अनपढ़ नहीं, समझदार बहू
राधा को शादी के बाद आए अभी कुछ ही दिन हुए थे, लेकिन पूरा घर जैसे उसकी मौजूदगी से बदल सा गया था।
सुबह मंदिर की घंटी, रसोई से आती मसालों की खुशबू और हर किसी के लिए समय पर काम—सब कुछ अपने आप होने लगा था।
लेकिन सुमित्रा के मन में एक बात अब भी खटक रही थी।
इंग्लिश।
उसे लगता था कि आज के ज़माने में अगर बहू को इंग्लिश नहीं आती, तो कहीं न कहीं उसकी इज़्ज़त कम हो जाती है।
एक दिन सुमित्रा अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी। बातों-बातों में कमला बोली,
“सुमित्रा, तुम्हारी छोटी बहू तो बड़ी संस्कारी है। लेकिन पढ़ी-लिखी नहीं है ना?”
ये सुनकर सुमित्रा का दिल बैठ सा गया।
वो हल्की हँसी हँसकर बोली,
“हाँ… बस दसवीं तक पढ़ी है।”
कमला ने बात बदल दी, लेकिन सुमित्रा के मन में वही सवाल घूमने लगा—
लोग क्या कहेंगे?
उसी शाम विहान ऑफिस से लौटा।
राधा ने हमेशा की तरह पानी दिया, खाना परोसा और चुपचाप बैठ गई।
खाना खाते-खाते विहान बोला,
“राधा, तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है?”
राधा थोड़ी घबरा गई, फिर बोली,
“हाँ… मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। लेकिन आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला।”
“क्यों?”
विहान ने सीधा सवाल किया।
राधा ने धीरे से कहा,
“पापा बीमार हो गए थे। घर संभालना पड़ा। फिर शादी की बात चल गई।”
विहान कुछ देर चुप रहा।
फिर मुस्कराकर बोला,
“अगर तुम चाहो, तो आगे पढ़ सकती हो।”
राधा की आँखें भर आईं।
“सच?”
“हाँ। सीखने की कोई उम्र नहीं होती।”
सुमित्रा का डर...
अगले दिन सुमित्रा ने देखा कि राधा अख़बार हाथ में लिए चुपचाप बैठी थी।
वह बहुत धीरे-धीरे पढ़ रही थी।
कई शब्दों पर उसकी ज़ुबान अटक जाती,
लेकिन वह रुकती नहीं थी।
एक शब्द समझ न आए तो दोबारा पढ़ती,
फिर आगे बढ़ जाती।
उसे यूँ मेहनत करते देख
सुमित्रा का मन कुछ पल के लिए पिघल गया।
वह सोचने लगी,
“ये बहू तो सच में सीखना चाहती है…
फिर मैं ही इसे आगे बढ़ने से क्यों रोक रही हूँ?”
लेकिन उसी पल
दिल के किसी कोने से डर सिर उठाने लगा।
एक अनजानी चिंता उसके मन में घर करने लगी—
“अगर ये बहू ज़्यादा पढ़-लिख गई,
तो क्या ये इस घर से दूर हो जाएगी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि पढ़ाई
इसे मुझसे और इस घर से अलग कर दे?”
सुमित्रा इसी सोच में डूबी रह गई,
और राधा…
अख़बार के हर शब्द के साथ
अपनी दुनिया थोड़ी-थोड़ी बड़ी करती चली जा रही थी।
सुप्रिया की सीख...
एक दिन सुप्रिया ने राधा को मोबाइल पर कुछ देखने की कोशिश करते हुए देखा।
वो बोली,
“राधा, क्या देख रही हो?”
“भाभी… ये इंग्लिश समझ नहीं आती। ऑफिस के टिफिन में क्या लिखते हैं, वही समझने की कोशिश कर रही थी।”
सुप्रिया चौंक गई।
फिर मुस्कराकर बोली,
“तो इसमें क्या है? मैं सिखा दूँगी।”
उस दिन पहली बार सुप्रिया ने महसूस किया—
जिस बहू को वो कम समझती थी, वो सीखने की इच्छा में उससे कहीं आगे थी।
घर की परीक्षा...
कुछ दिन बाद रिश्तेदार आने वाले थे।
सुमित्रा ने सबको पहले से ही बोल दिया,
“इस बार खाना राधा ही बनाएगी।”
पूरे दिन राधा रसोई में लगी रही।
थकी ज़रूर थी, लेकिन चेहरे पर शिकायत नहीं थी।
मेहमान आए।
खाना खाकर सब तारीफ करने लगे।
एक रिश्तेदार बोली,
“बहू जी, इतनी समझदारी आजकल की लड़कियों में कम ही होती है।”
सुमित्रा का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।
रात को सुमित्रा राधा के कमरे में गई।
राधा किताब लेकर बैठी थी।
सुमित्रा ने धीरे से कहा,
“बहू… मुझे माफ़ कर देना।
मैं समझती थी कि पढ़ाई सिर्फ़ डिग्री से होती है।
लेकिन असली पढ़ाई तो तुम्हारे संस्कारों और समझ में है।”
राधा की आँखें भर आईं।
उसने सुमित्रा के पैर छू लिए।
सुमित्रा ने उसे गले लगा लिया और कहा,
“कल से मैं खुद तुम्हें पढ़ने में मदद करूँगी।”
आख़िरकार..
राधा को इंग्लिश नहीं आती थी,
लेकिन रिश्तों की भाषा उसे बख़ूबी आती थी।
और सुमित्रा को ये समझ आ गया था कि—
अन्नपूर्णा होना सिर्फ़ रसोई तक सीमित नहीं,
बल्कि घर को दिल से संभालना ही असली शिक्षा है।

Post a Comment