पाँच बहुएँ और ठंड से निकली तरकीब
सर्दी इस साल कुछ ज़्यादा ही पड़ रही थी।
गाँव के किनारे बनी कच्ची बस्ती में ठंड जैसे हड्डियों में उतर गई थी।
पाँच भाइयों का छोटा-सा परिवार एक ही आँगन वाले टूटे-फूटे घर में रहता था।
घर में थी उनकी बूढ़ी माँ — दुलारी अम्मा,
और पाँच बहुएँ —
सीमा, रेखा, कविता, पायल और छोटी बहू सरोज।
सुबह-सुबह सीमा चूल्हे के पास बैठी थी।
“अरे राम!”
वह परेशान होकर बोली,
“ये चूल्हा फिर गीला हो गया। रात भर ओस गिरती रही।”
रेखा ठंड से काँपते हुए अपने हाथ मलने लगी और बोली—
“सर्दी में हफ्ते में मुश्किल से एक बार ही चूल्हा धो पाते हैं।
ऊपर से रोज़ रात की ओस उसे फिर से गीला कर देती है।
गीले चूल्हे में आग पकड़ती ही नहीं,
और ऐसे में खाना बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है।”
कविता ने चारों ओर देखा,
“अगर जल्दी लकड़ियाँ नहीं लाईं तो अंधेरा हो जाएगा।”
पाँचों बहुएँ सिर ढँककर जंगल की ओर चल पड़ीं।
चारों तरफ़ ठंडी हवाएँ बह रही थीं,
कोहरे की चादर फैली हुई थी
और पत्तों पर जमी ओस
पाँवों को भिगो रही थी।
सर्दी शरीर को जमा रही थी,
लेकिन पेट की आग
और परिवार की मजबूरी
उस ठंड से कहीं ज़्यादा तेज़ थी।
लकड़ियाँ काटकर जब वे लौटीं,
तभी सरोज की नज़र आँगन में पड़ी एक टूटी लोहे की टंकी पर गई।
“ये टंकी यहाँ क्यों पड़ी है?”
सरोज ने पूछा।
पायल बोली,
“नीचे से फट गई है। पानी रखने लायक नहीं।”
सरोज की आँखों में चमक आ गई।
“लेकिन आग जलाने लायक तो है!”
सब हैरान रह गईं।
सरोज ने लकड़ियाँ उस टंकी में डाल दीं,
आग जली —
और देखते ही देखते
वह टूटी हुई टंकी
आग जलाने का मज़बूत चूल्हा बन गई।
अब उसी पर खाना भी बनने लगा
और हाथ-पाँव भी सिकने लगे।
अम्मा की हालत...
“बहुओ…”
उनकी आवाज़ बहुत धीमी और कमज़ोर थी,
“अब ये कड़ाके की ठंड मुझसे सहन नहीं होती।
लगता है… मेरा समय पास आ गया है।”
उनकी बात सुनते ही
पाँचों बहुएँ फूट-फूटकर रो पड़ीं।
किसी की आँखों से आँसू थम नहीं रहे थे,
तो कोई अम्मा के पाँव सहलाते हुए
बस ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी।
सरोज से यह दृश्य देखा नहीं गया।
वह चुपचाप घर से बाहर निकल गई।
कुछ दूर जाने पर उसकी नज़र
पीपल और केले के पेड़ों पर पड़ी।
उनके बड़े-बड़े, मोटे पत्ते
ठंडी हवा में भीग रहे थे।
सरोज के मन में एक उम्मीद जागी।
उसने खुद से कहा—
“इनसे कुछ न कुछ तो किया जा सकता है।”
वह जल्दी-जल्दी पत्ते तोड़ लाई।
घर आकर पुराने, फटे कपड़ों के टुकड़े इकट्ठा किए।
अपने काँपते हाथों से
पत्तों को जोड़-जोड़कर सिलती गई
और बीच-बीच में कपड़ों के टुकड़े भरती गई।
कुछ देर में
एक मोटी, देसी रजाई तैयार हो गई।
सरोज ने वह रजाई
प्यार से दुलारी अम्मा पर ओढ़ा दी।
थोड़ी ही देर में
अम्मा के चेहरे पर सुकून उतर आया।
काँपता बदन थम गया
और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान फैल गई।
“अरे बहुओ…”
दुलारी अम्मा धीमे से बोलीं,
“अब तो मुझे बिल्कुल भी ठंड नहीं लग रही।”
पाँचों बहुओं की आँखों में आँसू थे,
लेकिन इस बार
वे आँसू डर के नहीं,
सुकून और राहत के थे।
घर को बचाने का जुगाड़...
कविता ने चिंता भरी नज़र से छत और दरवाज़े की ओर देखा और बोली—
“लेकिन बहनों, छत की दरारों और टूटे दरवाज़े से ठंडी हवा लगातार अंदर आ रही है।
जब तक इसे नहीं रोकेंगे, तब तक गर्मी टिक नहीं पाएगी।”
यह सुनते ही सब बहुओं की नज़रें बचे हुए पत्तों पर गईं।
तुरंत उन्होंने मिलकर केले और पीपल के पत्ते लिए।
किसी ने छत की दरारें ढँकी,
किसी ने दीवारों पर पत्ते बाँधे,
तो किसी ने दरवाज़े के खुले हिस्से बंद कर दिए।
थोड़ी ही देर में
घर की हालत बदल गई।
अब ठंडी हवा अंदर नहीं घुस पा रही थी।
अंगीठी की गर्माहट घर में ठहरने लगी।
कई दिनों बाद
उस कच्चे घर में
पहली बार
सुकून और गरमाहट टिक गई।
उनके पति हर रोज़ सुबह अँधेरे ही
काम की तलाश में घर से निकल जाते थे।
कभी किसी खेत में मज़दूरी मिल जाती,
तो कभी बाज़ार में बोझ उठाने का काम।
लेकिन कई दिन ऐसे भी होते
जब शाम ढलते-ढलते
वे खाली हाथ लौट आते।
थकान से टूटे शरीर,
झुकी हुई आँखें
और मन में दबा हुआ दर्द लिए
वे बस इतना ही कह पाते—
“आज भी काम नहीं मिला…”
ऐसे हालात में
घर की ज़िम्मेदारी
चुपचाप
बहुओं के कंधों पर
अपने आप आ जाती थी।
भूख की समस्या...
लेकिन सर्दी से भी ज़्यादा
अब पेट की आग जलने लगी थी।
घर में चुप्पी छा गई।
रेखा ने टूटती आवाज़ में कहा—
“आज सुबह से कुछ नहीं खाया…
अब तो आँखों के आगे अंधेरा सा लग रहा है।”
सीमा कुछ देर चुप रही,
फिर उसे अचानक याद आया।
“कल जंगल की तरफ़ जाते वक्त
मैंने मिट्टी में उगे अरबी और कंद देखे थे।
अगर किस्मत ने साथ दिया
तो शायद आज पेट भर जाए।”
पाँचों बहुएँ
फिर से ठंडी हवा और कोहरे के बीच
जंगल की ओर चल पड़ीं।
हाथ सुन्न हो रहे थे,
लेकिन उम्मीद अभी ज़िंदा थी।
मिट्टी खोदी—
तो सच में
अरबी और कंद निकल आए।
किसी की आँखों में राहत थी,
किसी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान।
वे उन्हें लेकर घर लौटीं।
अंगीठी में आग जलाई,
अरबी और कंद भूने।
जब गरम-गरम कंद
दुलारी अम्मा के हाथ में रखे गए,
तो उनकी आँखें भर आईं।
“आज तो भगवान ने खुद
हमारे लिए खाना भेज दिया,”
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा।
उस दिन
भूख तो शांत हुई,
लेकिन साथ ही
एक नई उम्मीद भी जन्म ले चुकी थी।
नया विचार...
सरोज ने धीरे से कहा,
“सर्दियों में लोगों को गरम-गरम कंद बहुत पसंद आते हैं,
लेकिन हमारे गाँव के बाज़ार में ये मिलते ही नहीं।”
पायल की आँखों में उम्मीद चमकी।
“अगर हम इन्हें भूनकर बेचें तो?”
कविता ने ठंडी हवा से सिकुड़ते हुए चिंता जताई,
“लेकिन इतनी कड़ाके की ठंड में
हम सुबह से शाम तक बाहर कैसे बैठ पाएँगे?”
सरोज हल्के से मुस्कुराई।
“जिस तरह हमने अम्मा के लिए
पत्तों से रजाई बनाई थी,
उसी तरह अपने लिए भी
कुछ ऐसा जुगाड़ करेंगे
जो हमें ठंड से बचा सके।”
पत्तों से बने कपड़े...
पाँचों बहुओं ने मिलकर
केले और पीपल के बड़े–बड़े पत्ते इकट्ठा किए।
पुराने, फटे हुए कपड़ों के टुकड़े
उन्होंने अंदर भर दिए
और ऊपर से पत्तों की मोटी परत चढ़ा दी।
हाथों की कच्ची सिलाई थी,
पर मेहनत सच्ची थी।
वे जैकेट जैसे कपड़े पहनके
जब एक–दूसरे को देखने लगीं,
तो हल्की–सी मुस्कान उनके चेहरों पर आ गई —
कम से कम अब ठंड से बचाव तो था।
अगली सुबह
कंदों की टोकरी उठाए
वे बाज़ार पहुँचीं।
ठंडी हवा चल रही थी,
पर पत्तों की परत ने
उन्हें काँपने नहीं दिया।
बाज़ार में लोग चलते–चलते रुकने लगे।
किसी की नज़र उनके कपड़ों पर गई,
तो कोई हैरानी से देखने लगा।
एक आदमी ने ठहरकर पूछा —
“बहन जी, ये आपने क्या पहना है?”
सरोज ने बिना झिझक,
सीधे और सादे शब्दों में कहा —
“ये गरीबी का जुगाड़ है साहब।”
उसकी बात में न शर्म थी,
न शिकायत —
बस सच्चाई थी।
किसी ने मोबाइल निकाला,
तस्वीर ली।
किसी ने वीडियो बनाया।
और किसी को तब भी अंदाज़ा नहीं था
कि यही सादा–सा जुगाड़
उनकी ज़िंदगी की दिशा
बदलने वाला है।
किस्मत का मोड़...
कुछ ही दिनों में
उन बहुओं का वीडियो
मोबाइल से मोबाइल
और गाँव से शहर तक फैल गया।
लोग हैरानी से देख रहे थे—
गरीबी में भी
इतना अनोखा जुगाड़!
एक दिन
शहर से एक व्यापारी
सीधे उनके घर पहुँचा।
उसने कहा—
“मैंने आप लोगों का वीडियो देखा है।
इतनी ठंड में
पत्तों से बने ये जैकेट
वाकई कमाल हैं।
अगर आप ऐसे जैकेट
नियमित रूप से बनाएँ,
तो मैं आपसे सब खरीद लूँगा
और अच्छी कीमत भी दूँगा।”
पहले तो
पाँचों बहुएँ घबरा गईं,
लेकिन फिर
एक-दूसरे की ओर देखकर
हिम्मत जुटाई।
सबने मिलकर काम शुरू किया।
कोई पत्ते लाता,
कोई सिलाई करता,
तो कोई डिजाइन सँभालता।
दिन बीतते गए
और धीरे-धीरे
उनके हाथों की मेहनत
पैसों में बदलने लगी।
अब घर में
कभी आटे की कमी नहीं होती,
दाल चूल्हे पर रोज़ पकती,
और बच्चों व बुज़ुर्गों के लिए
ढंग के कपड़े आने लगे।
जो घर
कल तक
ठंड और भूख से काँपता था,
आज वहीं
सुकून और उम्मीद
बसने लगी।
दुलारी अम्मा आँगन में बैठी
अपनी बहुओं को काम करते हुए देखती रहीं।
उनकी थकी हुई आँखों में अब संतोष था,
और काँपते होंठों पर एक सच्ची मुस्कान।
वे भर्राई आवाज़ में बोलीं—
“गरीबी ने हमें झुकाने की कोशिश ज़रूर की,
लेकिन तोड़ नहीं पाई।
तुम पाँचों की समझ, मेहनत
और हिम्मत ने हमें फिर से जीना सिखा दिया।”
और सच यही था—
अब वे बहुएँ
सिर्फ़ ठंड से नहीं लड़ रहीं थीं,
वे आत्मसम्मान की उस गर्माहट में जी रही थीं
जो किसी आग से नहीं,
संघर्ष और जुगाड़ से पैदा होती है।

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