सीख जो ज़िंदगी भर साथ रही
मेरे बचपन की बात है। तब हमारा घर छोटा था, साधन सीमित थे, पर मां के शब्द बहुत गहरे और बड़े अर्थ वाले होते थे।
मां अक्सर कहती थीं—
“बेटा, किसी के दुख को हल्का कर सको तो वही सबसे बड़ा पुण्य है। दुनिया में सब कुछ पैसा नहीं, इंसानियत भी होती है।”
तब मैं शायद इन बातों का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाता था, लेकिन मां की आवाज़ दिल में कहीं बैठ जाती थी।
समय बीतता गया। पढ़ाई, नौकरी, परिवार—सब कुछ मिला। अब मैं खुद एक पिता बन चुका था। मेरा बेटा तब लगभग दस साल का था। छुट्टियों में हम दोनों गांव गए हुए थे। एक दिन दोपहर के समय हम पैदल ही पास के तालाब की ओर टहलने निकल पड़े।
रास्ते में खेतों के बीच से जाता हुआ कच्चा रास्ता था। धूप तेज़ थी। खेतों से लौटते कुछ लोग दिख रहे थे—कोई सिर पर गठरी लिए, कोई हाथ में दरांती।
तभी तालाब के किनारे हमें एक बुज़ुर्ग आदमी दिखा। उसके कपड़े पुराने थे, चप्पल के तले घिस चुके थे। वह तालाब के पानी में हाथ-पैर धो रहा था और पास ही उसकी लाठी और एक फटा-सा झोला रखा था।
मेरे बेटे ने धीरे से कहा—
“पापा, लगता है ये दादा बहुत गरीब हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसे देखने लगा।
थोड़ी देर बाद वह बुज़ुर्ग झोला उठाकर खड़ा हुआ। शायद घर जाने की तैयारी में था। तभी मेरा बेटा मुस्कराते हुए बोला—
“पापा, एक शरारत करें?”
मैंने पूछा—
“कैसी शरारत?”
वह बोला—
“पापा, क्यों न हम उनका झोला थोड़ा दूर रख दें? फिर देखेंगे, जब वे ढूंढते हुए इधर-उधर भटकेंगे तो कैसा लगेगा।”
उसकी बात सुनते ही मुझे मां की आवाज़ याद आ गई।
मैंने शांत स्वर में पूछा—
“अगर कोई तुम्हारी चीज़ छुपा दे और तुम धूप में परेशान हो जाओ, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”
वह चुप हो गया।
मैंने आगे कहा—
“बेटा, मज़ा वो नहीं जिसमें कोई परेशान हो। असली खुशी वो है जिसमें किसी का दुख कम हो।
तुम्हारे पास सब कुछ है—पानी, खाना, घर। लेकिन सोचो, इस उम्र में भी ये आदमी मेहनत कर रहा है। शायद मजबूरी होगी।”
फिर मैंने जेब से कुछ पैसे निकाले और बेटे के हाथ में रख दिए।
“अगर सच में कुछ अलग करना है, तो ये पैसे इसके झोले में रख दो। बिना बताए।”
बेटा कुछ पल सोचता रहा। फिर धीरे से झोले के पास गया और पैसे अंदर रख आया।
हम दोनों थोड़ी दूरी पर खड़े होकर देखने लगे।
कुछ देर बाद वह बुज़ुर्ग आदमी झोला उठाकर चलने लगा। अचानक वह रुका।
उसने झोला खोला।
पैसे देखकर उसकी आंखें फैल गईं।
वह इधर-उधर देखने लगा—
कोई नहीं था।
वह वहीं ज़मीन पर बैठ गया। कांपते हाथों से पैसे पकड़े और बोला—
“हे भगवान… आज सुबह ही मैंने सोचा था कि दवा कैसे लाऊंगा। शरीर जवाब दे रहा है।
आपने मेरी सुनी…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
वह चुपचाप आंखों से आंसू पोंछता रहा।
मेरे बेटे की आंखें भी नम हो गईं।
वह मेरे पास आकर बोला—
“पापा, दिल में अजीब-सी खुशी हो रही है।”
मैंने मुस्कराकर पूछा—
“अगर हम शरारत करते, तो क्या यही खुशी मिलती?”
वह बोला—
“नहीं पापा… आज समझ आया।
किसी को हंसता देखकर जो सुकून मिलता है, वो किसी मज़ाक में नहीं मिलता।”
उस दिन के बाद मैंने अपने बेटे को कभी यह कहते नहीं सुना कि
“मज़ा आएगा किसी को परेशान करके।”
आज जब वह बड़ा हो चुका है, समाज में सम्मान से जी रहा है, तो मुझे लगता है—
मां की दी हुई सीख, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच गई।
क्योंकि सच यही है—
जो दूसरों के लिए थोड़ा सा रुक जाता है,
ज़िंदगी उसके लिए बहुत कुछ रोक कर रखती है।
सीख:
दूसरों को परेशान करके मिली खुशी पल भर की होती है,
लेकिन किसी के दुख को कम करके जो सुकून मिलता है,
वह जीवन भर दिल में रहता है।
जिसके पास देने की क्षमता है,
उसे पहले इंसान बनकर सोचना चाहिए।
क्योंकि देने से इंसान छोटा नहीं होता,
बल्कि उसका दिल बड़ा हो जाता है।

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