तीखी ज़ुबान, मीठा दिल
सुबह का वक्त था।
रसोई में चाय उबल रही थी और घर में हलचल शुरू हो चुकी थी।
भाभी अनुष्का गैस के सामने खड़ी थीं।
बालों को हल्का-सा जूड़ा बनाया हुआ, चेहरे पर सादगी और आँखों में अपनापन।
उसी समय पीछे से आवाज़ आई—
“भाभी… मेरी नीली वाली कुर्ती कहाँ है?
आज मुझे कॉलेज में प्रेज़ेंटेशन देना है।”
यह आवाज़ थी ननद काव्या की।
तीखी ज़ुबान, तेज़ चाल और हर बात में शिकायत।
अनुष्का ने शांति से कहा—
“अलमारी के ऊपर वाले खाने में रखी है, मैंने कल ही प्रेस करके रख दी थी।”
काव्या ने कुर्ती निकालते हुए ताना मारा—
“आपसे अगर काम ठीक से हो जाए, तो घर में चमत्कार ही हो जाए।”
अनुष्का मुस्कुरा दी।
कुछ नहीं बोली।
सहेलियों के बीच ज़हर भरी बातें...
कॉलेज के बाद काव्या अपनी सहेलियों के साथ कैफे में बैठी थी।
एक सहेली ने पूछा—
“काव्या, तेरी भाभी कैसी हैं?”
काव्या ने बिना सोचे कहा—
“अरे छोड़ो यार…
ना ढंग से बात करना आता है,
ना मज़े करना।
बस घर–घर खेलती रहती हैं।”
सहेलियाँ हँस पड़ीं।
लेकिन काव्या के दिल के किसी कोने में
एक आवाज़ धीरे से बोली—
“झूठ मत बोल… वो बुरी नहीं है।”
पर उसने उस आवाज़ को दबा दिया।
शाम को अनुष्का ने दाल चखी और बोली—
“काव्या, ज़रा नमक चखकर बता देना, ठीक है या नहीं।”
काव्या ने चम्मच लिया और बोली—
“आपको अब तक इतना भी अंदाज़ा नहीं हुआ?
शादी को दो साल हो गए हैं।”
अनुष्का घबरा गई—
“क्या कम है? मैं और डाल दूँ?”
“नहीं!”
काव्या ने तेज़ी से कहा—
“आपसे ज़्यादा छेड़छाड़ हो गई तो खाने लायक भी नहीं बचेगी।”
अनुष्का चुपचाप हट गई।
बाज़ार की घटना...
एक दिन दोनों साथ बाज़ार गई थीं।
दुकान पर साड़ियों की कतार सजी थी।
अनुष्का ने एक हल्के रंग की साड़ी उठाई और काव्या की तरफ़ देखते हुए पूछा—
“ये कैसी लग रही है?”
काव्या ने बस एक नज़र डाली।
ना तारीफ़, ना मुस्कान—
“ठीक–ठाक।”
अनुष्का के हाथ वहीं थम गए।
उसने बिना कुछ कहे साड़ी वापस रख दी।
थोड़ा आगे चलकर
अनुष्का ने माहौल हल्का करने की कोशिश की—
“चलो, गोलगप्पे खा लेते हैं।”
काव्या हँसते हुए बोली—
“आपको क्या आता है भाभी, मज़े करना?”
अनुष्का हल्की-सी मुस्कुरा भर पाई।
तभी पास खड़ी एक अधेड़ उम्र की औरत बोल उठी—
“ऐसी भाभी मिलना नसीब की बात होती है बेटा,
जो हर बात पर चुप रह जाए,
वो कमज़ोर नहीं…
बहुत बड़ा दिल रखती है।”
काव्या अचानक चुप हो गई।
पहली बार
उसे अपने शब्दों की आवाज़
खुद के कानों में चुभी।
माँ की डाँट और सच्चाई...
घर लौटते ही काव्या ने फिर वही तीखे बोल भाभी पर उछाल दिए।
इस बार उसकी आवाज़ में न जाने कैसी कड़वाहट घुली हुई थी।
लेकिन आज
माँ ने सब सुन लिया था।
माँ ने सख़्त आवाज़ में कहा—
“बस, बहुत हो गया काव्या।
दिन–रात ये घर संभालती है तेरी भाभी,
हर रिश्ते को जोड़कर रखती है,
और तुझे इसमें भी बस कमी ही नज़र आती है?”
काव्या कुछ बोल न सकी।
उसकी आँखों में गुस्सा था,
पर जवाब नहीं।
वह बिना कुछ कहे
तेज़ क़दमों से अपने कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद होते ही
कमरे की ख़ामोशी ने
उसके भीतर के शोर को और तेज़ कर दिया।
दरवाज़े के पीछे की सच्चाई...
रात काफ़ी हो चुकी थी।
घर में सन्नाटा पसरा हुआ था।
अनुष्का अपने कमरे की ओर जा ही रही थी कि
काव्या के कमरे से आती धीमी आवाज़ उसके कदम रोक गई।
वह दरवाज़े के बाहर रुक गई।
काव्या किसी से फोन पर कह रही थी—
“नहीं यार… मेरी भाभी सच में बहुत अच्छी हैं।
कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करतीं,
कभी पलटकर जवाब नहीं देतीं।
बस मेरा ही स्वभाव थोड़ा तीखा है।
वो कुछ कहती नहीं,
इसीलिए मैं बेधड़क बोल जाती हूँ…”
अनुष्का वहीँ खड़ी रह गई।
उसकी आँखों के कोरों में नमी उतर आई।
दिन भर की चुप्पियाँ,
अनकहे दर्द,
और सहा हुआ हर ताना
जैसे उस एक पल में अर्थ पा गया।
वह धीरे से मुस्कुराई…
और बिना कोई आवाज़ किए
अपने कमरे की ओर लौट गई।
आज पहली बार
उसका मन बहुत हल्का था।
अगली सुबह काव्या की नींद खुली तो सामने मेज़ पर एक गिलास ठंडी लस्सी रखी थी।
लस्सी की सतह पर जमी मलाई जैसे रात की कड़वाहट को ढक रही हो।
अनुष्का पास ही खड़ी बोली—
“कल गुस्सा कुछ ज़्यादा हो गया था…
ये पी लो, मन थोड़ा हल्का हो जाएगा।”
काव्या ने बिना कुछ कहे गिलास उठा लिया।
दो घूँट में ही आधी लस्सी खत्म कर दी।
“ठीक–ठाक है,”
वह हमेशा की तरह लापरवाही से बोली।
फिर बाहर की ओर बढ़ गई।
लेकिन दरवाज़े पर पहुँचकर
वह पलटी…
आवाज़ धीमी थी, आँखें झुकी हुई—
“भाभी…
अगली बार वही साड़ी मेरे लिए भी ले आइएगा।”
अनुष्का कुछ नहीं बोली।
बस हल्की-सी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई—
ऐसी मुस्कान,
जो शिकायत नहीं, अपनापन समझती है।
सीख:
> रिश्तों में कभी–कभी
तीखे शब्द भी चल जाते हैं,
मगर टिकती वही मिठास है
जो बिना कुछ कहे
सीधे दिल तक पहुँच जाए।

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