खामोश सुबह

Indian woman standing alone in a kitchen during early morning, expressing emotional exhaustion and quiet strength


सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे।

घर अभी आधी नींद में था, लेकिन रसोई में चूल्हा जल चुका था।


सिमरन अकेली रसोई में खड़ी थी।

एक हाथ से कढ़ाही में सब्ज़ी चलाती, दूसरे हाथ से रोटियों का आटा गूँधती जा रही थी।

मन में बार-बार समय देख रही थी — सबको जल्दी थी, लेकिन उसे नहीं।


स्टोव पर दूध उबल रहा था, साथ में अमित के लिए नाश्ता भी निकालना था।

अचानक पीछे से किसी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई।


“चाची…!”


सिमरन ने पलटकर देखा।

राजू स्कूल की ड्रेस में खड़ा था, बैग लटका हुआ।


वह सिमरन की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोला,

“चाची, मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है। पहले मेरा लंच पैक कर दो।”


सिमरन ने गहरी साँस ली।

थोड़ी थकी हुई आवाज़ में बोली,

“राजू, तुम्हें दिख नहीं रहा? मैं खाना बना रही हूँ, तुम्हारे चाचा का नाश्ता भी निकाल रही हूँ। दो मिनट रुक नहीं सकते?”


राजू का मुँह बन गया।

उसे डाँट सहन नहीं हुई।


इतने में कमरे से अमित की आवाज़ आई,

“सिमरन! कहाँ रह गई? मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रहा है।”


सिमरन का दिल भारी हो गया।

एक तरफ बच्चा, दूसरी तरफ पति, और रसोई का सारा बोझ — सब उसी पर।


राजू रोते हुए बाहर चला गया।


कुछ देर बाद सिमरन सब कुछ समेटकर अमित का नाश्ता लेकर बाहर आई।

टेबल पर सब बैठे थे।


लेकिन उसके आते ही सवालों की बौछार शुरू हो गई।


जेठानी ने नाराज़ होकर कहा,

“सिमरन, तुमने मेरे बेटे को डाँटा क्यों?”


सिमरन कुछ बोलती, उससे पहले जेठानी खुद ही बोलने लगीं,

“अगर मेरा छठा महीना न चल रहा होता,

अगर मेरी प्रेग्नेंसी में कॉम्प्लिकेशन न होते,

तो मैं घर के सारे काम खुद ही कर लेती।

जब तुम नहीं थी, तब मैंने ही पूरा घर संभाला था।”


उनकी आवाज़ ऊँची होती चली गई।


“मेरे बेटे को स्कूल के लिए देर हो रही है,

उसने बस टिफिन पैक करने को कहा था,

तुमने उसे डाँट दिया?”


सिमरन की आँखें झुक गईं।


तभी ननद बोली,

“और भाभी, सच कहूँ तो आप बहुत स्लो काम करती हो।

थोड़ा जल्दी हाथ चलाया करो।

भैया का नाश्ता दे दिया हो तो अब हमारा भी लगा दो।

मुझे कॉलेज के लिए लेट हो रहा है।”


सिमरन ने किसी की तरफ नहीं देखा।

वह चुपचाप प्लेटें लगाने लगी।


किसी ने यह नहीं पूछा कि

वह कब से खड़ी है,

उसने कुछ खाया भी है या नहीं।


घर में सब बोल रहे थे,

लेकिन सिमरन की आवाज़ कोई नहीं सुन रहा था।


उसके हाथ काम कर रहे थे,

पर मन अंदर से थक चुका था।



सिमरन ने सबको नाश्ता परोस दिया।

टेबल पर बैठे लोग खाने में लग गए,

जैसे कुछ हुआ ही न हो।


लेकिन सिमरन…

वह वहीं खड़ी रही।


किसी ने नहीं कहा—

“तुम भी बैठो।”

किसी ने नहीं पूछा—

“तुमने कुछ खाया?”


उसने चुपचाप खाली प्लेटें उठाईं

और रसोई में आ गई।


चूल्हा अब ठंडा था,

लेकिन उसके अंदर कुछ जल रहा था।


उसने सिंक में प्लेट रखी

और नल खोल दिया।

पानी की आवाज़ में

उसकी सिसकी दब गई।


आज पहली बार उसे थकान

शरीर में नहीं,

आत्मा में महसूस हुई।


वह सोचने लगी—


> *सुबह से सबके लिए दौड़ रही हूँ।

किसी के लिए मैं पत्नी हूँ,

किसी के लिए चाची,

किसी के लिए बहू।


लेकिन मैं…

मैं खुद क्या हूँ?*




आईने में उसने खुद को देखा।

बिखरे बाल,

सूनी आँखें,

और चेहरे पर वो मुस्कान

जो कब की झूठी हो चुकी थी।


उसी वक्त पेट में हल्की-सी हलचल हुई।

उसने हाथ पेट पर रखा।


पहली बार उसे एहसास हुआ—

यह शरीर सिर्फ सबका सहारा नहीं,

किसी का घर भी है।


उसने गहरी साँस ली।


बाहर से आवाज़ आई,

“सिमरन, जल्दी आओ, देर हो रही है।”


आज उसने जवाब नहीं दिया।


पहली बार

उसने काम बीच में छोड़ा,

और चुपचाप अपने कमरे में आ गई।


दरवाज़ा बंद किया।


बिस्तर पर बैठकर

उसने आँखें बंद कीं।


आँसू गिरे,

लेकिन अब वो कमज़ोरी नहीं थे।


वो सालों की चुप्पी थे

जो आज बह निकली।


उसने मन ही मन कहा—


> *मैं बुरी नहीं हूँ।

और न ही मैं सुस्त हूँ।


मैं बस थकी हुई हूँ…

बिना रुके, बिना सुने,

सबका ख्याल रखते-रखते।*




बाहर ज़िंदगी वैसे ही चलती रही।

लेकिन उस कमरे में

एक औरत

खुद को फिर से

साँस लेना सिख रही थी।


क्योंकि

हर रिश्ते से पहले

वह भी एक इंसान थी।


और आज

उसने खुद को

पहली बार

सुना था।




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