टूटी हुई डोर

 

Emotional Indian woman starting a new life with her supportive husband after family trauma, symbolizing healing and emotional strength


शाम के लगभग छह बज रहे थे।

डाकिया दरवाज़े पर आकर एक लिफ़ाफ़ा थमा गया। लिफ़ाफ़े पर राकेश का नाम था, लेकिन उसे खोलने वाली मीरा थी।


मीरा ने लिफ़ाफ़ा खोला, पढ़ा… और बिना किसी प्रतिक्रिया के उसे अलमारी के ऊपर रख दिया।

राकेश ने यह सब देख लिया।


उसकी निगाहें मीरा के चेहरे पर टिक गईं—

लेकिन वहाँ आँसू नहीं थे।

न शोक…

न घबराहट…

बस एक अजीब-सी कठोर शांति।


“किसका पत्र था?” राकेश ने धीरे से पूछा।


“मायके से…”

मीरा ने बस इतना कहा और रसोई की ओर मुड़ गई।


राकेश को झटका-सा लगा।

उसे उम्मीद थी कि मीरा रो पड़ेगी, टूट जाएगी, उससे लिपटकर कहेगी— चलो… मुझे जाना है…

लेकिन कुछ भी ऐसा नहीं हुआ।


पत्र में लिखा था—

मीरा की माँ का आज सुबह निधन हो गया।


राकेश ने दफ़्तर से आते समय ही तीन दिन की छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया था।

उसे पूरा यक़ीन था कि मीरा को मायके ले जाना ही पड़ेगा।


मीरा और राकेश की शादी को सात साल हो चुके थे।

मीरा कभी भी अपने मायके जाने की ज़िद नहीं करती थी।

त्योहारों पर भी, अगर राकेश कहे तभी जाती।

और कभी अकेले नहीं।


शुरुआत में राकेश को यह अच्छा लगता था।

उसे लगता था— मीरा पूरी तरह मेरे घर की हो गई है।

वह सास-ससुर की सेवा करती, बच्चों को संभालती, हर रिश्ते को पूरे मन से निभाती।


लेकिन आज…

आज मीरा कुछ और ही थी।


“मीरा…”

राकेश ने हिम्मत जुटाकर कहा,

“हमें आज ही निकलना चाहिए। तुम्हारी माँ… लोग तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होंगे।”


मीरा ने चूल्हे से नज़र हटाए बिना कहा—

“मुझे कहीं नहीं जाना।”


राकेश चौंक गया।

“यह कैसी बात कर रही हो? आख़िरी दर्शन… अंतिम संस्कार…”


मीरा ने धीमी, लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा—

“जब रिश्ता जीते-जी निभाया नहीं गया, तो मरने के बाद क्यों निभाऊँ?”


राकेश कुछ समझ नहीं पाया।

“क्या मतलब?”


मीरा चुप रही।

फिर बोली—


“मैं बचपन से उस घर में थी… लेकिन कभी उस घर की नहीं बनी।

माँ थी, पर ममता नहीं थी।

पिता थे, पर अपनापन नहीं था।”


उसकी आवाज़ काँपने लगी।


“मेरी छोटी बहन को गोद में खिलाया गया,

और मुझे काम सौंप दिया गया।

उसके सपनों को पंख मिले,

और मेरे सपनों को चुप रहने की सीख।”


राकेश पहली बार मीरा के अतीत की दरारों में झाँक रहा था।


“कभी पूछा गया—

मीरा क्या चाहती है?

मीरा दुखी क्यों है?”


उसकी आँखों से आँसू बह निकले।


“मैंने सब सहा…

क्योंकि समाज कहता है—

माँ-बाप भगवान होते हैं।”


मीरा ने गहरी साँस ली।


“लेकिन आज, जब वह नहीं रहीं…

तो मुझे खालीपन नहीं लगा।

मुझे लगा—

अब वह बोझ उतर गया, जिसे मैं नाम नहीं दे पाई थी।”


राकेश स्तब्ध था।

उसे लगा जैसे उसकी शांत पत्नी के भीतर वर्षों से कोई तूफ़ान कैद था।


“तो क्या अब तुम्हारा उनसे कोई रिश्ता नहीं?”

उसने धीरे से पूछा।


मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।

अब मेरा संसार सिर्फ़ आप और हमारे बच्चे हैं।”


राकेश ने आगे बढ़कर मीरा का हाथ थाम लिया।

“मीरा…

तुम अकेली नहीं हो।

जो प्यार तुम्हें नहीं मिला, वह मैं दूँगा।”


मीरा की आँखों में पहली बार हल्की-सी चमक आई।


रात को जब दोनों बच्चे सो गए,

मीरा खिड़की के पास खड़ी चाँद को देख रही थी।


“राकेश…”

उसने धीमे से कहा,

“अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए…”


“तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।”

राकेश ने बात पूरी कर दी।


मीरा मुस्कुरा दी।

यह मुस्कान वर्षों बाद आई थी।


सुबह जब राकेश उठा,

तो देखा—

घर में ताज़े फूलों की खुशबू थी।

पुराने मुरझाए फूल हटा दिए गए थे।


मीरा रसोई में गुनगुना रही थी।


आज पहली बार…

उसने अपने अतीत को पीछे छोड़ा था

और वर्तमान को अपनाया था।


यह सुबह…

मीरा के जीवन की

पहली सच्ची सुबह थी।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.