माँ… ज़रा-सा अपने लिए भी जी लो
सुबह की धूप खिड़की से छनकर
आँगन की फर्श पर गिर रही थी।
घर में सब कुछ अपनी जगह था —
फिर भी सरिता को लग रहा था
जैसे कुछ बहुत बिखरा हुआ है।
चूल्हे के पास खड़ी-खड़ी
उन्होंने थकी हुई आवाज़ में कहा,
“बहू…
अब मुझसे नहीं हो पा रहा।”
पूजा पलटकर देखती रह गई।
वो शिकायत नहीं थी,
ना ही कोई ताना —
बस एक हारी हुई स्वीकार थी।
“माँ…”
पूजा ने धीरे से कहा,
“आप आराम करिए।
सब मैं संभाल लूँगी।”
सरिता कुछ नहीं बोलीं।
बस सिर हिलाकर
अपने कमरे में चली गईं।
उस दिन के बाद
पूजा ने महसूस किया—
माँ कम बोलने लगी थीं।
उनकी हँसी
मानो कहीं खो गई हो।
घंटों खिड़की के पास बैठी रहतीं,
बाहर देखते हुए—
जैसे किसी को तलाश रही हों,
या शायद…
खुद को।
एक दिन
पूजा ने साहस करके कहा,
“माँ,
मेरे साथ चलिए…
कहीं दूर।”
“कहाँ?”
सरिता ने बिना उत्साह के पूछा।
“बस चलिए।”
पूजा ने मुस्कुरा दिया।
यात्रा के दिन
जब टिकट पर केरल लिखा देखा,
तो सरिता घबरा गईं।
“ये तो कोई तीर्थ नहीं है बहू…”
पूजा ने उनका हाथ पकड़ लिया,
“माँ,
भगवान हर जगह होते हैं।
कभी-कभी
समंदर की लहरों में भी।”
रिसॉर्ट में पहुँचते ही
नम हवा ने
सरिता के चेहरे को छुआ।
समंदर की आवाज़
सीधे दिल में उतर गई।
पहले दिन
वो बस चुपचाप बैठी रहीं।
दूसरे दिन
पूजा उन्हें स्पा ले गई।
गरम पानी,
धीमी रोशनी,
और सुकून भरी खुशबू…
मालिश के दौरान
सरिता की आँखों से
अपने आप आँसू बह निकले।
“दर्द हो रहा है माँ?”
पूजा घबरा गई।
“नहीं बहू…”
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,
“ये तो…
बरसों से जमा हुआ
थकान बाहर निकल रहा है।”
शाम को
दोनों समंदर किनारे बैठीं।
लहरें उनके पैरों से टकरा रही थीं।
सरिता अचानक बोलीं,
“जब बेटा छोटा था
तो हर पल मुझे चाहिए होता था।
मेरी साड़ी का पल्लू
उसकी दुनिया था।”
आवाज़ भर्रा गई।
“फिर वो बड़ा हुआ।
पढ़ाई, कॉलेज, नौकरी…
और मैं धीरे-धीरे
सिर्फ माँ बनकर रह गई।
अपने भीतर की औरत
कहीं पीछे छूट गई।”
पूजा का दिल बैठ-सा गया।
“माँ…”
उसने धीरे से कहा,
“मेरी माँ भी ऐसी ही थीं।
हम सबके बीच रहकर
अकेली।”
“उनकी डायरी में लिखा था —
‘काश कोई एक दिन
सिर्फ मेरा हाल पूछ ले।’”
पूजा फूट-फूटकर रो पड़ी।
सरिता ने उसे सीने से लगा लिया।
धीरे से बोलीं,
“चुप…
अब वो अकेली नहीं है।”
थोड़ी देर बाद
सरिता खुद बोलीं,
“बहू,
मैं अंदर ही अंदर
टूटती जा रही थी।
कभी लगता था
किसी से बात करूँ,
तो कभी
सबसे दूर भाग जाऊँ।”
पूजा का कंधा
उनके आँसुओं से भीग गया।
“तू मुझे यहाँ ले आई…
तूने मुझे फिर से
ज़िंदा कर दिया।”
आसमान में
सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।
लाल, नारंगी रंग
समंदर में घुल रहे थे।
सरिता ने आँसू पोंछे
और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलीं,
“अरे…
इतना रोना धोना काफी है।”
फिर बच्चों की तरह बोलीं,
“चल,
आज समंदर में
थोड़ा और भीग आते हैं।”
पूजा हँसते हुए बोली,
“हाँ माँ…”
उस एक शब्द में
पूरी दुनिया समा गई।
दोनों लहरों की ओर बढ़ गईं।
उस दिन
सरिता सिर्फ माँ नहीं थीं —
वो फिर से
खुद की औरत बन गई थीं।

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