राख से रास्ता

 

Three rural Indian women sitting in a small village kitchen, warming leftover vegetables on a traditional clay stove, showing hardship, unity, and hope in daily life.


सुबह की धुँधली रोशनी रसोई में फैल रही थी।

चूल्हे की आँच धीमी थी, जैसे घर की हालत।


छोटी बहु सरिता कड़ाही में रात की बची हुई सब्ज़ी को गरम कर रही थी।

कड़ाही के तले में चम्मच घुमाते-घुमाते उसने जीठानी कमला की ओर देखा—


“दीदी…

इतनी-सी सब्ज़ी में तीनों कैसे खाएँगे?

बच्चे भी तो माँगेंगे।”


कमला ने सिर झुका लिया।

“क्या करें छोटी…

घर में एक आलू भी नहीं है।

मिर्च, प्याज़, कुछ भी नहीं।

आज तो यही खिलाकर भेजना पड़ेगा।”


पास बैठी मँझली बहु रेणु बोली—

“हम लोग तो नमक-रोटी में गुज़ारा कर लेते हैं दीदी,

पर बच्चों को देखकर कलेजा मुँह को आ जाता है।

भगवान जाने कब ये हालात बदलेंगे।”


तीनों बहुओं की आँखों में

थकान भी थी,

डर भी

और चुपचाप सहने की आदत भी।


सास की मजबूरी...


तभी बाहर से

गेहूँ की बोरी ज़मीन पर रखने की आवाज़ आई।


सास शांति देवी बोरी उठाए रसोई में आईं।


“माँ!

आप अकेली क्यों गईं?”

कमला बोली।


शांति देवी ने साँस सम्हालते हुए कहा—

“अगर तुम लोग साथ जातीं

तो घर का चूल्हा कौन संभालता?

सरिता की तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती।”


फिर उन्होंने दुखी होकर कहा—

“अब तो बस कोटे का राशन ही सहारा है।

सब्ज़ी खरीदने का सोचो

तो सौ रुपया चाहिए।

और सौ रुपया…

आजकल हमारे लिए बहुत बड़ी बात है।”


पेट भरना भी संघर्ष...


दोपहर को

तीनों बेटे—

मोहन, सुरेश और राजू

काम की तलाश में निकलने लगे।


थाली में वही पुरानी सब्ज़ी देखकर

मोहन ने मुँह बना लिया—


“रात को भी यही थी।”


रेणु ने दबे स्वर में कहा—

“चार दिन से घर में हरी सब्ज़ी नहीं आई।

काम मिले तो आप लोग ही ले आया करो।”


राजू बोला—

“आज काम नहीं मिला

तो सब्ज़ी कहाँ से लाएँ?”


तीनों भाई बिना बहस किए

रोटी खाकर निकल गए।


रास्ते में

पड़ोसी के घर से

चिकन पकने की खुशबू आई।


राजू बोला—

“पापा…

मुझे भी चिकन खाना है।”


मोहन ने बेटे के सिर पर हाथ रखा—

“आज काम मिला

तो जरूर खिलाऊँगा।”


मेहनत की पहली राहत...


उस दिन किस्मत ने साथ दिया।

तीनों को दिहाड़ी मिल गई।

ठेकेदार ने खुश होकर

कुछ पैसे ज़्यादा भी दे दिए।


घर लौटते वक्त

चिकन और थोड़ी-सी मछली खरीदी।


घर में जैसे

त्योहार आ गया।


बच्चे खुशी से उछल पड़े।


पर बहुएँ जानती थीं—

आज पेट भरेगा,

कल फिर वही चिंता।


नदी ने दिया इशारा...


कुछ दिन बाद

बारिश में

कपड़े धोने

तीनों बहुएँ नदी गईं।


नदी के किनारे

हरा साग उगा हुआ था।


सरिता बोली—

“दीदी देखो!

कितना बढ़िया साग है।”


रेणु ने पानी में हाथ डाला

और एक बड़ी मछली पकड़ ली।


“अरे!

ये तो भगवान की देन है।”


उस दिन

घर में

बिना पैसा खर्च किए

साग और मछली बनी।


सास की आँखें भर आईं।


सोच बदली...


उसी रात

तीनों बहुएँ देर तक बैठीं।


रेणु बोली—

“क्यों न आँगन में

छोटा-सा गड्ढा करके

मछली पाल लें?”


कमला ने कहा—

“पीछे की ज़मीन में

सब्ज़ी उगा लेते हैं।”


सरिता ने हिम्मत से कहा—

“मेहनत हमारी होगी,

तो पेट भी हमारा भरेगा।”


शुरुआत छोटी, हौसला बड़ा...


तीनों बहुओं ने आपस में सलाह करके

आँगन के एक कोने में

एक छोटा-सा गड्ढा खोदा।


नदी से पकड़कर लाई गई

छोटी-छोटी मछलियों को

सावधानी से उसमें छोड़ दिया,

ताकि वे सुरक्षित रह सकें

और धीरे-धीरे बड़ी हो सकें।


घर के पीछे पड़ी खाली ज़मीन

उन्होंने खुद ही साफ़ की—

झाड़-झंखाड़ हटाए,

मिट्टी पलटी

और छोटे-छोटे क्यारियाँ बनाई।


फिर उसमें

साग, भिंडी और बैंगन के बीज बोए।


इसके बाद

हर दिन उनका एक ही काम हो गया—

समय पर पानी देना,

घास-फूस निकालकर

पौधों की देखभाल करना,

और मन में पूरा विश्वास रखकर

धैर्य से इंतज़ार करना।


उन्हें पता था—

मेहनत अगर सच्ची हो,

तो फल ज़रूर मिलता है।


मेहनत रंग लाई...


कुछ ही हफ्तों में

आँगन का गड्ढा

जीवन से भर उठा।


छोटी-छोटी मछलियाँ

अब हाथ भर की हो चली थीं,

पानी में तैरते हुए

जैसे उम्मीदें दिखती थीं।


पीछे की ज़मीन पर

हरी सब्ज़ियाँ लहलहा उठीं—

साग की कोमल पत्तियाँ,

भिंडी की सीधी कतारें,

बैंगन के पौधों पर

पहले फूल, फिर फल।


एक सुबह

तीनों बहुएँ

टोकरियों में भरकर

अपनी मेहनत की कमाई

बाज़ार पहुँचीं।


“ले लो जी,

खेत की तोड़ी ताज़ी सब्ज़ी!”

उनकी आवाज़ में अब

झिझक नहीं,

आत्मविश्वास था।


ग्राहक रुके,

सब्ज़ी देखी,

और बिना मोलभाव

खरीद ले गए।


शाम होने से पहले

एक भी सब्ज़ी बची नहीं।


हाथ में

पहली बार

अपने श्रम की कमाई थी,

और मन में

एक अटूट भरोसा—


अब ज़िंदगी

किसी के रहम पर नहीं,

अपनी मेहनत पर चलेगी।


नई ज़िंदगी...


अब घर में

रोज़ ताज़ी हरी सब्ज़ी पकने लगी थी।

कभी-कभी मछली भी चूल्हे पर चढ़ जाती।


बच्चों के चेहरे,

जो कभी भूख से मुरझाए रहते थे,

अब मुस्कान से खिल उठते थे।


घर में सिर्फ़ चूल्हा ही नहीं,

इज़्ज़त और आत्मविश्वास भी जलने लगा था।


सास ने बहुओं की ओर स्नेह से देखते हुए कहा—

“गरीबी अगर किस्मत है,

तो उससे बाहर निकलना मेहनत का फल है।”


तीनों बहुएँ एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा उठीं।

राख से सचमुच रास्ता निकल आया था।



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