जब चुप्पी बोल पड़ी
नेहा की शादी को अभी सिर्फ़ दो महीने ही हुए थे।
नई-नई शादी, नया घर, नए लोग—सब कुछ उसके लिए अनजाना था।
नेहा एक स्कूल में टीचर थी।
सुबह सात बजे घर से निकलती
और शाम छह बजे तक लौटती।
वो काम से लौटती तो चेहरे पर थकान साफ़ दिखती,
लेकिन आँखों में कभी शिकायत नहीं होती।
उसकी सास, सरोज देवी, सुबह चार बजे उठ जाती थीं।
रसोई, पूजा, साफ़-सफ़ाई—सब कुछ अपने हाथों से।
उन्हें आदत थी सब कुछ समय पर करने की।
सरोज देवी को उम्मीद थी कि
नई बहु आएगी तो
घर थोड़ा हल्का हो जाएगा।
लेकिन नेहा तो नौकरी वाली बहु निकली।
मन की दूरी...
नेहा जब शाम को घर आती,
तो चुपचाप कपड़े बदलती
और कभी पानी पीकर
तो कभी सिर पकड़कर
बिस्तर पर बैठ जाती।
सरोज देवी मन ही मन सोचतीं—
“हम भी तो काम करते थे…
तब कौन-सा आराम मिला था?”
वो कुछ कहती नहीं थीं,
पर उनका मौन
धीरे-धीरे भारी होता जा रहा था।
नेहा के पति अंकित
अपनी माँ और पत्नी
दोनों को समझते थे।
वो कहते—
“माँ, नेहा थक जाती है।”
और नेहा से—
“थोड़ा माँ के साथ बैठ लिया करो।”
लेकिन दोनों के बीच
एक अनकही दीवार खड़ी थी।
तुलना का ज़हर...
एक दिन सरोज देवी
अपनी सहेली माया से मिलीं।
माया बड़े गर्व से बोली—
“मेरी बहु तो सोने की है।
नौकरी नहीं करती,
पूरा घर संभालती है,
मुझे एक गिलास पानी भी नहीं उठाने देती।”
सरोज देवी के मन में
कुछ चुभ गया।
घर लौटते समय
उन्होंने नेहा को देखा
जो स्कूल का बैग रखकर
चुपचाप रसोई में पानी पी रही थी।
सरोज देवी बिना देखे बोलीं—
“आज सब्ज़ी काट दोगी?”
नेहा ने थकी आवाज़ में कहा—
“जी माँ… बस दस मिनट में।”
पर दस मिनट
सरोज देवी को
दस घंटे लगे।
एक रविवार...
रविवार की सुबह
नेहा देर से उठी।
सिर दर्द था
और आँखें भारी थीं।
सरोज देवी ने रसोई में
खाना बनाना शुरू किया
और हर कटोरी के साथ
उनका गुस्सा भी उबलता गया।
“रविवार है तो क्या,
बहु को आराम ही करना है?”
नेहा कमरे से बाहर नहीं निकली।
दोपहर तक
सरोज देवी का सब्र टूट गया।
उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया—
“बहु, तबियत इतनी खराब है
तो बता देती!”
नेहा की आँखें भर आईं—
“माँ, माफ़ कीजिए…
मैं बस आज कुछ बोल नहीं पा रही थी।”
उस दिन
दोनों के बीच
पहली बार
खामोशी ने आवाज़ पकड़ी।
एक छोटा-सा सच...
शाम को
अंकित घर आया।
उसने माँ को बैठाया
और कहा—
“माँ, नेहा कल से छुट्टी पर है।
डॉक्टर ने कहा है
ज़्यादा थकान और स्ट्रेस है।”
सरोज देवी चौंक गईं—
“पर उसने बताया क्यों नहीं?”
अंकित बोला—
“वो डरती है
कि आप बुरा न मान जाएँ।”
ये बात
सरोज देवी के दिल में
सीधे उतर गई।
मदर्स डे की सुबह...
अगली सुबह सरोज देवी रोज़ से भी पहले उठ गईं।
रसोई में पहुँचते ही उन्होंने गैस जलाई
और चाय बनाने की तैयारी करने लगीं।
थोड़ी देर बाद नेहा की नींद खुली।
वह कमरे से बाहर आई
तो देखा—
माँ रसोई में खड़ी चाय बना रही थीं।
नेहा एक पल के लिए रुक गई।
आज पहली बार
उसे लगा जैसे
वो सास नहीं,
वाक़ई उसकी माँ हों।
“माँ… आप?”
नेहा हैरान होकर बोली।
सरोज देवी मुस्कुराईं।
आज उनकी आवाज़ में
पहली बार सख़्ती नहीं,
ममता थी—
“आज मैं करूँगी।
तू बैठ जा बेटा।”
कुछ देर बाद
अंकित कमरे से बाहर आया।
टेबल पर
एक छोटा-सा केक रखा था।
नेहा की आँखें चमक उठीं।
वह धीरे से बोली—
“माँ, हैप्पी मदर्स डे।
मुझे आज समझ आया
कि माँ सिर्फ़ जन्म देने से नहीं बनती,
माँ वो होती है
जो बिना कहे समझ ले।”
सरोज देवी की आँखें भर आईं।
उन्होंने नेहा का हाथ थाम लिया और कहा—
“और मुझे आज समझ आया
कि बहु भी बेटी बन सकती है,
अगर उसे दिल से अपनाया जाए।”

Post a Comment