जब आईना बदला, नज़र नहीं

 

Indian woman opening her wardrobe and looking at old western dresses, symbolizing memories and emotional change.


शहर के सबसे बड़े मॉल में उस दिन खूब भीड़ थी।

रोशनी से चमकता हर स्टोर, नए कपड़ों की खुशबू और लोगों की भागदौड़—

सब कुछ वैसा ही था, जैसा त्योहारों से पहले होता है।


युक्ति एक साड़ी के स्टोर में खड़ी थी।

हल्की आसमानी साड़ी को हाथ में लेकर आईने में खुद को देख रही थी।

आईने में वही चेहरा था—

पर शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।


उसी वक्त उसकी जिठानी लतिका,

वन पीस हाथ में लिए, मुस्कुराती हुई उसके पास आकर बोली—


“देखो देवराणी जी, ये वन पीस कितना अच्छा है ना?”


युक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“हाँ भाभीजी, आप पर तो सब अच्छा लगता है।”


लतिका ने हँसते हुए पलटकर कहा—

“अरे, मैं तुम्हारे लिए नहीं पूछ रही हूँ, अपने लिए देख रही हूँ।”


फिर बातों-बातों में व्यंग्य उतर आया—

“वैसे भी अब तुम पर तो साड़ी के अलावा कुछ जचता नहीं।”


युक्ति चुप रह गई।

क्योंकि जवाब देने की ताक़त अब शब्दों में नहीं,

दिल में ही कहीं दब गई थी।



घर आकर युक्ति ने अलमारी खोली।

नई खरीदी साड़ियाँ करीने से रखीं

और बगल में टंगे पुराने गाउन, वन पीस, सलवार सूट—

जो अब सिर्फ़ कपड़े नहीं थे,

बल्कि उसकी उस ज़िंदगी के निशान थे

जिसमें वह कभी बेफ़िक्र होकर हँसती थी,

खुद को आईने में देखकर मुस्कुराती थी।

आज वे कपड़े जैसे उसे चुपचाप देख रहे थे—


पूछ रहे हों,

“क्या हम सच में तुम्हारे नहीं रहे?”


युक्ति ने अलमारी बंद कर दी,

पर मन की अलमारी

उस दिन खुली ही रह गई।


पति नकुल बच्चे आरव को गोद में लिए कमरे में आया।


“क्या लाई मार्केट से?”

उसने मुस्कराकर पूछा।


“साड़ियाँ…”

युक्ति ने बस इतना कहा।


नकुल ने पुराने कपड़ों की ओर देखते हुए कहा—

“इनमें तुम कितनी खूबसूरत लगती थीं।”


युक्ति ने धीरे से कहा—

“अब वो वक़्त चला गया है।”


नकुल ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

“मेरे लिए तुम आज भी वैसी ही हो।”


उस पल युक्ति को लगा—

काश पूरी दुनिया भी ऐसा सोचती।



शादी की तैयारी और तुलना की सुईयाँ...


ननद आभा की शादी तय हुई।

घर में चर्चाओं का दौर शुरू हुआ—

कौन क्या पहनेगा, किसका लुक सबसे अलग होगा।


लतिका ने पूरे आत्मविश्वास से कहा—

“मेरे कपड़े सरप्राइज़ होंगे।”


युक्ति ने बस इतना कहा—

“मैं हर फंक्शन में साड़ी पहनूँगी।”


लतिका हँस दी—

“अब तुम साड़ी में भी भद्दी लगती हो।”


कमरा ठहाकों से नहीं,

खामोशी से भर गया।



हल्दी के दिन पीली साड़ी में युक्ति सबसे पीछे खड़ी थी।

कुछ रिश्तेदारों की फुसफुसाहट उसके कानों तक पहुँच रही थी—


“ऐसी साड़ी पहनकर आई है?”

“कमर ढकी नहीं है।”

“शादी में तो ढंग से आना चाहिए।”


उसका आत्मविश्वास

पीले रंग की हल्दी से पहले ही फीका पड़ गया।


मेहंदी में भी यही हुआ।

लतिका की तारीफ़ों के बीच

युक्ति की चुप्पी और गहरी हो गई।



संगीत के फंक्शन में युक्ति स्टेज पर गई।

डांस करते हुए साड़ी का पल्लू खिसक गया।


भीड़ में फुसफुसाहट तेज़ हो गई—


“इसे नाचना ही नहीं चाहिए था।”

“अब ननद को ताने मिलेंगे।”


युक्ति रोती हुई कमरे में लौट आई।


उसके दोस्त—

राणी, अमीशा, सीमा और धीरज—

उसके पास आ गए।


“तू वही युक्ति है ना

जो कॉलेज की स्टाइल आइकन थी?”

“लोगों की बातों से तू इतनी छोटी कैसे हो गई?”


युक्ति की आँखें भर आईं—


“सिजेरियन के बाद मेरा शरीर बदल गया,

और उसके साथ मेरा कॉन्फिडेंस भी।”


धीरज ने मुस्कराकर कहा—

“कल सब बदलेगा।”




शादी का दिन और नया आईना...


अगली सुबह

जब युक्ति तैयार हुई—

तो वो सिर्फ कपड़ों से नहीं,

अपने डर से भी बाहर निकली।


सरल लेकिन खूबसूरत पहनावे में,

खुद को स्वीकार करते हुए

वो मंडप की ओर बढ़ी।


इस बार लोग चुप थे।


कुछ की आँखों में हैरानी थी,

कुछ की नज़रों में सम्मान।


नकुल ने धीरे से कहा—

“आज तुम सच में खूबसूरत लग रही हो।”


युक्ति मुस्कराई।

क्योंकि आज उसने

आईना नहीं बदला था—

नज़र बदली थी।



> शरीर बदल सकता है,

लेकिन आत्मसम्मान तभी टूटता है

जब हम दूसरों की नज़र को

अपनी पहचान बना लेते हैं।




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