चुप्पी जब रो पड़ी
सुबह के साढ़े पाँच बजे थे।
रसोई में चूल्हा जल रहा था,
और शालिनी की आँखें अभी पूरी खुली भी नहीं थीं।
कलाइयों में दर्द था,
लेकिन हाथ फिर भी टिफिन भर रहे थे।
पीछे से अमर की आवाज़ आई—
“माँ कह रही थीं, मेरी दोनों बहनें डेढ़–दो महीने यहीं रहेंगी।
शहर में बहुत थक गई हैं… यहाँ आकर आराम करेंगी।”
उसने “आराम” शब्द ऐसे कहा,
जैसे वह शालिनी का काम हो,
जैसे शालिनी खुद कभी थकी ही न हो।
शालिनी ने पलटकर नहीं देखा।
बस टिफिन बंद किया।
माँजी की दवाइयाँ प्लेट में रखीं
और बच्चों को उठाने चली गई।
पीछे से सास का ताना आया—
“देखा?
मेरी बेटियाँ आने वाली हों तो
यह ऐसे ही चुप हो जाती है।
मुझे पहले से पता था।”
अमर ने बात हल्की करने की कोशिश की—
“नहीं माँ,
ऐसी कोई बात नहीं है।
बहनें आती हैं तो
शालिनी सब संभाल लेती है।”
“सब संभाल लेती है…”
यह शब्द
उसके कानों से उतरकर
सीधे दिल में जा धँसा।
जैसे किसी ने
उसके सीने पर
चुपचाप एक भारी पत्थर रख दिया हो।
वह कुछ बोली नहीं,
लेकिन उस पल
उसे एहसास हो गया—
उससे उम्मीद नहीं,
उससे आदत बना ली गई थी।
स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए
उसकी नज़र बार-बार
खिड़की के बाहर भटक जाती।
ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षरों से ज़्यादा
उसे अपने आने वाले दिन दिखाई देते—
थकान से भरे,
चुपचाप भारी,
और सिर्फ उसके अकेले कंधों पर टिके हुए।
घर लौटी तो
काम जैसे उस पर टूट पड़े।
बिस्तर बदलो,
रसोई संभालो,
सब्ज़ी काटो,
दाल चढ़ाओ,
और माँजी के ताने झेलो।
दो दिन बाद
नीलम और पूजा आ गईं।
हँसती हुईं,
बिल्कुल निश्चिंत,
जैसे थकान नाम की चीज़
उनकी ज़िंदगी से कभी गुज़री ही न हो।
कदम धीमे थे,
चेहरों पर सुकून पसरा हुआ था।
बोलीं—
“भाभी, यहाँ तो बड़ा सुकून है।
डॉक्टर ने साफ़ कहा है,
हमें बिल्कुल भी काम नहीं करना।”
माँजी ने तुरंत कहा—
“काम की चिंता मत करो,
तुम्हारी भाभी है।”
उस दिन के बाद
शालिनी के लिए
सुबह और शाम का फर्क मिट गया।
देर से उठती ननदें,
और उठते ही आवाज़—
“भाभी, चाय…”
“भाभी, हल्का खाना…”
“भाभी, ज़रा बालों में तेल…”
शालिनी सब करती रही।
कभी पीठ दर्द के साथ,
कभी सिर भारी होने पर,
कभी बिना भूख के।
स्कूल से लौटती
तो लगता
जैसे घर दूसरा स्कूल हो—
लेकिन यहाँ
उसे कोई सर नहीं कहता,
कोई धन्यवाद नहीं देता।
एक रात
वह कुर्सी पर बैठी थी।
पैर सूजे हुए थे।
आँखें जल रही थीं।
अमर ने कहा—
“बहनें आई हैं,
थोड़ा एडजस्ट करना सीखो।
सेवा में मन लगाया करो।”
उस शब्द ने
उसके अंदर की
आख़िरी ताक़त भी तोड़ दी।
अगली दोपहर
नीलम और पूजा ने
फिर पैरों की मालिश के लिए बुलाया।
वह बैठी…
लेकिन इस बार
उसके हाथ नहीं चले।
आँसू
बिना पूछे
गालों पर बहने लगे।
उसी पल
उसकी सहेली रेखा का फोन आया।
उसने बस कहा—
“तू बहुत थक गई है…
और थकान कोई गुनाह नहीं।”
फोन रखते ही
शालिनी उठ खड़ी हुई।
पहली बार
उसने आवाज़ ऊँची नहीं की,
पर शब्दों में सच्चाई थी—
“दीदी…
आपका आराम ज़रूरी है।
पर उसकी कीमत
सिर्फ मैं क्यों चुकाऊँ?
मैं नौकरी करती हूँ,
घर संभालती हूँ,
और मैं भी इंसान हूँ।
मैं मदद करूँगी…
लेकिन खुद को खोकर नहीं।”
कमरे में
सिर्फ उसकी सिसकियों की आवाज़ थी।
नीलम और पूजा
पहली बार
शर्म से झुक गईं।
माँजी आईं,
कुछ कहने लगीं,
पर शालिनी ने हाथ जोड़कर कहा—
“माँजी,
आपकी बेटियाँ हैं…
पर मैं भी किसी की बेटी हूँ।
मेरी मेहनत को
कम मत आँकिए।”
अमर चुप था।
उसकी आँखों में
पहली बार अपराध था।
उसी रात
उसने शालिनी से माफी माँगी।
धीरे–धीरे
घर बदला।
ननदें
खुद चाय बनाने लगीं।
रसोई में हाथ बँटाने लगीं।
अमर
सुबह बच्चों का टिफिन भरने लगा।
कभी–कभी
शालिनी के लिए
पानी भी रख देता।
माँजी के तानों की जगह
अब कभी–कभी
“थक गई होगी”
जैसे शब्द आने लगे।
शालिनी ने जाना—
चुप रहना हमेशा संस्कार नहीं होता।
कभी–कभी
अपने लिए बोलना
खुद से प्रेम करना होता है।
उसने किसी को चोट नहीं दी,
बस खुद को
टूटने से बचा लिया।
और यही
एक औरत की
सबसे भावुक
सबसे सच्ची
और सबसे शांत जीत होती है।

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