काले रंग की बेटी
सुबह का समय था।
आँगन में हल्की धूप उतर आई थी।
तुलसी के पास रखे मटके से पानी टपक रहा था।
घर में चाय की खुशबू फैली हुई थी।
भावना देवी आँगन में चटाई बिछाकर बैठी थीं।
उनके सामने रिश्तों की तस्वीरें फैली थीं।
आज उनके बेटे रिशभ के लिए लड़की देखने लोग आने वाले थे।
घर के एक कोने में खड़ी थी उनकी बेटी — अक्षिता।
सांवला रंग, साधारण कपड़े, बिना किसी बनाव-श्रृंगार के।
लेकिन उसकी आँखों में मासूमियत थी और दिल में अपनापन।
“अक्षिता, ज़रा चाय बना ले,”
भावना देवी ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
अक्षिता ने कुछ नहीं कहा।
चुपचाप रसोई में चली गई।
कुछ देर बाद रिश्तेदार आए।
हँसी–ठहाके शुरू हुए।
भावना देवी ने फोटो निकालकर दिखाई।
“देखिए, कितनी गोरी है…
एकदम दूध जैसी।”
सब तारीफ करने लगे।
अक्षिता पास आई।
“मा, मुझे भी दिखाना।”
भावना देवी चिढ़ गईं।
“तू क्या करेगी देख कर?
तू तो काला अक्षर भैंस बराबर है।”
सबके सामने बेटी का मज़ाक उड़ाया गया।
भावना देवी ने चिढ़ते हुए फोटो अक्षिता के हाथ में पकड़ा दिया।
“ले, देख ले… कैसी है?”
अक्षिता ने फोटो देखा और धीरे से बोली—
“मा, सुंदर तो है…
लेकिन बाल थोड़े छोटे नहीं हैं?”
भावना देवी भड़क गईं।
“ओहो!
तुझे बाल भी दिख रहे हैं?
ज़रा इसका रंग देख!
लड़की कितनी सुंदर है!”
अक्षिता ने हिम्मत करके कहा—
“मा, भाईया के लिए सिर्फ रंग नहीं,
सीरत भी देखनी चाहिए।”
यह सुनते ही भावना देवी का गुस्सा फूट पड़ा।
“तू अपने भाई की फिक्र मत कर।
पहले अपनी सोच।
तेरी शादी कैसे होगी?
तुझे देखकर तो दूल्हा भाग जाएगा!”
सबके सामने बेटी को नीचा दिखाया गया।
अक्षिता का दिल टूट गया।
आँखों में आँसू भर आए।
वह बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई।
कमरे का दरवाज़ा बंद करते ही
उसके आँसू बह निकले।
“भगवान…”
वह खुद से बोली—
“आपने मुझे ही क्यों ऐसा बनाया?
क्या मेरा रंग ही मेरी सबसे बड़ी गलती है?
मेरी अपनी माँ भी मुझे पसंद नहीं करती…”
बचपन से आज तक
उसे कितनी बातें सुननी पड़ी थीं—
“काली है”,
“सुंदर नहीं है”,
“इसकी शादी मुश्किल है।”
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“अक्षिता…”
वह उसकी सहेली गीतांजलि थी।
“रो मत,”
गीतांजलि ने उसे गले लगाया।
“तू बहुत अच्छी है।
एक दिन तुझे ऐसा घर मिलेगा
जहाँ तुझे तेरे रंग से नहीं,
तेरे दिल से पहचाना जाएगा।”
अक्षिता फूट-फूट कर रो पड़ी।
कुछ ही दिनों में रिशभ की शादी सुमन नाम की लड़की से हो गई।
सुमन गोरी, सुंदर और शौक़ीन स्वभाव की थी।
घर में उसकी आते ही जैसे रौनक आ गई।
पहली रसोई का दिन आया।
रसोई में मीठी खुशबू फैल गई।
“अरे वाह!”
भावना देवी खुशी से बोल उठीं,
“मेरी दूध-सी बहू ने आज क्या बनाया है?”
सुमन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“माजी, मैंने रसमलाई बनाई है।”
“वाह!”
रिशभ हँसते हुए बोला,
“अपने जैसी चीज़ बनाई है।”
सब लोग रसमलाई का स्वाद लेने लगे।
हँसी-मज़ाक चल रहा था,
तारीफ़ों की बरसात हो रही थी।
थोड़ी दूर एक कोने में अक्षिता खड़ी थी।
चुपचाप, बिना किसी उम्मीद के।
“ननन जी, आप भी आइए,”
सुमन ने बस औपचारिकता निभाते हुए कहा।
इतना सुनते ही भावना देवी ने ताना मार दिया—
“अरे इसे रसमलाई खिलाकर क्या होगा?
कौन-सा खाने से इसका रंग बदल जाएगा!”
यह शब्द
सीधे अक्षिता के दिल में उतर गए।
उसकी आँखें भर आईं।
सीने में जैसे कुछ टूट गया।
बिना कुछ कहे,
बिना किसी को देखे,
वह चुपचाप वहाँ से चली गई।
दिन बीतते चले गए।
घर के भीतर का फर्क अब साफ़ दिखाई देने लगा था।
सुमन की ज़िंदगी में
शॉपिंग थी, पार्टियाँ थीं,
आराम था और हँसी थी।
और अक्षिता की ज़िंदगी में—
झाड़ू, पोछा, बर्तन और कपड़ों के ढेर।
वह रोज़ कॉलेज से थकी-हारी लौटती,
लेकिन आराम उसके नसीब में नहीं होता।
बैग रखती
और बिना कुछ कहे
पूरे घर के काम में लग जाती।
एक दिन थकान हद से ज़्यादा बढ़ गई।
पैर दर्द से जवाब देने लगे,
और आँखों में जलन-सी होने लगी।
हिम्मत जुटाकर उसने धीरे से कहा—
“मा… आज कॉलेज से बहुत थक गई हूँ।”
भावना देवी की आवाज़ तुरंत तेज़ हो गई—
“तो क्या अम्बानी के नौकर आकर सफाई करेंगे?
झाड़ू उठा और काम कर!”
इतने में सुमन बोली—
“माजी, चलिए ना, शॉपिंग चलते हैं।
काफ़ी देर हो रही है।”
भावना देवी बिना कुछ सोचे
उसके साथ चली गईं।
आँगन सूना पड़ गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
अक्षिता अकेली रह गई।
वह झाड़ू उठाकर
पूरे घर की सफाई करने लगी।
पसीने से उसके बाल भीग गए,
और हाथ काँपने लगे।
काम करते-करते
उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
वह खुद से ही बुदबुदाई—
“शायद भगवान ने मेरी किस्मत
अकेलेपन से ही लिखी है…”
समय धीरे-धीरे बीतता गया।
एक दिन अक्षिता के लिए भी रिश्ता आया।
लड़के का नाम राज था।
घर में सबकी नज़रें
सबसे पहले अक्षिता के रंग पर गईं।
भावना देवी ने मन ही मन सोचा—
“कौन करेगा मेरी काली बेटी से शादी?”
लेकिन जब राज ने अक्षिता को देखा,
तो उसकी आँखों में कोई झिझक नहीं थी।
उसने साफ और दृढ़ स्वर में कहा—
“मुझे अक्षिता पसंद है।
उसका रंग नहीं,
उसका स्वभाव मुझे अच्छा लगा है।”
यह सुनकर
अक्षिता की आँखें भर आईं।
वहीं, सुमन के दिल में जलन की आग भड़क उठी।
वह सोचने लगी—
“इतना समझदार, इतना अच्छा लड़का…
और मेरी ननद से शादी करेगा?
नहीं,
यह मैं होने नहीं दूँगी।”
उसकी नज़रों में
ईर्ष्या साफ झलकने लगी थी।
उसने चुपचाप एक साज़िश रच ली।
सगाई का दिन आ पहुँचा।
घर मेहमानों से भरा था।
हँसी-खुशी का माहौल था।
रस्म शुरू हुई।
अक्षिता को राज को अंगूठी पहनानी थी।
जैसे ही उसने डिब्बा खोला—
उसका चेहरा स्याह पड़ गया।
अंगूठी…
अंगूठी वहाँ थी ही नहीं।
“अरे! अंगूठी कहाँ गई?”
किसी ने घबराकर कहा।
हॉल में अफरा-तफरी मच गई।
लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
भावना देवी के चेहरे पर घबराहट साफ़ दिखने लगी।
“हे भगवान!
सगाई में ऐसा अपशकुन…”
अक्षिता की आँखों में डर उतर आया।
उसके हाथ काँपने लगे।
तभी राज आगे बढ़ा।
उसकी आवाज़ शांत थी,
लेकिन शब्द सख़्त—
“माजी,
घबराने की ज़रूरत नहीं है।
मुझे पता है अंगूठी किसके पास है।”
सब चौंक गए।
राज की नज़र सीधी
भावना देवी की बड़ी बहू पर गई।
“भाभी,”
राज ने सिर झुकाकर कहा,
“अंगूठी आपके पास है।
कृपया सबके सामने रख दीजिए।”
सुमन के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसके होंठ काँपने लगे।
“न… नहीं…
मेरे पास नहीं है,”
वह हकलाने लगी।
“झूठ मत बोलिए,”
राज ने दृढ़ता से कहा।
“मैंने सब अपनी आँखों से देखा है।”
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद
सुमन की साज़िश सबके सामने आ गई।
सच उजागर हो चुका था।
भावना देवी स्तब्ध रह गईं।
उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आज पहली बार
उन्हें अपनी सारी भूलें साफ़ दिखाई दे रही थीं।
वे धीरे-धीरे अक्षिता के पास आईं।
काँपते हाथों से उसका हाथ थाम लिया।
आवाज़ भर्रा गई—
“बेटा…
मैं अंधी थी।
मैंने रंग में उलझकर
तेरे दिल की कीमत नहीं समझी।
मुझे माफ कर दे…”
अक्षिता की आँखों से आँसू बहने लगे।
सालों का दर्द
आज उन आँसुओं में घुल गया।
“मा…”
उसके होंठ बस इतना ही कह पाए।
वह माँ से लिपट गई।
उस पल
न रंग था,
न शिकायत—
सिर्फ़
माँ-बेटी का टूटा हुआ रिश्ता
फिर से जुड़ रहा था।
उस दिन
एक माँ ने अपनी बेटी को दिल से अपनाया,
और एक बेटी ने वर्षों से जमा हुआ
अपना सारा दर्द छोड़ दिया।
उस दिन से
अक्षिता की ज़िंदगी ने नई दिशा ली।
अब वह केवल
“काली बेटी” नहीं रही।
अब वह थी —
एक अच्छी इंसान,
सम्मान और प्यार की सच्ची हक़दार बेटी।
और उसने यह सच्चाई सीख ली कि —
रंग कभी किसी इंसान की कीमत तय नहीं करता,
कीमत तय करता है उसका दिल।

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