एक रात की मेहमान

 

Emotional Indian family scene showing a woman in a simple kitchen with her sister-in-law, reflecting love, responsibility, and family bonds.


सुबह के सात बजे थे।


रसोई में चाय का पानी उबल रहा था और पूजा की आँखें बार-बार घड़ी पर जा रही थीं।

आज उसकी ननद राधा आने वाली थी।


अचानक उसके मन में जाने कहाँ-कहाँ की बातें उमड़ने लगीं।


“अभी तो बच्चों की फीस जमा की है, ऊपर से गैस खत्म, राशन अलग…

अब ये राधा भी आ रही है। दो दिन रुकेगी तो खर्चा ही खर्चा।”


पूजा के होंठ बड़बड़ाने लगे।


“कहती है — भैया, मां से मिलने का मन कर रहा था।

मन तो मेरा भी करता है अपने मायके जाने का,

पर क्या ज़िम्मेदारियाँ सिर्फ मेरी ही नहीं हैं?”


कमरे में बैठे अख़बार पढ़ते हुए अमित

उसकी हर बात सुन रहा था,

लेकिन कुछ बोला नहीं।


वह पूजा को अच्छी तरह जानता था।

वह बुरी नहीं थी —

बस ज़िंदगी की लगातार मार ने

उसे थका दिया था।


थोड़ी देर बाद

वह चुपचाप स्टेशन के लिए निकल गया।



दोपहर होते-होते राधा आ पहुँची।


सादी-सी सूती साड़ी पहने,

हाथ में छोटा सा बैग

और चेहरे पर वही पुरानी, अपनापन भरी मुस्कान।


मां ने जैसे ही उसे देखा,

उनकी आँखें भर आईं।

काँपती आवाज़ में बस इतना ही कह सकीं—

“पूरा साल हो गया बेटा…”


पूजा ने बिना कुछ कहे

जल्दी-जल्दी दाल-चावल परोस दिए।

मां का मन था कि बेटी आई है तो

कुछ अच्छा बनाऊँ,

पर पूजा के चेहरे की सख़्ती देखकर

वह अपने मन की बात मन में ही दबा गईं।


राधा ने बड़े चाव से खाना खाया।

हर कौर में जैसे अपनापन घुला हो।


“भाभी, बहुत स्वादिष्ट है,”

कहते हुए उसने मुस्कराकर पूजा की ओर देखा।


पूजा ने बस हल्की सी गर्दन हिला दी,

उसके चेहरे पर न मुस्कान थी

और न ही कोई शिकवा—

बस थकान थी, बहुत सारी।




राधा उस रात वहीं रुक गई।


रात का ज़्यादातर समय वह बच्चों के साथ बिताती रही।

कभी उनके स्कूल की बातें सुनती,

कभी उनकी पसंद-नापसंद पूछती,

तो कभी उनके खिलौनों से खेलती रही।


हर छोटी बात वह ऐसे ध्यान से सुन रही थी

जैसे महीनों की दूरी एक ही रात में समेट लेना चाहती हो।


सुबह होते ही उसने धीरे से कहा,

“भैया, अब मुझे निकलना होगा।”


मां की आँखें भर आईं।

उन्होंने भारी मन से कहा,

“एक दिन और रुक जाती बेटा…”


राधा हल्की सी मुस्कान के साथ बोली,

“मां, काम बहुत है।”


और यह कहकर वह उठ खड़ी हुई।


उधर पूजा ने राहत की एक लंबी साँस ली।




राधा चली गई।


घर फिर अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया।


शाम को अमित कमरे में आया तो कोने में एक बैग रखा दिखा।


“पूजा, लगता है राधा अपना बैग भूल गई है।”


पूजा ने झुंझलाते हुए बैग खोला।


अगले ही पल उसके हाथ काँप गए।


अंदर कुछ नए कपड़े थे —

बच्चों के लिए।

मां के लिए दवाई का पैकेट।

और एक सफेद लिफाफा।


लिफाफे में कुछ नोट थे

और एक मुड़ा हुआ काग़ज़।


पूजा ने पढ़ना शुरू किया —


> **“भाभी,

बच्चों के लिए कपड़े हैं।

मां की दवाइयाँ खत्म हो रही थीं।

पैसे भैया और मां के लिए हैं।


मैं कुछ हाथ से देती तो आप मना कर देतीं।

इसलिए चुपचाप रखकर जा रही हूँ।


मायके आकर कुछ ले जाने नहीं आई थी,

बस थोड़ा सा लौटाने आई थी।


– राधा”**




काग़ज़ पूजा के हाथ से गिर गया।


आँखों के आगे धुंध छा गई।


उसे याद आया —

राधा की सादी साड़ी,

छोटा सा बैग,

और उसका झुका हुआ चेहरा।


अमित चुपचाप खड़ा सब देख रहा था।


पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।


“मैं कितना गलत सोच रही थी…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।


अमित ने धीरे से कहा,

“बेटियाँ मायके बोझ बनने नहीं आतीं पूजा,

वे तो बस रिश्तों को ज़िंदा रखने आती हैं।”


पूजा कुछ नहीं बोली।


उस रात वह देर तक जागती रही।


मन में एक ही सवाल घूमता रहा —


एक रात के लिए मायके आने वाली बेटियाँ

आख़िर अपने साथ क्या ले जाती हैं?

या फिर…

चुपचाप बहुत कुछ देकर लौट जाती हैं।




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