जब ठहरना सीख लिया

Emotional Indian couple sharing a quiet moment during monsoon rain in a small apartment


ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मुझे हमेशा लगता है कि पेड़ पीछे नहीं जा रहे,

बल्कि मैं ही उनसे आगे भाग रहा हूँ।

स्टेशन, पुल, झोपड़ियाँ — सब कुछ तेज़ी से पीछे छूटता जाता है,

और मैं…

मैं हर बार किसी न किसी से,

या शायद ख़ुद से ही दूर निकल आता हूँ।


पिछले छह सालों में ये मेरा चौथा शहर था।

हर ट्रांसफर के साथ मैंने एक कमरा बदला,

एक रास्ता बदला,

और हर बार यही सोचा —

इस बार सब ठीक हो जाएगा।


पर सच ये था कि

मैं हर नए शहर में पुराने ज़ख्मों के साथ ही पहुँचा था।


बस रुकी तो कंडक्टर ने आवाज़ दी —

“साहब, आख़िरी स्टॉप।”


मैं बैग उठाकर नीचे उतरा।

शाम ढल रही थी।

अजनबी शहर में अजनबी हवा थी,

और मैं…

अब आदतन अजनबियों से डरता नहीं था।


मकान मालकिन ने बिना ज़्यादा पूछताछ के चाबी पकड़ा दी।

“ऊपर वाला कमरा है। शांत इलाक़ा है, आपको पसंद आएगा।”


शांत…

मुझे शांति से ज़्यादा सन्नाटा सूट करता था।


रात को भूख लगी तो बाहर निकल आया।

पास की चाय की दुकान पर एक लड़की तेज़ आवाज़ में हँस रही थी।

उसकी हँसी में कोई बनावटीपन नहीं था,

बल्कि जैसे उसने ज़िद करके हँसना सीख लिया हो।


“भैया, चाय में चीनी कम डालना,”

वो दुकानदार से बोली।

“ज़िंदगी में पहले ही बहुत मिठास धोखा दे चुकी है।”


उसकी बात सुनकर अनजाने में मेरे होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।


अगले दिन ऑफिस में पता चला कि वही लड़की

मेरे सामने वाली डेस्क पर बैठती है।


“नया-नया आए हो?”

उसने कुर्सी घुमाते हुए पूछा।


“हाँ।”


“ज़्यादा बोलते नहीं हो?”

उसकी आँखों में शरारत थी।


“आदत नहीं है।”


“कोई बात नहीं,”

वो बोली,

“मैं आदत डाल दूँगी।”


उसका नाम मीरा था।


ऑफिस में शायद ही कोई ऐसा हो,

जो उसे पसंद न करता हो।


लंच ब्रेक में,

कॉफ़ी मशीन के आसपास,

वो कभी किसी बहस का हिस्सा होती,

तो कभी अपनी हँसी से

पूरा माहौल हल्का कर देती।


जहाँ भी लोग होते,

मीरा वहाँ अपने आप मौजूद रहती —

बिल्कुल सहज,

बिना कोशिश के।


और मैं…

मैं हर जगह होते हुए भी कहीं नहीं था।


रात को कमरे में बैठा तो

फिर वही यादें लौट आईं।

आरती।


जिसने कहा था —

“तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन बहुत ख़ामोश हो।”


और फिर एक दिन

किसी और के साथ चली गई थी,

जो ज़्यादा बोलता था,

ज़्यादा वादे करता था।


उस दिन के बाद

मैंने बोलना कम

और भागना ज़्यादा सीख लिया।


मीरा को शायद ये सब दिखता था।

एक दिन उसने सीधा पूछ लिया —

“तुम किसी से भाग रहे हो, है न?”


मैंने जवाब नहीं दिया।


“ठीक है,”

वो मुस्कराई,

“जब रुकना चाहो, तो बताना।”


कुछ दिन बाद

आसमान जैसे फट पड़ा था।

तेज़ बारिश सड़क, छत, और सीढ़ियों पर

बेतहाशा गिर रही थी।


ऑफिस से निकलते वक़्त

मीरा का पैर फिसला।

सब कुछ एक पल में हुआ —

उसकी चीख,

लोगों की घबराई आवाज़ें,

और मेरा दिल, जो अचानक तेज़ धड़कने लगा।


हॉस्पिटल की सफ़ेद दीवारों के बीच

डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए कहा —

“ज़्यादा गंभीर नहीं है,

लेकिन पैर में चोट लगी है।

कुछ दिन पूरा आराम ज़रूरी है।”


मीरा ने धीरे से मेरी तरफ़ देखा।

चेहरे पर दर्द था,

लेकिन आँखों में वही शरारती चमक।


हल्की मुस्कान के साथ बोली —

“लगता है, अब तुम्हें मुझसे भागने का मौका नहीं मिलेगा।”


मैं हँस पड़ा।

ऐसी हँसी,

जो होंठों से नहीं

सीधे दिल से निकली थी।


उस रात

वो मेरे कमरे में थी,

सोफ़े पर बैठी,

पैर पर पट्टी बँधी हुई।



“जानते हो…”

उसने कुछ पल चुप रहकर कहा।

आवाज़ धीमी थी, जैसे शब्दों को बाहर आने में हिचक हो रही हो।


“मैं भी भागी हूँ।

कभी लोगों से,

कभी हालात से,

और कई बार… ख़ुद से।”


वो हल्का-सा मुस्कराई,

लेकिन उस मुस्कान के पीछे

एक थकी हुई रूह साफ़ दिखाई दे रही थी।


“भागना आसान लगता है न?

लगता है कि जगह बदल लेने से

दर्द पीछे छूट जाएगा।

पर सच ये है कि

हम जहाँ भी जाते हैं,

अपनी टूटी हुई यादें

साथ ले जाते हैं।”


मैंने उसकी तरफ़ देखा।


“जिस घर में पैदा हुई,

वहाँ कभी अपनापन नहीं मिला।

हँसना मैंने इसलिए सीखा

क्योंकि रोने से कोई नहीं रुकता।”


उसकी आँखें नम थीं,

लेकिन आवाज़ मज़बूत।


उस पल मुझे एहसास हुआ —

दर्द की शक्ल अलग-अलग होती है,

पर बोझ सबका बराबर होता है।


मैं उठा,

खिड़की खोली।

बारिश की ठंडी हवा अंदर आई।


जेब से मैंने आरती की पुरानी तस्वीर निकाली।

कुछ पल देखा,

फिर उसे मोड़कर फेंक दिया।


मीरा ने कुछ नहीं पूछा।


बस इतना कहा —

“आज तुम रुके हो।”


मैंने सिर हिलाया।


“हाँ,”

मैं बोला,

“शायद पहली बार।”


बाहर बारिश अब भी हो रही थी,

लेकिन अंदर

कुछ थम-सा गया था।


और मुझे समझ आ गया था —

भागना आसान होता है,

पर ठहरना साहस माँगता है।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.