आख़िरी कौर

A newly married Indian woman sitting in a kitchen with a plate of food, reflecting quietly after finishing household work, showing emotions of care, responsibility, and family life.


रीमा की शादी को अभी दो ही महीने हुए थे।

नई जगह, नया घर, नए लोग—सब कुछ सीखने और समझने में ही दिन निकल जाते थे।


उस सुबह वह रोज़ से ज़रा पहले उठ गई थी।

सासू माँ को मंदिर जाना था,

ससुर जी को दफ़्तर निकलना था,

पति को ट्रेन पकड़नी थी।


रसोई में चूल्हा जल चुका था।

दाल उबल रही थी,

सब्ज़ी की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी।


रीमा के हाथ तेज़ी से चल रहे थे,

पर मन कहीं और था।


नाश्ता, टिफ़िन, दोपहर का खाना—

सब समय पर तैयार हुआ।


सबने खाया,

सबने तारीफ़ भी की—

“बहु, बहुत स्वाद बना है।”


फिर सब अपने-अपने काम में लग गए।


घड़ी देखी तो

दोपहर के ढाई बज चुके थे।


रीमा ने थाली निकाली,

पर भूख जैसे कहीं गुम हो गई थी।


सुबह से

एक कप चाय के सिवा

कुछ भी पेट में नहीं गया था।


पहला कौर मुँह में रखा,

लेकिन गला भर आया।

निवाला अटक गया।


अचानक

उसे अपना मायका याद आ गया।


माँ…


माँ जो हमेशा कहती थी—

“सब बाद में, पहले तू खा।”


जब भी रीमा देर करती,

माँ ज़िद पकड़ लेती—

“जब तक तू नहीं खाएगी, मैं भी नहीं खाऊँगी।”


पिता मुस्कराकर कहते—

“इस घर की रानी है ये।”


और आज…


यहाँ सब अच्छे थे,

कोई रोक-टोक नहीं थी,

पर किसी ने यह नहीं पूछा—

“बहु, तुमने खाया या नहीं?”


रीमा ने मोबाइल उठाया।

माँ का नंबर मिलाया।


“हैलो…

कैसी है मेरी बेटी?”


माँ की आवाज़ सुनते ही

रीमा की आँखें भर आईं।


“ठीक हूँ माँ…”


“खाना खाया?”


बस…

यही सवाल।


रीमा कुछ पल चुप रही,

फिर खुद को संभालते हुए बोली—

“हाँ माँ, खा लिया।”


उधर से हल्की हँसी आई—

“झूठ मत बोल,

माँ हूँ तेरी।”


“जा पहले खा ले,

फिर बात करेंगे।”


फोन कट गया।


रीमा थाली के सामने बैठी रही।

सोचती रही—


माँ कैसे समझ जाती है

बिना देखे,

बिना पूछे।


फिर उसे एहसास हुआ—


हर घर में

कोई न कोई रीमा होती है।

कोई माँ,

कोई पत्नी,

कोई बहन।


जो सबको खिलाती है,

सबका ध्यान रखती है,

पर खुद को

आख़िरी में याद करती है।


उसे अचानक भूख लगने लगी।


इस बार

निवाले गले से आसानी से उतरने लगे।


पर दिल में एक बात रह गई—


क्या हम कभी रुककर

उनसे पूछते हैं

जिन्होंने हमें खिलाया—


“तुमने खाया या नहीं?”



संदेश:


घर की रसोई

सिर्फ़ खाना बनाने की जगह नहीं होती,

वहाँ किसी का सारा दिन,

सारी थकान

और सारा प्यार पकता है।


अगर अगली बार

कोई आपके लिए थाली लगाए,

तो

एक सवाल ज़रूर पूछिए—


“आओ, साथ में खाते हैं।”


यक़ीन मानिए,

उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। 






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