विधवा बहू और तीन सासों की ढाल
साक्षी के घर में शादी की तैयारियाँ पूरे ज़ोरों पर थीं।
आँगन में पीली हल्दी फैली थी,
कमरे में लाल जोड़े सजे थे,
और माँ हर बार साक्षी को देखकर यही कहती—
“मेरी बेटी सबसे सुन्दर दुल्हन लगेगी।”
साक्षी मुस्कुरा देती थी।
उसे क्या पता था कि यह मुस्कान इतनी जल्दी छिन जाएगी।
वो सुबह जो सब कुछ बदल गई...
शादी से ठीक दो दिन पहले
साक्षी की नींद घबराहट में खुली।
“मा…?”
उसने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं आया।
वो भागकर माँ के पास पहुँची।
माँ निश्चल पड़ी थीं।
“मा… उठो ना…”
“बाबा… बाबा जल्दी आओ…”
पूरा घर जाग गया।
डॉक्टर आए…
पर सिर्फ़ एक वात कहकर चले गए—
“अब कुछ नहीं हो सकता।”
साक्षी ज़मीन पर बैठ गई।
“नहीं…
मेरी माँ मुझे विदा किए बिना नहीं जा सकती…”
उसने माँ के हाथ पकड़े—
“मा…
मेरी मेहंदी अभी उतरी भी नहीं है…”
“मेरी शादी देखे बिना मत जाओ…”
लेकिन माँ तो
ज़िंदगी की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाकर
चुपचाप चली गई थीं।
शादी के घर से अर्थी...
जिस घर में शहनाइयाँ बजनी थीं,
वहाँ अब रोने की आवाज़ें थीं।
और समाज…
समाज वहाँ भी चुप नहीं था।
“देखा…
कितनी मनहूस लड़की है।”
“शादी से पहले माँ को खा गई।”
साक्षी सब सुन रही थी।
लेकिन आँसू भी अब थक चुके थे।
विदाई जो बोझ बन गई...
अंतिम संस्कार के बाद
शादी आगे बढ़ा दी गई।
विदाई के दिन
पिता का कलेजा फट रहा था।
“बेटी…
लोग बहुत बुरे होते हैं।”
“सबकी बात दिल पर मत लेना।”
साक्षी ने पिता के पैर छुए।
“बाबा…
अब आप अकेले कैसे रहोगे?”
पिता ने आँसू छुपाकर कहा—
“अब तू मेरी नहीं,
अपने ससुराल की बेटी है।”
तीन सास — तीन माँएँ...
साक्षी ससुराल पहुँची।
वहाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं
तीन उम्रदराज़ औरतें।
तीनों की आँखों में
स्नेह था, दया थी, अपनापन था।
“बहू का गृह प्रवेश मैं कराऊँगी।”
दिपाली ने हाथ पकड़ते हुए कहा।
आरती उतारी गई।
कलश गिराया गया।
साक्षी की आँखें भर आईं।
“रो क्यों रही है बहू?”
“हमसे कुछ कमी रह गई क्या?”
“नहीं माजी…”
“आप तीनों में मुझे मेरी माँ दिखती है।”
तीनों सासों ने
उसे अपने सीने से लगा लिया।
सुख के कुछ पल...
पहली रसोई हुई।
साक्षी ने काँपते हाथों से खाना बनाया।
“बहुत स्वादिष्ट है।”
तीनों सासों ने एक साथ कहा।
नेग के रूप में उसे घर की सबसे अनमोल निशानी सौंपी गई —
पीढ़ियों से संभाल कर रखा गया खानदानी हार।
उसे पहनाते हुए सास ने स्नेह से कहा —
“आज से यह सिर्फ़ गहना नहीं,
बल्कि इस घर की इज़्ज़त, परंपरा
और भरोसे की अमानत है।”
“अब ये तेरी ज़िम्मेदारी है।”
साक्षी को लगा—
शायद ज़िंदगी अब संभल जाएगी।
दूसरा झटका...
कुछ ही महीनों बाद
एक फोन आया।
वरुण का एक्सीडेंट हो गया था।
गाड़ी पूरी तरह कुचल चुकी थी।
और वरुण…
वो अब इस दुनिया में नहीं था।
अब साक्षी विधवा थी।
एक और बार
समाज की ज़ुबानें खुलीं—
“अब किसका नंबर है?”
“शादी से पहले माँ,
शादी के बाद पति…”
🛡️ तीन सास ढाल बन गईं...
बाज़ार में एक औरत ने ताना मारा—
“अपनी मनहूस बहू को संभाल कर रखना।”
दिपाली ने वहीं जवाब दिया—
“मनहूस मेरी बहू नहीं,
तेरी सोच है।”
घर में
साक्षी को कभी अकेला नहीं छोड़ा गया।
“ये खाना खा।”
“आराम कर।”
“रो मत।”
उम्मीद की किरण...
साक्षी माँ बनने वाली थी।
लेकिन उसका मन डर से भरा था।
“मा…
साक्षी की आवाज़ काँप रही थी।
“अगर… अगर मुझमें ही सच में कुछ गलत हुआ तो?”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“अगर लोग जो कहते हैं वही सच निकला तो?”
“अगर मेरी किस्मत ही मनहूस हुई तो?”
वो सिसकते हुए माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
सास ने उसके माथे पर हाथ रखा—
“अगर तू गलत होती
तो भगवान तुझे माँ नहीं बनाता।”
नया जीवन...
एक दिन
घर में रोने की आवाज़ गूँजी।
एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ।
तीनों सासों की आँखों से आँसू बह निकले।
“ये हमारे बेटे की आख़िरी निशानी है।”
अब वही लोग
जो ताने देते थे
चुप थे।
कहानी की सीख:
औरत औरत की दुश्मन नहीं होती।
उसे दुश्मन बनाती है
गलत सोच।
साक्षी टूट जाती
अगर उसके पास
तीन माँएँ नहीं होतीं।

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