सर्द सुबह और चुप्पी की कहानी





Indian woman standing in a kitchen during a cold winter morning, preparing tea with a calm and thoughtful expression.


सर्दियों की सुबह थी।

घड़ी में अभी ठीक पाँच ही बजे थे।

बाहर कोहरा इतना घना था कि सामने का आँगन भी धुँधला-सा लग रहा था।


रजाई के भीतर सिमटी हुई नीमा की नींद अचानक टूट गई।


“बहु… नीमा… उठ जाओ।

सुबह हो गई है।

चाय का टाइम हो गया है।”


सास की आवाज़ कानों में पड़ते ही नीमा ने आँखें खोल लीं।


मन ही मन बोली—

हे भगवान… अभी तो अँधेरा है।

इतनी ठंड में कौन पाँच बजे चाय पीता है…


लेकिन ये सारी बातें मन में ही रह गईं।

होठों तक आते-आते खामोशी बन गईं।


“हाँ माजी… उठ गई हूँ।”


नीमा रजाई से बाहर निकली।

ठंड ने जैसे सीधे हड्डियों पर वार कर दिया।


उसने जल्दी-जल्दी बालों में क्लचर लगाया,

ठंडे पानी से मुँह-हाथ धोया

और काँपते हुए रसोई की ओर बढ़ गई।


पहले गैस जला लूँ…

हाथ थोड़े से गरम हो जाएँ…


चाय चढ़ाई ही थी कि फिर आवाज़ आई—


“बहु, चाय बनी या नहीं?

इतनी देर क्यों लग रही है?”


“बस माजी… बन गई।”


नीमा ट्रे में चाय और बिस्किट रखकर ले आई।


“अरे वाह!

बिस्किट भी रख दिए।

अच्छा किया बहु।”


नीमा हल्की-सी मुस्कान देकर चुपचाप लौट गई।


अब झाड़ू…

फिर पोछा…

फिर नहाना…

और फिर नाश्ता।


उस दिन नाश्ते में फरमाइश थी—

पोहे और जलेबी।


इतनी ठंड में जलेबी…

नीमा ने मन ही मन सोचा,

पर हाथ रुके नहीं।


पूरा घर साफ करके

वो फिर रसोई में खड़ी हो गई।


पोहे बने,

जलेबी की चाशनी तैयार हुई,

और बैटर से गरम-गरम जलेबी उतरने लगीं।


तभी पति की आवाज़ आई—


“नीमा, मेरी सफेद शर्ट देखी है?”


अब यही बाकी था…


“अलमारी में टंगी है,”

नीमा ने धीरे से कहा।


पति हँसते हुए बोले—

“अरे, इतनी बढ़िया जलेबी बना रही हो

और सुबह-सुबह गुस्सा कर रही हो।”


नीमा कुछ नहीं बोली।


नाश्ता टेबल पर लगा।

सबने खाया, तारीफ़ भी हुई।


“बहु, प्याज़ भी काट देना।

पोहे में डालेंगे।”


नीमा फिर रसोई में चली गई।


दिन ऐसे ही बीतता गया।


कभी सब्ज़ी,

कभी दोपहर का खाना,

कभी चाय।


शाम तक शरीर थक चुका था,

पर काम अब भी बाकी था।


उसी घर में एक इंसान था

जो नीमा को समझता था—

उसका देवर सागर।


“भाभी, लाओ… मैं मटर छील देता हूँ।”


नीमा की आँखों में थोड़ी राहत उतर आई।


“तू ही है सागर,

जो समझता है।”


दोनों हँसते हुए काम करने लगे।


कुछ ही दिनों बाद

सागर की शादी तय हो गई।


शादी की तैयारी,

लड्डू,

मेहमान,

खरीदारी—


काम और बढ़ गया।


शादी हुई।

नई बहु अर्चना घर आई।


पहली सुबह—


“बहु… पाँच बज गए।”


अर्चना बिना किसी शिकायत के उठ गई।


“माजी, मैं चाय बना देती हूँ।”


नीमा को उस दिन

कई महीनों बाद

आठ बजे नींद खुली।


टेबल पर नाश्ता सजा था।


नीमा की आँखें भर आईं।


“अर्चना…

आज तो तूने कमाल कर दिया।”


अर्चना मुस्कराई—


“भावी, अब हम दोनों मिलकर करेंगे।”


वक़्त बीतने लगा।


दोनों बहुएँ

एक-दूसरे का सहारा बन गईं।


लेकिन घर का बोझ

अब भी कम नहीं हुआ।


एक दिन सर्द शाम को

नीमा बर्तन धो रही थी।


ठंडे पानी में

उँगलियाँ सुन्न हो चुकी थीं।


तभी उसे चक्कर आया।


बर्तन हाथ से छूट गया।


अर्चना दौड़कर आई—


“भावी… क्या हुआ?”


नीमा ज़मीन पर बैठ गई।


आँखों के सामने

अंधेरा छा गया।


घर में शोर मच गया।


“अरे, बहु को क्या हुआ?”


नीमा के होंठों से

बस इतना ही निकला—


“बहुत ठंड है…

बहुत थक गई हूँ…”


उस दिन

घर वालों ने पहली बार महसूस किया—


जो चुपचाप सब संभालती है,

वो भी इंसान है।


और

ठंड सिर्फ मौसम की नहीं होती…

कभी-कभी

दिल की भी होती है।



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