जब चुप्पी ने घर छोड़ दिया
सुबह के ठीक साढ़े छह बजे थे।
अलार्म नहीं बजा था,
लेकिन किचन से बर्तनों की हल्की-सी आवाज़ आ रही थी।
सीमा की नींद खुल गई।
उसने करवट बदलकर पति राकेश की तरफ देखा।
राकेश गहरी नींद में था,
जैसे दुनिया की कोई जिम्मेदारी उसके सिर पर न हो।
सीमा बड़बड़ाई—
“आज इतवार है… फिर भी ये सबेरे-सबेरे कौन खटर-पटर कर रहा है?”
फिर उसे याद आया—
“अरे हाँ… माँ।”
माँ यानी शांति देवी।
सत्तर पार की उम्र,
कमज़ोर आँखें,
लेकिन दिन की शुरुआत हमेशा काम से।
सीमा उठी और किचन में गई।
पर वहाँ…
कोई नहीं था।
चूल्हा ठंडा था।
दूध का बर्तन खाली रखा था।
झाड़ू कोने में वैसी ही टिकी थी।
सीमा को अजीब लगा।
“माँ?”
उसने आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं।
सीमा झुंझला गई।
“कहीं मंदिर चली गई होंगी…
काम से बचने का बहाना।”
उसी समय कामवाली सुनीता आ गई।
“भाभी जी, आज अम्मा जी नहीं दिखीं…
दरवाज़ा भी खुला था।”
सीमा का पारा चढ़ गया।
“देखा!
घर छोड़कर घूमने निकल गईं।
जैसे कोई जिम्मेदारी ही नहीं।”
राकेश की नींद खुली।
“क्या हुआ?”
उसने आँख मसलते हुए पूछा।
“क्या हुआ?
तुम्हारी माँ घर से गायब हैं।
नाश्ता नहीं, चाय नहीं।
इतवार को भी चैन नहीं!”
राकेश चुप रहा।
बच्चे भी उठ गए।
“मम्मी, दादी कहाँ हैं?”
छोटी बेटी पायल ने पूछा।
सीमा ने तंज कस दिया—
“जहाँ उन्हें सुकून मिलता है,
वहाँ।”
एक घंटा बीत गया।
फिर दो।
माँ नहीं आई।
अब राकेश भी परेशान हो गया।
“माँ कभी बिना बताए नहीं जातीं…”
सीमा बोली—
“अब आदत बदल गई होगी।
जब से मैंने कहा था कि
आज बाहर खाना मंगाएँगे।”
तभी दरवाज़े के पास से आवाज़ आई।
“भैया…”
पड़ोस की रीना खड़ी थी।
उसके हाथ में एक कागज़ था।
उसके हाथ में एक कागज़ था।
“ये… आपकी माँ के कमरे से मिला।”
राकेश ने कागज़ खोला।
हाथ काँपने लगे।
पत्र...
राकेश बेटा,
मैंने सोचा था,
बेटे के घर आकर
बुढ़ापे में सुकून मिलेगा।
काम से मुझे कभी परहेज़ नहीं रहा।
पर जब काम के साथ
सम्मान भी छिन जाए
तो इंसान टूट जाता है।
कल तुम्हारी पत्नी ने
मेहमानों के सामने
मुझे बोझ कहा।
अनपढ़ बुढ़िया कहा।
मैं चुप रही,
क्योंकि माँ हूँ।
लेकिन चुप्पी की भी एक हद होती है।
मैं जा रही हूँ।
मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना।
जिस घर में
मेरी कीमत सिर्फ काम है,
वहाँ मैं नहीं रह सकती।
तुम्हारी माँ
शांति
पत्र हाथ से छूट गया।
राकेश की आँखें भर आईं।
सीमा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“ये…
ये नाटक है!”
वह बोली,
लेकिन आवाज़ में डर था।
“नाटक?”
राकेश पहली बार चीखा।
“छह साल से माँ चुप थीं…
और हम समझते रहे कि सब ठीक है।”
उसी वक्त फोन बजा।
“राकेश भाई,”
दूसरी तरफ आवाज़ थी,
“आपकी माँ हमारे बच्चों के डे-केयर में हैं।
कह रही थीं—
बच्चों के बीच अच्छा लगता है।”
राकेश बिना कुछ बोले
चप्पल उठाकर बाहर निकल गया।
बच्चे उसके पीछे दौड़े।
सीमा भी।
डे-केयर के कोने में
शांति देवी बच्चों को कहानी सुना रही थीं।
चेहरे पर थकान थी,
पर आँखों में सुकून।
राकेश सामने जाकर खड़ा हो गया।
“माँ…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
शांति देवी ने सिर उठाया।
“आ गए?”
बस इतना ही कहा।
“मुझे माफ कर दीजिए,”
राकेश रो पड़ा।
“मैंने आपको कभी समझा ही नहीं।”
सीमा आगे बढ़ी।
उसने झुककर पैर छुए।
“माँ…
मैं गलत थी।
बहुत गलत।”
शांति देवी ने हाथ पीछे खींच लिया।
“बहू,
माफी शब्दों से नहीं,
बदलाव से मिलती है।”
बच्चे दादी से लिपट गए।
“दादी घर चलो…
आपका कमरा हमने सजा दिया है।”
शांति देवी की आँखें नम हो गईं।
काफी देर तक शांति देवी कुछ नहीं बोलीं।
उनकी आँखों में बीता हुआ समय,
दबी हुई पीड़ा
और टूटा हुआ भरोसा साफ़ झलक रहा था।
फिर उन्होंने गहरी साँस ली और धीमे स्वर में कहा—
“मैं घर चलूँगी…
लेकिन एक शर्त पर।”
राकेश की आवाज़ काँप गई—
“जो कहें माँ…
आपकी हर शर्त मंज़ूर है।”
शांति देवी ने उसकी ओर देखा,
न कोई शिकायत,
न कोई ताना—
सिर्फ़ आत्मसम्मान।
“मैं उस घर में नौकरानी बनकर नहीं जाऊँगी,”
उन्होंने दृढ़ता से कहा।
“मैं माँ हूँ…
और माँ बनकर ही रहूँगी।”
उस दिन
घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ,
कोई तंज नहीं कसा गया।
बस…
एक खामोशी थी,
जो बहुत पहले
इस घर को छोड़ चुकी थी—
आज
धीरे-धीरे
फिर से
लौट आई।

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