बराबरी की बारिश
शाम के सात बज चुके थे।
आसमान से पानी ऐसे गिर रहा था जैसे बादल टूट पड़े हों।
बस स्टैंड के पास खड़ी सुमन ने अपनी घड़ी देखी और थकी हुई आवाज़ में बोली—
“आज तो हद हो गई, पूजा।
ऑफिस में बॉस ने इतना काम दे दिया कि निकलते-निकलते अंधेरा हो गया।”
पूजा ने भीगे दुपट्टे को ठीक करते हुए कहा—
“और ऊपर से ये बारिश…
कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा।
प्राइवेट नौकरी में बस काम ही काम है, आराम नाम की चीज़ नहीं।”
दोनों कॉल सेंटर में काम करती थीं।
दिन भर कॉल, टारगेट, डांट—
और फिर पैदल घर लौटना।
भीगते हुए, ठंड से कांपते हुए
करीब एक घंटे बाद
वे अपने घर पहुँचीं।
घर के अंदर दूसरी दुनिया...
उसी समय
घर के गेट पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी।
नेहा और कविता—
दोनों सरकारी नौकरी में थीं।
एक स्कूल टीचर, दूसरी तहसील ऑफिस में अफसर।
वे गाड़ी से उतरीं
और बिना भीगे सीधे अंदर चली गईं।
उनकी सास शारदा देवी
हाथ में तौलिया लिए खड़ी थीं।
“आ गई मेरी दोनों सरकारी बहुएँ?
थक गई होंगी…
चलो जल्दी अंदर आओ।”
फिर सुमन और पूजा की ओर देखकर बोलीं—
“तुम दोनों भी आ गईं?
अरे कपड़े बदलो और
चाय बना दो।
नेहा और कविता को गरम-गरम पकोड़े पसंद हैं।”
मेहनत एक, इज़्ज़त अलग...
पूजा ने हिम्मत करके कहा—
“माजी…
हम भी तो ऑफिस से आए हैं।
आज बहुत थक गए हैं।”
शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया—
“तुम्हारी नौकरी और इनकी नौकरी में फर्क है।
सरकारी नौकरी वालों की जिम्मेदारी बड़ी होती है।”
सुमन चुप रही।
उसकी आँखों में पानी भर आया।
रात को
खाना भी वही बनाती हैं,
सुबह भी वही उठती हैं,
ऑफिस भी जाती हैं—
फिर भी
इज़्ज़त सिर्फ सरकारी नौकरी की।
बीमारी ने खोल दी आँखें...
कुछ दिन बाद
लगातार बारिश और थकान से
शारदा देवी की तबीयत बिगड़ गई।
अचानक सीने में दर्द हुआ
और वे बेहोश हो गईं।
चारों बहुएँ
उन्हें अस्पताल लेकर पहुँचीं।
डॉक्टर ने कहा—
“फेफड़ों में इंफेक्शन है।
ऑपरेशन जरूरी है।
करीब पाँच लाख खर्च आएगा।”
सब चुप हो गईं।
नेहा और कविता ने नज़रें फेर लीं—
“हमारी भी जिम्मेदारियाँ हैं।
पूरी सेविंग नहीं लगा सकते।”
सुमन और पूजा ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
बिना कुछ कहे
दोनों ने अपने गहने बेच दिए।
ऑपरेशन से पहले
शारदा देवी को सब सच पता चला।
वे रो पड़ीं—
“मैं कितनी अंधी थी…
जिन्हें सिर पर बैठाया
वो साथ छोड़ गए।
और जिनसे रोज़ काम करवाया
आज वही मेरी जान बचा रही हैं।”
नेहा और कविता का सिर झुक गया।
उन्हें भी अपनी गलती समझ आ गई।
उन्होंने अपनी सेविंग से पैसे निकाले
और सुमन-पूजा को लौटा दिए।
ऑपरेशन सफल रहा।
कुछ महीनों में शारदा देवी ठीक हो गईं।
अब घर में
न सरकारी, न प्राइवेट—
सिर्फ
चार बहुएँ
और बराबर का प्यार।
बारिश फिर हुई
लेकिन इस बार
छाता सबके लिए था।
कहानी का संदेश:
👉 नौकरी कोई भी हो
मेहनत सबकी बराबर होती है।
👉 इज़्ज़त पद से नहीं
इंसानियत से मिलती है।

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