रिश्तों के रंग

Emotional confrontation scene in an Indian joint family courtyard where two women face each other with visible tension as family members watch silently in the background


सुबह का समय था।

आँगन में तुलसी के चौरे पर धूप उतर चुकी थी।

घर के भीतर रसोई से बर्तनों की खनकती आवाज़ें आ रही थीं।


“अरे बहु, ज़रा देख लेना… दूध तो नहीं उबल गया?”

रसोई की ओर से सास की आवाज़ आई।


“जी माजी, देख रही हूँ,”

कहते हुए अनु ने गैस की आँच धीमी कर दी।


यह अनु की शादी के बाद ससुराल में तीसरी सुबह थी।

शादी बड़े शहर में धूमधाम से हुई थी,

लेकिन ससुराल गाँव का पुराना, संयुक्त परिवार था।


इस घर में

सास थीं — सरोज देवी,

ससुर — हरिप्रसाद,

पति — अमित,

और ननद — पायल।


पायल उम्र में अनु से छोटी थी,

मगर उसके तेवर ऐसे थे

जैसे पूरे घर की कमान उसी के हाथ में हो।



पहली दरार...


“भाभी, मेरी नीली साड़ी कहाँ रखी है?”

पायल ने लापरवाही भरे लहजे में पूछा।


“अलमारी के नीचे वाले खाने में होगी,”

अनु ने शांत स्वर में जवाब दिया।


पायल का चेहरा तन गया।

“आपको ठीक से सामान रखना नहीं आता क्या?”

वह झुंझलाकर बोली,

“शादी करके आई हैं तो क्या पूरे घर की ज़िम्मेदारी अपने सिर ले ली है?”


अनु चुप रही।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।


रसोई के दरवाज़े पर खड़ी सास ने सब सुन लिया था,

मगर उन्होंने भी कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझा।


अनु के मन में हलचल थी,

फिर भी उसने खुद को समझाया—


शायद मैं नई हूँ…

समय लगेगा।



पायल का छुपा सच...


पायल रोज़ कॉलेज जाती थी।

उसे फोन पर बहुत धीमी आवाज़ में बात करने की आदत थी।

कभी छत पर खड़ी होकर,

तो कभी आँगन के किसी कोने में सिमटकर।


एक दिन अनु के कानों में उसके शब्द पड़ गए—


“आज नहीं आ पाऊँगी…

भाभी घर पर रहती हैं।”


अनु एक पल के लिए रुकी,

फिर उसने उस बात को मन से निकाल दिया।

उसने सोचा—

जवानी है, दोस्त होंगे…

इन बातों को दिल पर क्यों लेना।


मगर समय के साथ

पायल की फोन पर होने वाली बातें बढ़ती गईं,

उसकी बेचैनी,

उसकी चोरी-छुपी मुस्कान,

सब कुछ कुछ और ही कहानी कहने लगा।



त्योहार की तैयारी...


घर में तीज आने वाली थी।

पूरे आँगन में तैयारियों की हलचल थी।


तभी सास ने कहा,

“बहु, इस बार व्रत तुम और पायल—दोनों रखोगी।”


यह सुनते ही पायल का चेहरा उतर गया।


“माजी, मेरा मन नहीं है,”

उसने रूखे स्वर में कहा।


सरोज देवी ने गंभीर होकर उत्तर दिया,

“बिना मन के भी कई बार निभाना पड़ता है, बेटी।

घर की परंपराएँ यूँ ही नहीं टूटतीं।”


अनु ने बात संभालते हुए मुस्कुरा कर कहा,

“कोई बात नहीं पायल,

व्रत में मैं तुम्हारी पूरी मदद कर दूँगी।”


पायल ने अनु की ओर घूरकर देखा,

जैसे उसके मन में कुछ चुभ गया हो।



भेद खुलना...


तीज की रात थी।

छत पर हल्की-हल्की ठंडक थी और हवा में चाँदनी घुली हुई थी।

अनु कपड़े सुखाने के लिए ऊपर आई।


तभी उसकी नज़र पायल पर पड़ी।

पायल एक कोने में खड़ी मोबाइल पर किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रही थी।


“मैं तुमसे ही शादी करूँगी…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी,

“घर वाले मानें या न मानें।”


ये सुनते ही अनु के कदम वहीं थम गए।

वह पलटकर नीचे जाने ही वाली थी कि फोन के उस पार से लड़के की आवाज़ आई—


“तो कल मंदिर में मिलते हैं।”


अनु स्तब्ध रह गई।

अब उसे समझ आ चुका था कि मामला साधारण नहीं था।



अगली सुबह पायल जल्दी-जल्दी तैयार होकर बाहर निकलने लगी।


अनु ने दरवाज़े के पास खड़े होकर सहज स्वर में पूछा,

“पायल, कहाँ जा रही हो?”


पायल ने पलटकर भी नहीं देखा।

“आपको बताने की ज़रूरत नहीं है।”


उसकी आवाज़ में झुंझलाहट साफ़ झलक रही थी।


अनु ने बात बढ़ाने की कोशिश नहीं की, बस धीरे से कहा,

“मैं टोक नहीं रही हूँ… मगर अगर कोई ऐसा कदम—जो बाद में तुम्हें तकलीफ़ दे—”


इतना सुनते ही पायल का बाँध टूट गया।


“बस कीजिए भाभी!”

वह अचानक चिल्ला पड़ी।

“आपको मेरी ज़िंदगी में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है। मैं बच्ची नहीं हूँ!”


उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर

सास-ससुर और अमित

सब आँगन में इकट्ठा हो गए।


घर का माहौल एक पल में

शांत सुबह से

तनाव से भरी खामोशी में बदल गया।



सच सामने...


रोते-रोते पायल का बाँध टूट गया।

जिस बात को वह अब तक दिल में दबाए बैठी थी,

आज वह सब शब्द बनकर बाहर आ गया।


उसका छुपा हुआ प्यार,

शादी को लेकर परिवार का दबाव,

और भीतर-ही-भीतर पलता डर—

सब कुछ उसने एक-एक कर कह दिया।


कमरे में सन्नाटा छा गया।


सास का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था,

जबकि ससुर सिर झुकाए चुपचाप खड़े थे—

मानो शब्द भी साथ छोड़ गए हों।


उसी खामोशी में

अनु आगे बढ़ी।


उसकी आवाज़ शांत थी,

मगर बातों में गहराई थी—


“माजी,

गलती को छुपाने में नहीं,

गलती को सुधारने में ही समझदारी होती है।”


फिर उसने सास की आँखों में देखकर कहा—


“अगर लड़का सही है,

और नीयत साफ़ है,

तो गुस्से से नहीं…

बात-चीत से हर मसले का हल निकाला जा सकता है।”



नई शुरुआत...


कुछ दिनों बाद

लड़के के घर वाले विधिवत घर आए।

बातचीत हुई, रिश्ते की हर कड़ी परख़ी गई

और आखिरकार

दोनों परिवारों की रज़ामंदी से

शादी पक्की हो गई।


यह सुनते ही

पायल का बाँधा हुआ सब्र टूट गया।

वह पहली बार आगे बढ़कर

अनु के गले लग गई

और फूट-फूट कर रो पड़ी।


“भाभी…

मैं आपको गलत समझ बैठी थी।

आपने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा।”


अनु ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए

हल्की सी मुस्कान के साथ कहा—


“कोई बात नहीं पायल।

रिश्ते रंगों जैसे ही तो होते हैं,

अगर वक़्त पर मिल जाएँ

तो ज़िंदगी को और भी खूबसूरत बना देते हैं।”


आँगन में खड़ी हवा तक

उस पल

सुकून से भर गई।



कुछ दिनों बाद

घर का माहौल बदला-बदला सा था।


जो बातें पहले चुभती थीं,

अब समझ में आने लगी थीं।


पायल अब

अनु से नज़रें चुराने के बजाय

उसके पास आकर बैठने लगी।


एक शाम

आँगन में चाय रखते हुए

सास ने अनु के सिर पर हाथ रखा और बोलीं—


“बहु,

तू इस घर में

सिर्फ़ बहू बनकर नहीं आई,

तू इस घर की रौनक बनकर आई है।”


अनु की आँखें भर आईं।


आँगन में

हल्की-सी हँसी गूँज उठी।

मन की सारी कड़वाहट

धीरे-धीरे

पिघल गई।


रिश्तों के रंग

अब सच में

खिल उठे थे।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.