आलस की आदत और सीख
रेनुका की शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे।
उसकी शादी शास्त्री नगर में एक अच्छे, सुसंस्कृत परिवार में हुई थी।
घर बड़ा था, लोग अच्छे थे, लेकिन रेनुका की एक आदत धीरे-धीरे सबको खटकने लगी—
वो थी उसका आलस।
रेनुका दिन का ज़्यादातर समय बिस्तर पर पड़ी रहती।
कभी मोबाइल चलाती, कभी मैगज़ीन पढ़ती और कभी बिना वजह आराम करती रहती।
घर का काम करती भी तो बहुत धीरे-धीरे, जैसे उस पर कोई ज़िम्मेदारी ही न हो।
सास सुबह से रसोई, पूजा और घर के काम में लगी रहतीं,
और रेनुका आराम से कमरे में बैठी रहती।
एक दिन सास ने धीरे से कहा—
“बहू, ज़रा चाय बना दो।”
रेनुका ने बिना उठे, लापरवाही से पलटकर जवाब दिया—
“अच्छा मम्मी जी… अभी मन नहीं है।
आप चाहें तो सीधे रात का खाना ही खा लीजिएगा।”
सास मन ही मन सोचने लगीं—
“हे भगवान! कैसी आलसी बहू मिली है।
हर काम को बस टालती ही रहती है।”
दिन बीतते गए।
रेनुका का आलस कम होने के बजाय और बढ़ता गया।
एक रात सब लोग खाने की मेज़ पर बैठे थे।
सब्ज़ी आई, रोटी आई, लेकिन कुछ कमी थी।
पति विशाल ने कहा—
“रेनुका, ज़रा फ्रिज खोलकर देखो, कोई सब्ज़ी तो होगी।”
रेनुका उठी, धीरे-धीरे फ्रिज खोला।
सब्ज़ियाँ रखी थीं, लेकिन उसने ध्यान ही नहीं दिया था।
विशाल का गुस्सा फूट पड़ा।
वह बोला—
“रेनुका, अगर तुम थोड़ा भी ध्यान देती और आलस छोड़ देती,
तो ये सब्ज़ियाँ तुम्हें पहले ही दिख जातीं।”
कुछ देर बाद विशाल कमरे में आया।
उसके चेहरे पर हल्की झुंझलाहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
वह बोला—
“रेनुका, मैंने तुमसे कहा था कि मेरे लिए रुमाल ले आओ।
मेरे सारे रुमाल खत्म हो चुके हैं।”
रेनुका ने बिना उसकी ओर देखे, लापरवाही से जवाब दिया—
“अरे, कल ले आऊँगी।
आज बहुत थकान है।”
विशाल झुंझलाकर बोला—
“पिछले चार दिन से यही सुन रहा हूँ।
बिना रुमाल के ऑफिस जा रहा हूँ।
तुम दिन-ब-दिन और आलसी होती जा रही हो।”
रेनुका ने बेपरवाही से कहा—
“आपको ज़रूरत है तो खुद ही खरीद लीजिए ना।”
विशाल की आवाज़ में थकान और मायूसी झलक आई।
वह गहरी साँस लेते हुए बोला—
“ठीक है… अब मैं खुद ही ले आऊँगा।
तुम्हारे भरोसे बैठकर इंतज़ार करना बेकार है।”
इसी बीच दरवाज़े की घंटी बजने लगी—
एक बार… दो बार… तीन बार…
सास रसोई से चिल्लाईं—
“अरे बहू! कितनी देर से बेल बज रही है।
क्या कानों में रुई डालकर बैठी हो?”
रेनुका बोली—
“मम्मी जी, अब आप आ ही गई हैं तो आप ही खोल दीजिए।”
सास को बहुत बुरा लगा।
उन्होंने कड़े स्वर में कहा—
“अरे वाह! गलती खुद की है और जवाब ऐसे दे रही हो,
जैसे कसूर मेरा ही हो।
सच कहते हैं—
“उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।”
(“जो खुद गलती करता है, वही दूसरों को डाँटने लगता है”)
दरवाज़ा खोला गया।
पड़ोस की कुछ महिलाएँ और रिश्तेदार आ गए थे।
सब अंदर बैठे।
सास ने आँखों से इशारा किया—
“बहू, चाय बना लाओ।”
रेनुका मन ही मन बड़बड़ाई—
“उफ्फ… अभी इन्हें भी आना था।”
आलस में रेनुका रसोई गई।
ध्यान कहीं और था।
जल्दी-जल्दी में उसने चाय में चीनी की जगह नमक डाल दिया।
पकोड़ों में ज़रूरत से ज़्यादा मिर्च पड़ गई।
चाय आई।
एक घूँट लेते ही सबके मुँह से आवाज़ निकली—
“थू… थू… ये कैसी चाय है?”
“इसमें तो नमक है!”
“और पकोड़े? मिर्च से भरे हुए!”
एक रिश्तेदार ने सास की ओर देखकर ताने भरे स्वर में कहा—
“आपकी खातिरदारी में तो पहले कभी कोई कमी नहीं रहती थी,
लेकिन जब से नई बहू आई है, सब कुछ जैसे बदल गया है…”
दूसरी ने ताना मारा—
“आप इतनी एक्टिव हैं और आपकी बहू एकदम आलसी।
एकदम राम-सीता की जोड़ी नहीं,
राम और सोई हुई कुंभकर्णी की जोड़ी लगती है।”
सब उठकर जाने लगे—
“नमक वाली चाय के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
सास की आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे।
“तूने आज मेरी नाक कटवा दी, बहू!”
रेनुका घबरा गई—
“मम्मी जी, मैंने तो चीनी ही डाली थी…
पता नहीं नमक कैसे पड़ गया।”
सास ने गंभीर और शांत स्वर में कहा—
“बहू, चीनी नमक नहीं बनी।
ये तुम्हारे आलस का ही नतीजा है।
जब इंसान का मन काम में न लगे
और हाथ ढीले पड़ जाएँ,
तो हर काम बिगड़ ही जाता है।”
रेनुका की आँखें झुक गईं।
पहली बार उसे अपनी गलती साफ़ दिखी।
वो बोली—
“माफ़ कर दीजिए मम्मी जी।
आज से मैं आलस छोड़ दूँगी।
घर के सारे काम मन लगाकर करूँगी।”
सास ने उसके सिर पर हाथ रखा—
“बहू, घर तभी घर बनता है
जब उसमें रहने वाले ज़िम्मेदारी निभाएँ।”
उस दिन के बाद
रेनुका सच में बदलने लगी—
धीरे-धीरे नहीं,
पूरे मन से।

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