दो बहुएँ, एक घर और बदलता हुआ दिल

 

Young Indian elder daughter-in-law sitting beside her mother-in-law in a village home, emotional family bonding and respect


गाँव के किनारे बसा था शर्मा परिवार का पुराना मकान।

ईंटों की दीवारें, खपरैल की छत और आँगन में एक नीम का पेड़।

घर पुराना था, लेकिन उसमें रहने वालों के दिल कभी खाली नहीं थे।


घर के मुखिया थे हरिशंकर शर्मा

और उनकी पत्नी कमला देवी —

थोड़ी सख़्त, थोड़ी तुनकमिज़ाज,

लेकिन दिल से बुरी नहीं।


उनके दो बेटे थे —

रमेश (बड़ा) और सुरेश (छोटा)


रमेश की शादी पाँच साल पहले सीमा से हुई थी।

सीमा गरीब घर से आई थी,

लेकिन संस्कारों में अमीर थी।


सुबह सबसे पहले उठना,

सास-ससुर की सेवा,

घर का सारा काम बिना शिकायत के करना —

यही उसकी दिनचर्या थी।


कमला देवी अक्सर कहती थीं —

“काम तो ठीक करती है,

लेकिन इसमें वो बात नहीं जो आजकल की बहुओं में होती है।”


सीमा चुप रहती।

क्योंकि उसने सीखा था —

घर रिश्तों से चलता है, जवाबों से नहीं।



नई बहु का आगमन...


कुछ साल बीत गए।

अब छोटे बेटे सुरेश की शादी तय हुई।


लड़की शहर में पली-बढ़ी थी।

नाम था — नेहा।


पढ़ी-लिखी, आधुनिक सोच वाली,

अच्छे और संपन्न परिवार से आई थी।

शादी में दहेज भी खूब आया।


शादी वाले दिन

घर रोशनी और खुशियों से जगमगा उठा।

ढोल-नगाड़ों की आवाज़,

मेहमानों की चहल-पहल

और आँगन में फैली नई उम्मीदें।


कमला देवी ने नेहा को गले लगाते हुए कहा —

“अब हमारे घर में सच-मुच रौनक आ जाएगी।”


थोड़ी दूरी पर खड़ी सीमा यह सब चुपचाप देख रही थी।

चेहरे पर मुस्कान थी,

लेकिन दिल के किसी कोने में

एक अनकही-सी चुभन उभर आई थी।


वह मुस्कुरा तो रही थी,

पर मन ही मन समझ चुकी थी —

अब इस घर में

कुछ बदलने वाला है।



तुलना की शुरुआत...


नेहा के आते ही घर बदलने लगा।


पुराने बर्तन हटे,

नए क्रॉकरी सेट आए।

पुराने पर्दे उतरे,

नए चमकदार परदे लगे।


कमला देवी हर बात पर कहतीं —

“सीमा, कुछ नेहा से सीखो।

ज़माना बदल गया है।”


अगर नेहा चाय बनाए —

“वाह! क्या स्टाइल है।”


अगर सीमा वही चाय बनाए —

“ठीक है… रोज़ जैसी।”


धीरे-धीरे

नई बहु और पुरानी बहु का फर्क

घर में साफ दिखने लगा।



सीमा का दर्द...


एक दिन त्यौहार आया।

सीमा ने हमेशा की तरह

अपने हाथों से हलवा बनाया।


नेहा ने केक मंगवा लिया।


मेहमानों ने केक की तारीफ की।

कमला देवी बोलीं —

“अब कौन हलवा खाता है,

ये तो पुराने जमाने की चीज़ है।”


सीमा की आँखें भर आईं।

पर उसने आँसू रसोई में ही गिरा दिए।



सच का आईना...


कुछ महीनों बाद

कमला देवी बीमार पड़ गईं।


बुखार, कमजोरी,

चलना-फिरना मुश्किल।


नेहा ने कहा —

“मम्मी जी,

मुझे ऑफिस का काम है,

आज अस्पताल सीमा भाभी ही ले जाएँगी।”


सीमा बिना कुछ बोले

सास को सहारा देकर

डॉक्टर के पास ले गई।


दवा, खाना,

रात भर जागकर देखभाल —

सब कुछ।


उस रात

कमला देवी की आँख खुली।


उन्होंने देखा —

सीमा ज़मीन पर बैठी

उनके पैर दबा रही थी।


कमला देवी की आँखों से आँसू बह निकले।



पछतावे की घड़ी...


सुबह कमला देवी ने सबको बुलाया।


उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा —

“मैंने फर्क किया…

नई और पुरानी बहु में।”


“लेकिन आज समझ आया

कि घर चलाने के लिए

दिखावा नहीं,

दिल चाहिए।”


उन्होंने सीमा का हाथ पकड़ा —

“मुझे माफ कर दे बहु।”


सीमा रो पड़ी।

पहली बार उसे

अपनी अहमियत महसूस हुई।


नेहा भी आगे आई —

“भाभी,

गलती मुझसे भी हुई।

मैं खुद को बेहतर समझ बैठी।”




एक घर, एक दिल...


उस दिन के बाद

घर में फर्क खत्म हो गया।


अब तारीफ काम की होती,

चेहरे की नहीं।


नेहा और सीमा

मिलकर रसोई संभालतीं।


कमला देवी अक्सर कहतीं —

“मेरी दोनों बहुएँ

घर की दो आँखें हैं।”


आँगन में फिर हँसी लौट आई।

पुराना घर

फिर से घर बन गया।



कहानी की सीख:


न कोई बहु नई होती है,

न कोई बहु पुरानी।

जो रिश्तों को दिल से निभाए,

वही कहलाती है सच्ची घर की रानी।

जो प्रेम, धैर्य और अपनापन

घर के हर कोने में भर दे,

वही बहु असली लक्ष्मी होती है,

जो परिवार को दिल से संभाले।



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