ममता का घर
सुबह की पहली किरण जैसे ही खिड़की से भीतर आई, राधा जल्दी-जल्दी उठकर चाय बनाने लगी। आज उसका मन अजीब-सा डरा हुआ था। रात को सोने से पहले ही सासू माँ ने धीरे से कहा था,
“बिटिया, आज शाम को थोड़ा जल्दी घर आ जाना… मेहमान आ रहे हैं।”
राधा जानती थी कि इस ‘मेहमान’ शब्द का मतलब क्या होता है—कोई उसे देखने आने वाला है। पिछले कुछ समय से सासू माँ और ससुर जी उसकी दूसरी शादी के लिए लड़का ढूँढ रहे थे। राधा का मन यह सोचकर ही उचट गया। दिनभर छोटे बुटीक की दुकान में काम करते हुए उसका ध्यान कहीं नहीं लगा।
बगल में कपड़े प्रेस करवाने वाली मीना ने उसे दो बार टोका,
“क्या हुआ बहन? चेहरा बुझा-बुझा लग रहा है आज।”
राधा मुस्कुरा दी, लेकिन आँखों में छिपा डर कोई नहीं देख पाया।
शाम के पाँच बजते ही उसने किराए की दुकान बंद की और जल्दी-जल्दी घर आ गई। घर पहुंचते ही तीन साल की गुड़िया उसकी टांगों से चिपक गई,
“मम्मा! आप आ गईं!”
राधा झुककर उसे सीने से लगा ली। बच्ची के मासूम हाथ उसके चेहरे को सहला रहे थे। राधा ने उसे गोद में उठाया और अंदर चली गई।
सासू माँ ने कहा,
“जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जा, बिटिया… मेहमान बस आने ही वाले हैं।”
राधा ने भारी मन से तैयार होकर साड़ी पहनी और गुड़िया को गोद में लेकर कमरे में बैठ गई। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। एक मध्यमवर्गीय परिवार अंदर आया—दो बुजुर्ग और एक युवक, जिसका नाम था आदर्श।
सबने बैठकर राधा से कुछ हल्की-फुल्की बातें कीं। आदर्श की माँ ने मिठाई का डिब्बा राधा की गोद में बैठी गुड़िया को दिया और मुस्कुराकर कहा—
“बहुत प्यारी बच्ची है।”
लेकिन राधा का मन फिर भी सुकून में नहीं था। कुछ देर बाद आदर्श ने राधा से अकेले में बात करने का अनुरोध किया।
दोनों आँगन में आकर बैठ गए।
आदर्श ने सीधे कहा,
“मैं आपको पसंद करता हूँ। लेकिन एक बात साफ कर दूँ…”
राधा का दिल धड़कने लगा।
“…मेरी माँ चाहती हैं कि शादी के बाद आपकी बेटी आपके माता-पिता के पास रहे। मैं बच्चों को लेकर थोड़ा असहज रहता हूँ।”
राधा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने बिना एक पल गंवाए कहा—
“तो यह रिश्ता यहीं खत्म समझिए। मेरी गुड़िया मेरी साँस है। मैं उससे अलग नहीं रह सकती।”
आदर्श चुप हो गया। राधा उठी और कमरे में चली गई। सासू माँ ने उसे देखा, पर कुछ कहा नहीं। मेहमान वापस चले गए।
रात को गुड़िया को सुलाते हुए राधा के आँसू उसके बालों में गिरे। सासू माँ पास आकर धीरे से बोलीं,
“बिटिया, दुनिया बहुत कठोर है… पर हम तेरे साथ हैं। शायद कोई ऐसा मिल ही जाए, जो गुड़िया को खुश होकर अपनाए।”
राधा सिर्फ इतना ही बोली—
“मैं किसी कीमत पर अपनी बच्ची को नहीं छोड़ सकती माँ। चाहे मैं उम्रभर अकेली रह जाऊँ।”
दो महीने बाद…
राधा फिर से अपनी दुकान में सामान्य दिनों की तरह लग गई थी। तभी एक दिन आदर्श सीधे दुकान पर आ गया। राधा चौंक गई।
आदर्श ने कहा,
“मैंने बहुत सोचा… आप सही थीं। किसी को पाने के लिए उसकी दुनिया को छीनना गलत है। मैं… मैं आप दोनों से क्षमा चाहता हूँ।”
राधा स्तब्ध रह गई।
आदर्श ने आगे कहा—
“अगर आप अनुमति दें तो मैं गुड़िया से मिल सकता हूँ? मैं उसे समझना चाहता हूँ… उसे अपनाना चाहता हूँ, सच में।”
राधा की आँखें नम हो गईं। उसने हाँ में सिर हिलाया।
उसी शाम आदर्श घर आया। गुड़िया उसे देखकर मम्मा के पीछे छुप गई। आदर्श ने मुस्कुराकर उसे एक छोटी-सी रंगीन किताब दी—“नन्ही परी की कहानी।”
गुड़िया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी। किताब खोली।
“ये मेरे लिए?” उसने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ,” आदर्श ने प्यार से कहा, “और अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हें कहानी भी सुनाऊँगा।”
गुड़िया उत्साह से उछल पड़ी।
“सुनाओ!!”
आदर्श ने कहानी सुनानी शुरू की। राधा दूर खड़ी उन्हें देखती रही—एक अजनबी धीरे-धीरे उसके बच्चे के लिए अपना दिल खोल रहा था।
छह महीने बाद…
राधा और आदर्श का विवाह एक छोटे से समारोह में हुआ। गुड़िया ने गुलाबी फ्रोक पहनी थी और वह पूरे समय आदर्श का हाथ पकड़कर घूमती रही।
आदर्श की माँ को भी धीरे-धीरे गुड़िया से लगाव हो गया। वे अक्सर कहतीं—
“ये तो हमारे घर की छोटी रानी है।”
राधा का नया घर प्यार से भर गया था।
एक साल बाद…
एक शाम आदर्श ऑफिस से लौटा तो गुड़िया आकर उसकी गर्दन में बाँहें डालकर चिल्लाई—
“पापा आ गए!!”
राधा मुस्कुराते हुए उन्हें देख रही थी।
आदर्श ने उसे गोद में उठाते हुए कहा—
“पापा की परी! चलो, आज आइसक्रीम खिलाने ले चलता हूँ!”
राधा ने पास आकर धीरे से कहा—
“आदर्श, धन्यवाद… आपने हमें स्वीकारा, समझा… आज मेरा मन सच में पूरा हो गया है।”
आदर्श ने मुस्कुराकर कहा—
“अधूरा तो मैं था, राधा। तुम दोनों ने आकर मुझे पूरा कर दिया।”
गुड़िया दोनों के बीच हँसते हुए खिलखिला उठी—
“हमारा
परिवार बेस्ट है!”
और सच में, उस पल राधा ने महसूस किया कि ममता के लिए बना यह घर अब सचमुच घर बन गया था।

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