खामोश दस्तक
सुबह के साढ़े सात बज रहे थे।
घड़ी की सुइयाँ जैसे मुझसे पहले भाग रही थीं।
एक हाथ में लैपटॉप बैग, दूसरे में फाइलें और फोन कान से लगाए मैं तेजी से सीढ़ियाँ उतर रही थी। मन में बस एक ही चिंता थी — आज फिर देर हो रही है।
जैसे ही मुख्य दरवाज़ा खोला, अचानक पाँव रुक गए।
बरामदे में पानी फैला था। रात की बारिश का जमा हुआ पानी।
“एक काम ठीक से नहीं होता…”
मन ही मन बड़बड़ाई।
तभी सामने दिखा —
हमारे अपार्टमेंट का नाइट गार्ड, रमेश।
गीली चप्पलें, फटी जैकेट, आँखों में रात भर की जागी थकान।
“मैडम… माफी। रात में लाइट चली गई थी। अकेला था, पूरा पानी नहीं हटा पाया।”
मैंने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
बस इतना कहा,
“ध्यान रखा करो। कोई गिर गया तो जिम्मेदारी किसकी होगी?”
और गाड़ी स्टार्ट कर दी।
रास्ते भर ऑफिस की मीटिंग, प्रेज़ेंटेशन और टार्गेट दिमाग में घूमते रहे,
पर जाने क्यों
रमेश की झुकी हुई निगाहें बार-बार सामने आ जाती थीं।
यह वही रमेश था
जो हर रात गेट खोलता,
हर सुबह सिर झुकाकर सलाम करता,
और हर त्योहार पर वह हल्की-सी झिझक के साथ, नज़रें झुकाए कहता —
“मैडम… अगर मिठाई मिल जाए तो…”
पर मैंने कभी नहीं सोचा
कि वह भी किसी का पिता होगा,
किसी के सपनों की जिम्मेदारी उठाए होगा।
मेरे लिए वह बस
एक चौकीदार था।
इस अपार्टमेंट में आए मुझे बारह साल हो चुके थे।
तब मैं भी नई थी,
थकी हुई, अकेली,
अपने करियर को संभालने में लगी।
रमेश तब जवान था।
हँसकर बातें करता था।
कभी-कभी चाय माँग लेता।
धीरे-धीरे
फ्लैट भरते गए,
लोग बढ़ते गए,
और शिकायतें भी।
“रमेश ठीक से ड्यूटी नहीं करता।”
“रात में सो जाता है।”
“इसे बदल देना चाहिए।”
सोसाइटी मीटिंग में मैं भी चुपचाप सिर हिला देती थी।
उसके पक्ष में
कभी एक शब्द नहीं बोला।
एक दिन लिफ्ट में पड़ोसन सीमा मिलीं।
“आपको पता है? रमेश का बेटा इस बार बोर्ड में अच्छा कर रहा है।”
मैंने औपचारिक मुस्कान के साथ कहा,
“अच्छा है।”
और मन ही मन सोचा —
हमारा क्या लेना-देना।
मेरे अपने बच्चे विदेश में पढ़ रहे थे।
उनकी फीस, उनकी डिग्रियाँ,
उनका भविष्य —
यही मेरी दुनिया थी।
एक शाम मैं जल्दी घर लौट आई।
बुखार से बदन तप रहा था।
सोफे पर पड़ी आँखें बंद किए थी कि
दरवाज़े पर बहुत हल्की-सी दस्तक हुई।
“मैडम…”
मैंने दरवाज़ा खोला।
सामने रमेश खड़ा था।
हाथ में एक छोटा सा थैला।
“आप सुबह से ठीक नहीं लग रही थीं…
ये काढ़ा है। वैद्य जी ने दिया है।”
उस पल
मेरे गले में कुछ अटक गया।
पहली बार
मैंने उसे इंसान की तरह देखा।
उसकी आँखों में थकान थी,
पर चिंता भी।
कुछ दिन बाद
रिज़ल्ट का मौसम आया।
रविवार की सुबह थी।
सोसाइटी में हलचल थी।
अचानक नीचे से शोर सुनाई दिया।
“रमेश मिठाई बाँट रहा है!”
मैं बालकनी में आई।
नीचे रमेश खड़ा था।
साफ कपड़े पहने,
चेहरे पर अजीब-सी चमक।
मुझे देखते ही उसने हाथ जोड़ दिए।
“मैडम…
मेरा बेटा इंजीनियरिंग एंट्रेंस में सिलेक्ट हो गया।
सरकारी कॉलेज!”
मेरी आँखें नम हो गईं।
वह धीरे से बोला,
“रात की जो नींद नहीं आती थी न…
वही उसकी किताबों में लगा दी।”
शाम को सीमा फिर मिलीं।
आज उनका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों में वही पुरानी चमक नहीं थी।
आवाज़ भी पहले जैसी दृढ़ नहीं लग रही थी।
“हमारे बेटे का नहीं हुआ…”
कहते-कहते उनका गला भर आया।
“इतना पैसा लगाया,
महँगी कोचिंग दिलवाई,
नया मोबाइल, लैपटॉप…
किसी चीज़ की कमी नहीं रखी थी,
फिर भी…”
शब्द अधूरा रह गया।
कभी-कभी
सारी सुविधाएँ भी
किस्मत और मेहनत के आगे
बेबस हो जाती हैं।
मैंने कुछ नहीं कहा।
रात को बिस्तर पर लेटी तो
मन भारी था।
मुझे याद आया —
कितनी बार मैंने रमेश को डाँटा,
कितनी बार उसकी मजबूरी को आलस समझा।
और वह…
हर रात जागता रहा
किसी और के उजाले के लिए।
अगली सुबह मैं नीचे गई।
रमेश गेट पर खड़ा था।
मैंने पहली बार कहा,
“रमेश…
अगर तुम्हारे बेटे की आगे की पढ़ाई में
कभी किसी मदद की ज़रूरत हो…
तो बताना।”
वह चुप हो गया।
आँखें भर आईं।
“मैडम…
आपने आज मुझे इंसान समझ लिया,
यही बहुत है।”
उस दिन के बाद
बरामदे का पानी
मुझे गंदा नहीं लगा।
रात की टोर्च
मुझे मामूली नहीं लगी।
और चौकीदार…
मुझे छोटा नहीं लगा।
कभी-कभी
जो सबसे नीचे खड़ा होता है,
वह सबसे ऊँचा सपना जी रहा होता है।
और हम…
ऊपर खड़े होकर भी
उसे देखने की हिम्मत नहीं करते।

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