एक फ़ॉर्म और चार सौ रुपए
सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे।
सरकारी दफ्तर की सीढ़ियों पर पहले से ही भीड़ जमा थी।
कोई पेंशन के लिए आया था,
कोई राशन कार्ड बनवाने,
तो कोई बस इस उम्मीद में कि आज शायद काम हो जाए।
लाइन के आखिर में एक दुबला-पतला आदमी खड़ा था—
नाम था गोविंद।
उम्र पचपन के आसपास।
हाथ में फ़ाइल थी,
और फ़ाइल के अंदर—
एक ही काग़ज़…
बेटी की कॉलेज परीक्षा की फीस का चालान।
क्लर्क बाहर आया और बोला,
“जिसका फ़ॉर्म अधूरा होगा, उसका नंबर कटेगा।”
गोविंद का दिल बैठ गया।
उसने फ़ॉर्म देखा—
एक कॉलम खाली था।
वह दौड़कर काउंटर पर गया,
“साहब, ये कॉलम कैसे भरेगा?”
क्लर्क ने बिना सिर उठाए कहा,
“गलत जगह आए हो।
पहले अंदर वाले बाबू से साइन करवाओ।
नंबर फिर से लगेगा।”
लाइन फिर से लगानी थी।
पास खड़े एक आदमी ने धीरे से कहा,
“पहली बार आए हो क्या?
यहाँ काम सीधे नहीं होता।”
गोविंद चुप रहा।
दूसरी बार लाइन लगी।
दोपहर हो गई।
धूप सिर पर चढ़ आई।
अब बाबू ने फ़ॉर्म देखा और कहा,
“स्टाम्प गलत है।
पचास वाला नहीं, सौ वाला लगेगा।”
गोविंद के पास सौ का स्टाम्प था नहीं।
वह बाहर निकला,
स्टाम्प वाले से बोला—
“भैया, उधार दे दो, शाम को पैसे दे दूँगा।”
स्टाम्प वाला हँसा,
“सरकारी काम में उधार?
कोई और कहानी सुनाओ।”
तीसरी बार लाइन।
अब क्लर्क झुंझलाया,
“इतनी देर क्यों लगाई?
आज का टाइम ख़त्म।
कल आना।”
गोविंद की आँखों के सामने बेटी का चेहरा घूम गया—
कल आख़िरी तारीख़ थी।
वह चुपचाप बोला,
“साहब… एक बार और देख लीजिए।”
क्लर्क ने चारों ओर देखा,
फिर धीमे से कहा,
“देखो, एक तरीका है…
लेकिन नियम के बाहर।”
गोविंद समझ गया।
उसने जेब टटोली—
चार सौ रुपए थे।
घर के लिए रखे थे।
हाथ काँपते हुए उसने पैसे फ़ाइल में रख दिए।
क्लर्क ने फ़ाइल सरकाई,
साइन किया,
और बोला—
“हो गया। जाओ।”
गोविंद बाहर निकला।
धूप अब भी वही थी,
भीड़ भी वही।
लेकिन उसके क़दम हल्के थे।
रास्ते में वह खुद से बुदबुदाया—
“सरकार से नहीं,
आज मैंने हालात से लड़ाई जीती है।”
घर पहुँचकर उसने बेटी को फ़ॉर्म थमाया।
बेटी खुशी से बोली,
“पापा, हो गया?”
गोविंद मुस्कराया,
कुछ नहीं बताया।
रात को बिस्तर पर लेटते हुए उसने सोचा—
आज मैंने कोई चाल नहीं चली…
बस ज़रूरत निभाई।
और कभी-कभी,
ज़िंदगी में पास होने के लिए
ईमान से ज़्यादा
हिम्मत चाहिए होती है।
"कभी-कभी इंसान गलत रास्ता नहीं चुनता,
बस हालात उसे सही रास्ते पर रुकने नहीं देते।"

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