❝ जिस दिन बेटे ने माँ को आख़िरी बार पुकारा ❞

 

Indian middle class family performing griha pravesh ceremony in their new home, husband and wife standing at the entrance with emotional expressions, symbol of struggle, resilience, and new beginnings


कभी-कभी बेटा घर से अलग होता है,

तो लोग कहते हैं—

“बीवी ने भड़का दिया।”


लेकिन जब माँ ही बेटे को तोड़ दे,

तो उस अंदरूनी दरार की आवाज़

किसी को सुनाई नहीं देती।



आज सौरभ और काव्या के जीवन का बड़ा दिन था।

दस साल की मेहनत के बाद

उन्होंने अपना छोटा-सा फ्लैट खरीदा था।


आज गृह प्रवेश था।


काव्या दरवाज़े पर खड़ी थी—

नीले रंग की साड़ी,

हाथ में पूजा की थाली।


सौरभ उसे देख रहा था,

पर उसकी नज़र बार-बार भीड़ में किसी को ढूँढ रही थी।


उसकी माँ— कमला देवी।


लेकिन भीड़ में

सिर्फ काव्या के मायके वाले थे।


सौरभ की माँ नहीं आई थी।



बीमारी से शुरू हुआ अलगाव...


सौरभ के पिता के गुजरने के बाद

कमला देवी पूरी तरह बेटे पर निर्भर हो गई थीं।


हर फैसला वही करतीं।


सौरभ और काव्या दोनों नौकरी करते थे।

पर सौरभ की पूरी सैलरी

माँ के हाथ में जाती।


एक दिन काव्या ने बस इतना कहा—


“अगर थोड़ा पैसा बचाया जाए,

तो भविष्य आसान होगा।”


कमला देवी ने सुन लिया।


“तो अब बहू तय करेगी

मेरा बेटा क्या करे?”


उस दिन से काव्या

घर में अजनबी बन गई।



भाई का सच...


सौरभ का छोटा भाई रोहित

पढ़ाई में कमजोर था।


कमला देवी ने सौरभ से कहा—


“रोहित को प्राइवेट कॉलेज में डालना है।

तू ही मदद करेगा।”


सौरभ ने बिना सोचे हाँ कर दी।


पर जब फीस बढ़ती गई,

तो सौरभ ने कहा—


“माँ, अब मुझसे नहीं हो पा रहा।”


कमला देवी ने साफ कह दिया—


“अगर तू मदद नहीं करेगा,

तो तू मेरा बेटा नहीं।”



आख़िरी चोट...


एक दिन सौरभ को पता चला—


माँ ने चुपचाप

उसके नाम की एफडी तोड़ दी थी

और पैसे रोहित को दे दिए थे।


जब उसने सवाल किया—


तो जवाब मिला—


“बड़ा बेटा है,

त्याग करना सीख।”


उस दिन सौरभ चुप रहा।

पर अंदर से टूट गया।



अलग होने का फैसला...


काव्या ने कहा—


“अगर अब भी चुप रहे,

तो हम कभी कुछ नहीं बन पाएँगे।”


सौरभ माँ के पास गया।


“माँ, मैं अलग रहना चाहता हूँ।”


कमला देवी हँस दीं—


“जा, दरवाज़ा खुला है।

मुझे तुझ जैसे बेटे की ज़रूरत नहीं।”



संघर्ष के साल...


छोटा किराए का कमरा।

कभी बिजली नहीं।

कभी पानी।


काव्या ने अपनी चूड़ियाँ बेचीं।

सौरभ ने रात की शिफ्ट की।


धीरे-धीरे ज़िंदगी पटरी पर आई।



आज...


आज गृह प्रवेश था।


फ्लैट छोटा था,

पर सुकून बड़ा।


पूजा के बाद

सौरभ की आँखें भर आईं।


काव्या ने पूछा—


“किसकी याद आ रही है?”


सौरभ बोला—


“उस माँ की,

जिसे मेरा संघर्ष कभी दिखा ही नहीं।”



सीख:


> माँ होना अधिकार है,

लेकिन बेटे का जीवन कुचल देना

ममता नहीं होती।


No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.