एक सवाल जो रोज़ चुभता रहा

 

Emotional Indian family scene showing a caring uncle holding a young girl while a strong widow stands behind them in a quiet home, expressing love, responsibility, and hope after loss


आज फिर वही सवाल…

वही मासूम आवाज़…


“चाचा, पापा आज आएंगे ना?”


छह साल की रिया का यह प्रश्न हर बार मेरे सीने में कील की तरह धँस जाता था।

मैं मुस्कुरा देता, उसके बाल सहलाता और कह देता—

“हाँ बेटा… जल्दी ही।”


पर सच यह था कि जिनके आने का वह इंतज़ार कर रही थी, वे अब कभी नहीं आने वाले थे।



मेरे बड़े भाई समीर को गुज़रे एक साल हो चुका था।

लेकिन घर में ऐसा लगता था जैसे समय वहीं ठहर गया हो।


समीर की मौत अचानक नहीं थी, पर स्वीकार करना उतना ही कठिन था।

शुरुआत बस थकान और हल्के दर्द से हुई थी।

हम सबने इसे काम का दबाव समझा।


“अरे कुछ नहीं हुआ है, तुम लोग बेवजह ही ज़्यादा सोचते रहते हो।”,

समीर हँसकर बात टाल देते थे।


वे हमेशा ऐसे ही थे—

हल्के-फुल्के, ज़िंदगी को मज़ाक में लेने वाले।




जब बीमारी सामने आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

कैंसर…

यह शब्द सुनते ही पूरा घर जैसे सुन्न हो गया।


माँ को आज तक नहीं बताया गया कि बीमारी कितनी गंभीर है।

भाभी—कविता—हर दिन उम्मीद का सहारा लेकर जीती रहीं।


मंदिर, मन्नत, दुआ—

सब कुछ किया गया।


डॉक्टर इलाज करते रहे,

और हम सब झूठी उम्मीदें पालते रहे।



अंतिम दिनों में समीर को कुछ भी पता नहीं था।

वह बस इतना कहते—

“सब ठीक हो जाएगा, देख लेना।”


उनकी आँखों में डर नहीं था,

हमारी आँखों में सच छुपाने की मजबूरी थी।



जिस दिन वे चले गए,

उस दिन घर से आवाज़ें भी चली गईं।


माँ पत्थर की तरह बैठी रहीं।

पिता अचानक बहुत बूढ़े लगने लगे।


और कविता…

वह तो जैसे ख़ुद के भीतर कहीं खो गईं।



सबसे कठिन था रिया को संभालना।


वह रोज़ स्कूल से आकर पूछती—

“चाचा, क्या आज पापा से बात हो पाएगी?”


मैं उसे कहानियाँ सुनाता,

उसे बाहर घुमाने ले जाता,

पर हर रात उसका सवाल लौट आता।



धीरे-धीरे ज़िंदगी आगे बढ़ने की कोशिश करने लगी।


कविता को समीर की जगह नौकरी मिल गई।

रिया फिर से हँसने लगी।

घर थोड़ा शांत हुआ।


पर खालीपन बना रहा।



एक दिन माँ ने बहुत संकोच से मुझसे कहा—

“अगर तुम चाहो… तो कविता और रिया इसी घर में सुरक्षित रह सकती हैं।”


मैं समझ गया था उनका संकेत।

पर मेरे भीतर सब कुछ उलट-पुलट हो गया।


कविता मेरे लिए हमेशा बड़ी बहन जैसी रही थीं।

उनके प्रति सम्मान था,

पर वैसा भाव नहीं, जैसा पति-पत्नी में होता है।



मैंने खुद से कई सवाल किए—


क्या कोई और आदमी रिया को पिता का साया दे पाएगा?

क्या कविता किसी बिल्कुल अजनबी घर में जाकर सचमुच सुख और अपनापन पा सकेगी?

क्या मैं यह जिम्मेदारी अकेले नहीं उठा सकता?




आख़िरकार मैंने कविता से साफ़ बात की।


उन्होंने ध्यान से सुना।

फिर बहुत शांति से बोलीं—


“हम दोनों जानते हैं कि यह आसान नहीं है।

पर कई बार रिश्ते भावना से नहीं, ज़िम्मेदारी से निभाए जाते हैं।”


उन्होंने आगे कहा—

“अगर यह फैसला रिया को सुरक्षित भविष्य देता है,

तो मैं इसके लिए तैयार हूँ।”



उस दिन मुझे समझ आया—

त्याग हमेशा दुख नहीं होता।

कभी-कभी वह सबसे बड़ा साहस होता है।



हमारा विवाह बहुत सादा था।

कोई शोर नहीं,

कोई दिखावा नहीं।


बस एक समझौता—

एक बच्चे के भविष्य के लिए।



आज रिया मुझे पापा कहती है।

और मैं उसे पूरे मन से बेटी मानता हूँ।


कविता और मैं अब भी दोस्त हैं—

सम्मान और 

समझ पर टिके हुए।



कभी-कभी रात को वही सवाल फिर गूंजता है—

“चाचा, पापा कब आएंगे?”


अब मैं मुस्कुराकर जवाब देता हूँ—

“पापा यहीं हैं बेटा… हमेशा।”




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