक नई लड़ाई होती थी।
“ठीक है बेटा, अब चलो।”
घर से निकलते ही आरव का पैर फिसला।
चप्पल निकलकर सड़क किनारे जा गिरी।
“रुको!”
मीना चिल्लाई।
लेकिन भीड़ में वह चप्पल दिख ही नहीं रही थी।
बस स्टॉप पर लोग खड़े थे—
कोई मोबाइल में, कोई अख़बार में,
और कुछ लोग… बस देखने के लिए।
“एक चप्पल में कैसे जाएगा?”
किसी ने हँसते हुए कहा।
मीना का सिर झुक गया।
“कोई बात नहीं,”
उसने खुद को संभालते हुए कहा,
“मैं उठा लेती हूँ।”
लेकिन बस की आवाज़ सुनाई दी।
आरव ने उसका दुपट्टा कसकर पकड़ लिया।
“मम्मी… बस…”
मीना ने पल भर में फैसला लिया।
उसने आरव को गोद में उठाया।
“चलो।”
बस में चढ़ते वक्त उसका पैर लड़खड़ाया।
कंडक्टर झुँझलाया—
“मैडम, जल्दी कीजिए। रोज़ यही नाटक।”
मीना कुछ नहीं बोली।
आरव चुप था।
उसकी आँखों में वही पुराना सवाल—
क्या मैं गलत हूँ?
बस चल पड़ी।
आरव ने धीरे से पूछा,
“मम्मी… पापा होते तो…”
मीना ने खिड़की की ओर देखा।
उसने बात पूरी नहीं होने दी।
“पापा होते तो तुम्हें अपने कंधे पर बैठा लेते।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
थोड़ी दूर पर बस अचानक रुकी।
“किसी की चप्पल सड़क पर है!”
किसी ने चिल्लाया।
मीना का दिल धक से रह गया।
वह उतरी।
सड़क के किनारे वही नीली चप्पल थी।
और उसके पास एक आदमी खड़ा था।
वह आदमी…
उसकी पीठ…
वह कद…
मीना की आँखें भर आईं।
“अभय…”
नाम अपने-आप निकल गया।
आदमी पलटा।
अजनबी चेहरा।
मीना की दुनिया फिर ढह गई।
“माफ़ कीजिए…”
उसने जल्दी से चप्पल ली।
वह आदमी बोला,
“बच्चे का ध्यान रखना… दुनिया आसान नहीं है।”
मीना कुछ नहीं बोली।
बस में लौटते वक्त आरव ने देखा—
उसकी माँ रो नहीं रही थी…
लेकिन उसके चेहरे पर जैसे कुछ टूट गया था।
स्कूल पहुँचे।
मीना ने आरव को उतारा।
उसके पैर में चप्पल पहनाते हुए बोली—
“आरव… अगर लोग देखें, तो देखने दो।
अगर गिरो, तो उठना सीखो।
और अगर कोई हँसे…
तो याद रखना—तुम अकेले नहीं हो।”
आरव ने सिर हिलाया।
दिन भर मीना काम पर रही।
दिमाग़ में एक ही डर—
क्या मैं सब ठीक कर पा रही हूँ?
शाम को स्कूल पहुँची।
टीचर ने बुलाया।
“मीना जी… आज आरव बहुत रोया।”
मीना का दिल बैठ गया।
“क्या हुआ?”
“पीटी पीरियड में दौड़ने की कोशिश की।
गिर गया।
बाकी बच्चे हँसने लगे।”
मीना की आँखें झुक गईं।
“लेकिन…”
टीचर मुस्कुराईं,
“वह उठा।
फिर गिरा।
फिर उठा।”
मीना ने सिर उठाया।
“और आख़िर में—
उसने कहा—
मेरे पापा कहते थे, कोशिश छोड़ना मत।”
मीना की आँखों से आँसू बह निकले।
वह बाहर आई।
आरव गेट के पास खड़ा था।
दोनों चप्पल पैरों में।
चेहरा थका हुआ—पर आँखों में चमक।
“मम्मी…”
वह दौड़कर आया।
मीना ने उसे कसकर गले लगाया।
“आज दर्द हुआ?”
उन्हेंने पूछा।
आरव ने सिर हिलाया।
“हाँ… बहुत।”
“फिर भी कोशिश की?”
“हाँ।”
मीना ने आसमान की ओर देखा।
शायद कहीं अभय था।
मुस्कुरा रहा था।
क्योंकि
आज उसका बेटा गिरकर भी उठा था।
और उसकी पत्नी—
टूटकर भी खड़ी थी।
और यही उम्मीद होती है—
चुपचाप,
धीरे-धीरे,
ज़िंदगी को आगे ले जाने वाली।
सिख:
ज़िंदगी में कुछ बच्चे तेज़ नहीं चलते,
कुछ लोग जल्दी नहीं समझ पाते,
और कुछ परिवार चुपचाप बहुत दर्द सहते हैं।
लेकिन कमज़ोरी कभी हार नहीं होती।
गिरना असफलता नहीं है,
कोशिश छोड़ देना असली हार है।
एक माँ का विश्वास,
एक पिता की याद,
और एक बच्चे की छोटी-सी हिम्मत—
मिलकर वह ताक़त बन जाती है
जो सबसे मुश्किल हालात को भी बदल सकती है।
हमें दूसरों पर हँसने से पहले
एक पल ठहरकर यह सोचना चाहिए कि
शायद वह इंसान
हमसे ज़्यादा लड़ाइयाँ लड़ रहा हो।
प्यार, धैर्य और समझदारी—
यही किसी बच्चे को खड़ा होना सिखाते हैं,
और किसी टूटे परिवार को फिर से जोड़ देते हैं।

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