फाइल नंबर 317 की औरत

 

Indian government office employee Malti Tripathi sitting at a desk with File Number 317, natural light, realistic scene


इस बार तबादलों की सूची देर से आई थी।

दफ़्तर के गलियारों में अफ़वाहें पहले से तैर रही थीं—

कौन जाएगा, कौन बचेगा, और किसे “सज़ा” मिलेगी।


सूची चिपकी, तो सबसे पहले जिस नाम पर सबकी निगाह गई,

वह था— मालती त्रिपाठी।


चार साल में वह छह सेक्शन घूम चुकी थी।

रिकॉर्ड, स्टोर, अकाउंट्स, स्थापना, लाइब्रेरी, और आख़िर में शिकायत अनुभाग।

हर जगह से एक ही शिकायत—

“काम नहीं करती”,

“अजीब है”,

“ध्यान नहीं रहता”,

“फ़ाइल खो देती है”।


असल में, हर सेक्शन उसे इसलिए भेज देता था

क्योंकि कोई उसे अपने पास नहीं रखना चाहता था।



नई पोस्टिंग...


इस बार मालती को सूचना कक्ष में भेजा गया था।

वह जगह जहाँ फोन, आवेदन, और आम लोगों की उम्मीदें

दिनभर लाइन में खड़ी रहती थीं।


सेक्शन इंचार्ज थे— हरिहर शर्मा।

पचपन की उम्र, नियमों में आस्था,

और जीवन में बस एक ही चाह—

“शांति से नौकरी पूरी हो जाए।”


पहले ही दिन मालती आई।

साधारण साड़ी, बाल ठीक से बंधे हुए,

हाथ में पुराना पर्स।


उसने बिना किसी से ज़्यादा बात किए

अपनी कुर्सी साफ़ की,

रजिस्टर खोला

और काम शुरू कर दिया।


हरिहर ने राहत की सांस ली।

उसे बताया गया था कि मालती “पूरी गड़बड़” है।

लेकिन यहाँ तो वह

फोन उठाने में भी शालीन थी,

आवेदनों को क्रम में रख रही थी।



तीन दिन की शांति...


तीन दिन तक सब ठीक चलता रहा।


किसी ने कोई शिकायत नहीं की।

फोन समय पर उठते रहे।

आवेदन ठीक से जमा होते रहे।


हरिहर को लगा कि शायद लोगों ने बेवजह बातें बढ़ा-चढ़ा कर कही थीं।

उसने सोचा—

“काम मिल जाए, तो आदमी अपने आप संभल जाता है।”


लेकिन चौथे दिन

सब कुछ बदल गया।


सुबह से ही गड़बड़ शुरू हो गई।

फोन गलत जगह लगने लगे,

काग़ज़ आपस में मिल गए,

और जो काम अब तक ठीक चल रहा था,

वह अचानक बिगड़ने लगा।


तब हरिहर को समझ आया

कि पहले के तीन दिन

बस एक भ्रम थे।



अचानक गिरावट...


सुबह से फोन ग़लत जगह ट्रांसफ़र होने लगे।

एक आदमी की पेंशन की फ़ाइल

किसी और की शिकायत में लग गई।

तीन अलग-अलग लोगों के आवेदनों पर

एक ही डायरी नंबर दर्ज हो गया।


दोपहर तक

लोग चिल्लाने लगे।


हरिहर ने मालती को बुलाया।


“यह क्या हो रहा है?”


मालती ने शांत स्वर में कहा—

“सर, मैं ठीक कर दूँगी।”


लेकिन

वह ठीक नहीं कर पाई।


शाम तक

हरिहर का सिर दर्द से फटने लगा।




नोट और बवाल...


हरिहर ने मजबूरी में

कार्मिक विभाग को एक छोटा-सा नोट लिखा।


उसमें न कोई शिकायत थी,

न किसी को नीचा दिखाने की बात।

बस दफ़्तर की ज़रूरत के हिसाब से

एक बात साफ़-साफ़ लिखी—


“श्रीमती मालती त्रिपाठी की मानसिक स्थिति

सूचना कक्ष जैसे ज़िम्मेदारी वाले काम के लिए

ठीक नहीं लगती।”


बस इतना ही।


लेकिन यही एक पंक्ति

बड़ा बवाल बन गई।


नोट कार्मिक विभाग तक पहुँचने से पहले ही

यूनियन के हाथ लग गया।


अगले दिन

दफ़्तर में शोर मच गया।


नारे लगने लगे—


“कर्मचारियों का अपमान बंद करो!”

“बीमार लोगों को परेशान करना बंद करो!”


हरिहर को घेर लिया गया।


वह कुछ कहना चाहता था,

लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।


उसकी बात

शोर में दब गई।



मालती की सच्चाई...


असल कहानी

कोई नहीं जानता था।


मालती कभी बहुत मेहनती और तेज़ कर्मचारी हुआ करती थी।

काम को समझना, समय पर निपटाना और ज़िम्मेदारी निभाना—

ये सब उसकी पहचान थी।


लेकिन करीब दस साल पहले

एक सड़क हादसे ने उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।

उसके सिर में गहरी चोट आई।


इलाज हुआ,

पर वह अधूरा रह गया।


कुछ समय तक वह बिल्कुल ठीक रहती,

बातें समझती, काम करती, हँसती-बोलती।

फिर अचानक

सब कुछ बिखरने लगता।


ध्यान भटक जाता,

सोच उलझ जाती,

और वही मालती

जो कभी सब संभाल लेती थी,

ख़ुद को भी संभाल नहीं पाती थी।


घरवालों ने इलाज

बीच में ही रोक दिया।


“अब तो ठीक दिख रही है,”

कहकर

डॉक्टर की दवाइयाँ

अलमारी के किसी कोने में रख दी गईं।


बीमारी को

पूरी तरह समझने

या स्वीकार करने का

किसी में धैर्य नहीं था।


कुछ महीनों बाद

उसकी शादी कर दी गई।


पति—

एक छोटा कारोबारी।

सीधा-सादा आदमी,

जिसे बस इतना बताया गया कि

लड़की नौकरी करती है,

समझदार है।


मालती की बीमारी की

कोई बात

उससे नहीं कही गई।


अब मालती रोज़

ऑफिस जाती है।

काम करे या न करे,

तनख़्वाह समय पर आती है।


वह पूरी पगार

घर लाकर

चुपचाप पति के हाथ में रख देती है।


उसकी अपनी

कोई ज़रूरत नहीं,

कोई माँग नहीं।


जो पहन लिया—

उसी में संतुष्ट।

जो मिल गया—

उसी में खुश।


जैसे

उसने जीना नहीं,

बस निभाना सीख लिया हो।



सबका फायदा...


ऑफिस को फ़ायदा था—

काम हो या न हो,

स्टाफ की संख्या पूरी रहती थी।

फ़ाइलों में एक नाम और दर्ज रहता था,

बस इतना काफ़ी था।


यूनियन को फ़ायदा था—

यूनियन के लिए वह एक चलता–फिरता मुद्दा थी।

जब चाहा, उसे अन्याय का प्रतीक बना लिया गया।

ज़रूरत पड़ी तो नारे गूंजे,

और ज़रूरत पड़ी तो घेराव खड़ा कर दिया गया।


पति को फ़ायदा था—

नौकरी करने वाली पत्नी,

जो तनख़्वाह घर लाती थी

और सवाल करना नहीं जानती थी।


और मालती?


मालती

अपनी ही एक अलग दुनिया में रहती थी।

जहाँ न आज का बोझ था,

न कल की कोई योजना।

न शिकायतें थीं,

न उम्मीदें।


वह बस

जी रही थी—

बिना माँगे,

बिना लड़े,

बिना समझे कि

उसकी ख़ामोशी

कितनों की सहूलियत बन चुकी है।



हरिहर अब

हर सुबह दफ़्तर में कदम रखते ही

अनायास ही उस कुर्सी की ओर देख लेता है

जहाँ मालती बैठी होती है।


वह कुछ नहीं कहता,

बस एक पल ठहर जाता है।


उसके मन में

हर दिन वही सवाल उभरता है—


“क्या सच में वह बीमार है…

या फिर यह पूरा तंत्र ही

इतना संवेदनाशून्य हो चुका है

कि अब उसे इंसान और बीमारी के बीच

फ़र्क़ दिखाई ही नहीं देता?”


और फ़ाइल नंबर 317—

जिसमें न इलाज दर्ज है,

न अपराध,

न कोई अंतिम निर्णय—

चुपचाप

अलमारी के उसी खाने में पड़ी रहती है,

सालाना तबादलों की अगली सूची तक।



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