एक सहारा
सुबह का समय था।
रसोई में चूल्हे पर दूध उबल रहा था।
अनु के हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।
“भाभी… मुझे बहुत डर लग रहा है…”
रीमा की आवाज़ घबराहट से भरी हुई थी।
अनु ने चौंककर पलटकर देखा।
रीमा दरवाज़े के सहारे खड़ी थी।
चेहरा पीला पड़ चुका था और माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
“रीमा! तुम ठीक तो हो?”
इतना कहते ही अनु घबराकर उसकी ओर दौड़ी।
लेकिन अगले ही पल रीमा लड़खड़ाई
और ज़मीन पर गिर पड़ी।
“अरे कोई है!
जल्दी डॉक्टर को बुलाओ!”
अनु की चीख सुनते ही पूरा घर जमा हो गया।
कुछ ही देर में डॉक्टर आ गए।
जाँच हुई।
कमरे में अजीब सा सन्नाटा छा गया।
डॉक्टर ने भारी आवाज़ में कहा—
“ये लड़की माँ बनने वाली है।”
यह सुनते ही सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
रीमा की माँ, शारदा देवी, गुस्से से लाल हो उठीं।
डॉक्टर के जाते ही उन्होंने रीमा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
“शर्म नहीं आई तुझे?
घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी!
बता, किसका पाप है ये?”
रीमा फूट-फूट कर रोने लगी।
“माँ…
मेरे बच्चे को पाप मत कहो।
मैंने कोई गुनाह नहीं किया…
मैंने सिर्फ प्यार किया था…”
बीते पल...
कॉलेज का वह दिन आज भी रीमा की आँखों के सामने बिल्कुल साफ़ था।
“रीमा, तुम पर हर रंग अच्छा लगता है।”
आदित्य मुस्कराते हुए बोला था।
रीमा ने इधर-उधर देखा और धीमे से कहा,
“कोई देख लेगा…”
आदित्य हँस पड़ा।
“डर क्यों? मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
समुद्र किनारे की ठंडी हवा चल रही थी।
लहरों की आवाज़ के बीच आदित्य घुटनों पर बैठ गया और उसने रीमा की उँगली में अंगूठी पहनाते हुए कहा—
“Will you marry me?”
उस पल रीमा की आँखों में सपने उतर आए थे।
उसे लगा था, अब उसकी ज़िंदगी सच में सँवर जाएगी।
लेकिन सच उससे कहीं ज़्यादा कड़वा था।
“तुमने सोचा भी कैसे कि मैं तुम जैसी लड़की से शादी करूँगा?”
आदित्य की आवाज़ में अब कोई अपनापन नहीं था।
रीमा की आवाज़ काँप उठी।
“तो फिर ये बच्चा…?”
आदित्य ने बेरुखी से कहा—
“Sorry…
सुंदर लड़कियाँ मेरी कमजोरी हैं।”
ये शब्द रीमा के दिल में छुरी की तरह उतर गए।
उसी दिन वह अंदर से पूरी तरह टूट गई।
भाभी का सहारा...
सबसे पहले अनु उसके साथ खड़ी हुई।
“इसमें रीमा की कोई गलती नहीं है,
और ना ही इस बच्चे का कोई दोष है।”
तभी उसके पति ने भी दृढ़ स्वर में कहा—
“मैं अपनी बहन के साथ हूँ।”
लेकिन समाज कब चुप रहने वाला था?
“इस बच्चे को गिरा दो।”
“कुँवारी माँ को कौन अपनाएगा?”
हर तरफ़ नफ़रत और तानों का ज़हर फैला था।
तब अनु सबके सामने आगे आई और बोली—
“एक बार रीमा के दिल को देखिए।
उसके भीतर बसती माँ को मत मारिए।”
धीरे-धीरे समय बीतने लगा।
अनु हर निवाला खुद गिनकर रीमा को देती।
जब उसके पैरों में सूजन आ जाती,
तो वह अपने हाथों से तेल लगाकर मालिश करती।
रीमा की आँखें भर आतीं।
वह हिचकिचाते हुए पूछती—
“भाभी… आप मेरे लिए इतना सब क्यों करती हैं?”
अनु ने प्यार से उसका माथा सहलाया और कहा—
“क्योंकि तुम सिर्फ़ मेरी ननद नहीं,
मेरी बहन हो।”
गोध भराई...
रीमा चुपचाप बोली—
“काश मेरी भी गोध भराई होती…”
उसके शब्द अनु के दिल में तीर की तरह उतर गए।
एक पल के लिए अनु कुछ कह नहीं पाई।
उसकी आँखें भर आईं।
उसी क्षण उसने एक फैसला कर लिया।
समाज क्या कहेगा,
लोग क्या सोचेंगे—
इन सबकी परवाह किए बिना
अनु ने रीमा की गोध भराई करवाई।
घर में दीये जले।
रीमा की सूनी गोद फूलों से सजी।
पड़ोस की औरतें आईं,
कुछ ने बधाइयाँ दीं,
तो कुछ ताने लेकर पहुँचीं।
“बेशर्मी की भी कोई हद होती है!”
“ऐसी लड़कियों को बढ़ावा दिया जा रहा है!”
फुसफुसाहटें तेज़ होती जा रही थीं।
तभी अनु सबके सामने खड़ी हो गई।
उसकी आवाज़ शांत थी,
लेकिन शब्दों में आग थी—
“औरत होकर अगर औरत का अपमान करना ही है,
तो आप सबको शर्म आनी चाहिए।
माँ बनने का दर्द
ना शादी पूछता है,
ना समाज की इजाज़त।
जिस दिन आप सबने
औरत की पीड़ा को समझ लिया,
उस दिन किसी रीमा को
अपनी माँ बनने पर शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।”
अनु की बात सुनकर
पूरा आँगन खामोश हो गया।
तानों की जगह
अब सिर्फ़ सन्नाटा था।
नौ महीने पूरे हो चुके थे।
दर्द, डर और उम्मीद से भरे उन लंबे दिनों के बाद
रीमा ने एक नन्ही-सी बच्ची को जन्म दिया।
नर्स ने जब बच्ची को उसकी गोद में रखा,
तो रीमा की आँखों से अपने आप आँसू बह निकले।
वो आँसू डर के नहीं थे—
वो सुकून, राहत और माँ बनने की पहली खुशी के आँसू थे।
कुछ दिन बाद, अस्पताल के कमरे का दरवाज़ा खुला।
हाथ में फूलों का गुलदस्ता लिए
एक शांत-सा चेहरा अंदर आया।
वो समीर था—
अनु का मुँहबोला भाई।
उसने बच्ची की ओर देखा,
फिर रीमा की आँखों में झाँकते हुए धीरे से कहा—
“इस बच्ची को सिर्फ़ माँ का प्यार ही नहीं,
एक पिता का नाम भी चाहिए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
समीर ने आगे कहा—
“अगर रीमा चाहे,
तो मैं इस बच्ची की हर ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार हूँ।
मैं ज़िंदगी भर इसका साथ निभाऊँगा।”
रीमा ने समीर की ओर देखा।
पहली बार उसके दिल से बोझ उतर गया।
उसने गहरी साँस ली—
जैसे महीनों बाद उसे चैन मिला हो।
उस पल उसे लगा,
शायद ज़िंदगी फिर से मुस्कुराना सीख रही है।
विदाई..
शादी के दिन
शादी का मंडप सजा हुआ था।
हल्दी और फूलों की खुशबू हवा में घुली हुई थी।
रीमा दुल्हन के जोड़े में सजी,
लेकिन उसकी आँखें बार-बार अपनी भाभी अनु को खोज रही थीं।
जैसे ही विदाई का समय आया,
रीमा ने अचानक अनु का हाथ कसकर थाम लिया।
उसकी आवाज़ भर्रा गई—
“भाभी…
अगर आप मेरी ज़िंदगी में नहीं होतीं,
तो शायद आज मैं यहाँ तक पहुँच ही नहीं पाती।
मैं अंदर से पूरी तरह टूट चुकी होती…”
अनु की आँखें भर आईं।
उन्होंने प्यार से रीमा के सिर पर हाथ फेरा और कहा—
“अब पीछे मत देखना, रीमा।
जो बीत गया, उसे वहीं छोड़ दो।
आज से तुम्हारी ज़िंदगी की नई शुरुआत है।
याद रखना—
तू सिर्फ एक माँ नहीं है,
तू एक बहादुर और मजबूत औरत है।”
रीमा ने आँसुओं के बीच मुस्कराकर सिर हिलाया।
अपनी बच्ची को सीने से लगाते हुए
वह नए रिश्तों, नए सपनों
और एक नई ज़िंदगी की ओर बढ़ चली।
संदेश:
“हर इंसान से कभी-न-कभी गलती हो जाती है,
पर जब पूरी दुनिया मुँह फेर ले,
तब किसी एक इंसान का थाम लिया हुआ हाथ
ज़िंदगी फिर से जीना सिखा देता है।
औरत की सबसे बड़ी ताक़त
उसके साथ खड़ी
एक और औरत होती है।”

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