ठंडी हवा का सपना
सूरज सिर के ठीक ऊपर था।
ऐसा लगता था जैसे आसमान से आग बरस रही हो।
गली में पसरी खामोशी भी गर्मी से थकी हुई थी।
छोटे से मकान की रसोई में
सरिता चूल्हे के सामने खड़ी थी।
माथे से पसीना लगातार टपक रहा था,
कमर दर्द से झुक रही थी,
और पेट में पल रहा नन्हा जीवन
मानो उससे बार-बार आराम की गुहार कर रहा हो।
“बहु… बस कर दे…”
सास धनवंती की आवाज़ काँप गई।
“तेरा आठवाँ महीना चल रहा है,
मुझसे देखा नहीं जाता तुझे ऐसे।”
सरिता ने आँचल से पसीना पोंछते हुए कहा,
“माँ, अगर मैं नहीं बनाऊँगी
तो घर कैसे चलेगा?
रोटी नहीं बनेगी
तो पेट कैसे भरेगा?”
धनवंती की आँखों के सामने
अपना बीता हुआ जीवन घूम गया—
वही जलती रसोई,
वही तपती दोपहर,
और वही मजबूरी।
पंखा ऊपर छत से लटका हुआ था,
लेकिन उसकी हवा
बस गर्म सांस जैसी लग रही थी।
उसी समय दरवाज़ा खुला।
पायल दौड़ती हुई आई।
“माँ… माँ…”
उसकी साँस फूल रही थी।
“मुझे बहुत प्यास लगी है।”
सरिता ने जल्दी से पानी दिया,
और उसके बाल सहलाए।
“धूप में क्यों खेलती है?
तबियत खराब हो जाएगी।”
पायल ने मासूमियत से कहा,
“माँ, सामने वाले घर में
ठंडी हवा आती है।
उनकी रसोई में भी बहुत ठंडक है।
आपकी रसोई में इतनी गर्मी क्यों रहती है?”
सरिता के हाथ रुक गए।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
शाम ढलते-ढलते
सरिता की आँखों के सामने अँधेरा-सा छाने लगा।
हाथ से थाली फिसल गई
और अगले ही पल
एक ज़ोर की आवाज़ के साथ
वह ज़मीन पर गिर पड़ी।
“हे भगवान!”
धनवंती की चीख पूरे घर में गूँज उठी।
मोहन घबराया हुआ दौड़ता आया।
“माँ! सरिता को क्या हो गया?”
कुछ ही देर में
डॉक्टर के कमरे की ठंडी हवा
उन्हें भीतर से सिहरा रही थी।
एसी की ठंडक थी,
लेकिन उनके दिलों में
डर की आग जल रही थी।
डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा,
“घबराने की ज़रूरत नहीं है।
इन्हें ज़्यादा गर्मी और कमजोरी हो गई है।
अब इन्हें पूरा आराम चाहिए—
ठंडी जगह और पोषण बेहद ज़रूरी है।”
मोहन ने चुपचाप सिर झुका लिया।
“ठंडी जगह…”
यह शब्द उसके कानों में
बार-बार गूँज रहे थे।
उसके लिए तो
ठंडी जगह
सिर्फ एक सपना भर थी।
रात गहरी हो चली थी।
घर के भीतर सन्नाटा पसरा था।
बस पंखे की मरी-मरी आवाज़
और दीवारों से टकराती गर्म हवा
कमरे को और बोझिल बना रही थी।
उसी खामोशी को चीरते हुए
पायल की धीमी-सी आवाज़ गूँजी—
“पापा…”
उसकी आवाज़ में मासूमियत थी,
और उससे ज़्यादा चिंता।
“माँ को बहुत तकलीफ़ होती है।
दिन भर रसोई की गर्मी में
उनका चेहरा बुझा-बुझा सा रहता है।
अगर हमारे घर में भी
ठंडी हवा आ जाए…
तो माँ ठीक हो जाएँगी न, पापा?”
मोहन के कदम वहीं थम गए।
उसने बेटी को पास बुलाया
और सीने से कसकर लगा लिया।
उसकी आँखें भर आईं—
वो आँसू थे
जो वह दिनभर छुपाए रहता था।
भर्राई हुई आवाज़ में
वह बस इतना ही कह पाया—
“हाँ बेटा…
पापा कोशिश करेंगे।
तेरी माँ को
कभी अकेले नहीं लड़ने देंगे।”
और उस रात
उस छोटे से घर में
उम्मीद ने
धीरे-धीरे
आँखें खोल लीं।
अगले दिन से
उस छोटे से घर की हवा ही बदल गई।
अब हर सदस्य
अपने सुख से पहले
दूसरे की चिंता करने लगा था।
धनवंती सुबह से देर शाम तक
और ज़्यादा खाना बनाने लगी।
हाथ काँपते थे,
कमर दुखती थी,
पर बहु के चेहरे पर
सुकून देखने की चाह
उसे थकने नहीं देती थी।
सरिता—
जिसके शरीर में अभी भी कमजोरी थी—
फिर भी हिम्मत बाँधकर
पड़ोस के घरों में काम करने जाने लगी।
हर कदम पर
अपने पेट में पलते बच्चे को
सहलाते हुए
वह खुद से कहती,
“बस थोड़ा और…
मेरे परिवार के लिए।”
मोहन का दिन
ईंट-पत्थर ढोते हुए निकलता
और रात
एक पुराने ठेले के सहारे।
गली-गली घूमते हुए
उसकी आवाज़ गूँजती—
“ठंडा नींबू पानी…
गर्मी भगाने वाला नींबू पानी…”
उसकी आवाज़ में
थकान साफ़ झलकती थी,
लेकिन उससे भी ज़्यादा
झलकता था
अपने परिवार के लिए
कुछ कर दिखाने का जज़्बा।
नन्ही पायल भी
अब छोटी नहीं रही थी।
कभी पानी भर लाती,
कभी सामान थमा देती,
तो कभी माँ का पसीना
अपने नन्हे हाथों से पोंछ देती।
उस मासूम की हर हरकत में
बस एक ही दुआ छिपी थी—
“मेरी माँ को अब कभी
गर्मी से तकलीफ़ न हो।”
एक दिन
जब सरिता काम कर रही थी,
माधुरी मालकिन ने उसका उतरा हुआ चेहरा देख लिया।
हाथ चलते थे,
पर आँखों में चमक नहीं थी।
माथे पर पसीना था,
और साँसों में थकान।
मालकिन पास आकर बोलीं,
“सरिता, क्या बात है बेटा?
आज कुछ बुझी-बुझी सी लग रही हो।”
इतना सुनते ही
सरिता जैसे अंदर से टूट गई।
जो दर्द वह कई दिनों से
अपने दिल में दबाए बैठी थी,
वह एक-एक करके
शब्द बनकर बाहर आ गया।
उसने बताया—
कैसे रसोई की आग
उसके शरीर को जला देती है,
कैसे गर्मी से
वह बेहोश होकर गिर पड़ी थी,
कैसे उसकी नन्ही बेटी
डरी-सहमी आँखों से
उसकी ओर देखती है,
और कैसे वह
बस एक ठंडी रसोई का सपना
हर रोज़ देखती है।
सरिता बोलते-बोलते चुप हो गई।
आँसू अपने आप
उसकी आँखों से बहने लगे।
माधुरी मालकिन
कुछ पल तक चुप रहीं।
फिर उन्होंने उसके कंधे पर
अपना हाथ रखा और बोलीं,
“पैसों की चिंता मत करो सरिता।
वो बाद में भी दिए जा सकते हैं।
अभी ज़रूरी है
कि तुम्हारे घर में ठंडक पहुँचे,
ताकि तुम और तुम्हारा बच्चा
सुरक्षित रह सको।”
यह सुनते ही
सरिता की आँखों से
आँसू और तेज बहने लगे—
लेकिन इस बार
वे दर्द के नहीं,
सुकून और उम्मीद के आँसू थे।
जिस दिन
घर की रसोई में
एसी लगा,
उस दिन
धनवंती ने पहली बार
सुकून की सांस ली।
ठंडी हवा चली…
और लगा जैसे
सालों की थकान
एक पल में उतर गई हो।
पायल ताली बजाकर बोली,
“माँ! अब आपको कभी गर्मी नहीं लगेगी!”
सरिता चुपचाप
रसोई के कोने में खड़ी रही।
आँखें बंद कीं
और पहली बार
खाना बनाते हुए
सिर्फ ठंडक महसूस की।
धनवंती ने कहा,
“ये एसी नहीं बहु…
ये हमारे संघर्ष की ठंडी हवा है।”
मोहन की आँखें भर आईं।
“गरीब के सपने छोटे होते हैं,
लेकिन जब पूरे होते हैं
तो सबसे ज्यादा सुकून देते हैं।”
उस दिन
उस छोटे-से घर की रसोई
केवल ठंडी नहीं हुई थी,
बल्कि वहाँ
माँ की ममता की गर्माहट,
बेटी की मासूम जिद
और
परिवार की अटूट एकता
एक साथ साँस लेने लगी थी।
वह रसोई अब
सिर्फ़ खाना बनाने की जगह नहीं रही,
बल्कि
संघर्ष से जन्मे सपनों,
त्याग से सींचे गए विश्वास
और
प्रेम से भरे भविष्य
का सबसे सुंदर प्रमाण बन चुकी थी।

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