खामोश आँगन की चीख
“मैंने कुछ नहीं किया पापा… बस खाना बनाया है…”
स्नेहा की आवाज़ काँप रही थी।
उसकी उँगलियाँ एप्रन को कसकर पकड़े थीं, जैसे वही उसे गिरने से बचा लेंगी।
“चुप!”
मोहन जी की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
“तेरी वजह से मधु की तबीयत खराब रहती है। हर वक्त शिकायत ही सुननी पड़ती है।”
कहते हुए उन्होंने स्नेहा का हाथ पकड़ लिया।
उसकी कलाई पहले से ही लाल थी, जैसे किसी ने आग से छू दी हो।
“पापा… दर्द हो रहा है… छोड़िए…”
लेकिन मोहन जी का दिल ज़रा भी नहीं बदला।
एक ज़ोरदार थप्पड़ स्नेहा के गाल पर पड़ा।
उसकी गर्दन एक तरफ झुक गई।
आँखों के आगे अँधेरा छा गया।
होंठ के किनारे से खून की हल्की-सी धार बह निकली।
“काम ठीक से नहीं होता तो यही होगा।
पढ़ाई-लिखाई के नाम पर बोझ पाल रखा है मैंने!”
उन्होंने उसे ज़ोर से धक्का दिया।
स्नेहा संतुलन खो बैठी और फर्श पर गिर पड़ी।
घुटना ज़मीन से टकराते ही
तेज़, चुभता हुआ दर्द पूरे शरीर में फैल गया।
“देखा? ऐसे ही लोग सुधरते हैं।”
दरवाज़े पर दीपक और दिव्या खड़े थे।
चुपचाप तमाशा देखते हुए।
उनकी आँखों में न डर था, न सवाल।
दूर कमरे से नानी विमला की कमजोर आवाज़ आई—
“अरे मोहन… बच्ची है…”
“बच्ची मत कहो इसे,”
मोहन जी का स्वर सख़्त हो गया,
आँखों में गुस्सा साफ़ झलक रहा था।
“अब इसे सबक सिखाना ज़रूरी है।”
स्नेहा फर्श पर बैठी सिर झुकाए रोती रही।
आँसू उसकी हथेलियों पर गिरते रहे।
जब पापा ही मारें…
तो सहारा कहाँ से ढूँढूँ?
“अब उठ और खाना बना,”
मोहन जी बोले,
“देर हुई तो फिर मार पड़ेगी।”
काँपते पैरों से स्नेहा उठी।
आँखें सूजी हुई थीं,
दिल ज़ख़्मी।
वो बिना कुछ कहे रसोई की तरफ़ चली गई।
अगला दिन...
अगले दिन आँगन में कुछ ज़्यादा ही चहल-पहल थी।
नानी विमला आई थीं।
आते ही उन्होंने दीपक और दिव्या को पास बुला लिया।
“आओ मेरे लाडलों…
देखो नानी तुम्हारे लिए क्या-क्या लाई है।”
दोनों बच्चे हँसते हुए उनके पास बैठ गए।
मधु देवी भी आकर वहीं बैठ गईं।
और स्नेहा?
वो रसोई में थी।
चुपचाप खाना बना रही थी।
थालियाँ सजाई।
एक-एक करके सबके सामने रख दी।
“नानी… खाना तैयार है।”
नानी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
थाली उठाई।
पहला कौर मुँह में रखते ही भौंहें चढ़ गईं।
“ये क्या है?”
“नमक कहाँ है इसमें?”
स्नेहा कुछ कह पाती,
उससे पहले ही—
चाँट!
नानी का हाथ उसके गाल पर पड़ा।
स्नेहा का सिर फिर एक तरफ घूम गया।
“नानी… अगर कम लग रहा है तो मैं—”
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि
नानी की आवाज़ गूँज उठी।
“बेशरम!”
नानी ग़ुस्से से चिल्लाईं,
“ऐसे ही तू मेरे बच्चों को भी तंग करती होगी!
हर बात पर बहाना, हर काम में लापरवाही!”
वो सहम गई।
“नानी, मैंने जानबूझकर कुछ नहीं—”
“हाँ मम्मी,”
बीच में ही मधु देवी बोल पड़ीं,
आवाज़ में शिकायत और ताना दोनों थे।
“ये ऐसी ही है।
बिलकुल बेवकूफ सी।
इससे कोई काम ढंग से नहीं होता।
घर में हो या बाहर,
हर जगह बस परेशानी ही करती है।”
“फिर मार क्यों नहीं देते इसे?”
नानी की आवाज़ ज़हर सी थी।
“ऐसे लोग बातों से नहीं समझते,”
उन्होंने तीखे स्वर में कहा,
“इन्हें तो लात ही सुधारती है।”
स्नेहा वहीं खड़ी रह गई।
आँखों में आँसू थे,
पर बहने की इजाज़त नहीं थी।
रसोई के एक कोने में चुपचाप खड़ी वह लड़की
उबलते बर्तन और जलती आँच के बीच
खुद से ही सवाल कर रही थी—
मेरी गलती आखिर है क्या?
क्या इसलिए कि मैं खाना बनाती हूँ?
या इसलिए कि मैं पढ़ना चाहती हूँ,
कुछ बनना चाहती हूँ?
या फिर…
सिर्फ इसलिए कि मैं ज़िंदा हूँ,
और अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीना चाहती हूँ?
उसके पास कोई जवाब नहीं था,
बस आँखों में ठहरी हुई एक खामोश पीड़ा थी,
जो किसी से कुछ कह भी नहीं पा रही थी।
खामोशी की आदत...
उस घर में स्नेहा की खामोशी सबसे ज़्यादा बोलती थी।
पर सुनने वाला कोई नहीं था।
वो हर दिन मार खाती,
हर दिन अपमान पीती,
और हर रात तकिये में मुँह छुपाकर रोती।
लेकिन किसी न किसी दिन,
कहीं भीतर ही भीतर,
एक छोटी-सी चिंगारी जल रही थी —
जो अभी आग नहीं बनी थी,
पर बुझी भी नहीं थी।
जो कह रही थी—
हर खामोशी हमेशा नहीं रहती…
कभी न कभी आवाज़ बनती है।
“उस चिंगारी को नाम अभी नहीं मिला था…
पर एक दिन वह स्नेहा को बाहर ले जाएगी।”

Post a Comment