पंखे की हवा और एसी की ठंड
इस साल की गर्मी कुछ ज़्यादा ही पड़ रही थी।
दोपहर के दो बजे थे और सूरज मानो आग बरसा रहा था।
घर के आँगन में बैठी सरिता बार-बार पसीना पोंछ रही थीं।
रसोई में चूल्हा जल रहा था और गर्मी से उनका बुरा हाल था।
“आज तो बाजार जाने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा,”
सरिता ने अपनी बेटियों श्वेता और रिया से कहा।
रिया बोली,
“माँ, लेकिन सब्ज़ी और राशन तो खत्म हो गया है।”
सरिता ने गहरी साँस ली।
“ठीक है, तुम दोनों बहनें बाजार जाकर सामान ले आओ।
तब तक मैं घर पर कुछ बना लेती हूँ।”
श्वेता और रिया छाता लेकर बाजार के लिए निकल गईं।
घर से बाहर निकलते ही गर्म हवा के थपेड़े लगने लगे।
“दीदी, ये गर्मी तो हद से ज़्यादा पड़ रही है,”
रिया ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।
“जरा-सा घर से बाहर निकलो और पूरा शरीर पसीने से तर हो जाता है।”
श्वेता ने गहरी साँस लेते हुए हामी भरी,
“सच कह रही हो रिया।
लगता है इस बार गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।”
उधर घर पर...
उधर सरिता के घर पर योगेश अपने दोस्त जगदीश से मिलने आया था।
वह दरवाज़े पर पहुँचा और आवाज़ दी।
योगेश बोला,
“बहन जी, जगदीश भाईसाहब घर पर हैं क्या?”
सरिता बोलीं,
“वो पड़ोस में गए हैं, अभी आते ही होंगे।
आप बैठिए।”
थोड़ी देर में जगदीश आ गए।
“अरे योगेश!
कितने दिनों बाद मिले हो,”
जगदीश खुश होकर बोले।
योगेश हँसते हुए बोला,
“यार, तेरी याद आ रही थी।
सुना है तू अपनी दोनों बेटियों के लिए रिश्ते देख रहा है?”
जगदीश ने सिर हिलाया।
“हाँ, अब उम्र हो गई है उनकी।”
योगेश बोला,
“तो मैं आज रिश्ता ही लेकर आया हूँ।
दो लड़के हैं, अच्छे परिवार से हैं।
ये रही उनकी तस्वीरें।”
जगदीश और सरिता ने तस्वीरें देखीं।
दोनों लड़के पढ़े-लिखे और सुलझे हुए लग रहे थे।
सरिता बोलीं,
“अगर लड़के अच्छे हैं और बेटियाँ खुश रहेंगी,
तो हमें और क्या चाहिए?”
शादी और सपने...
कुछ ही समय में दोनों बेटियों की शादी तय हो गई।
श्वेता, बड़ी बेटी, की शादी एक बहुत अमीर परिवार में हुई।
बड़ा सा बंगला,
कार,
और हर कमरे में एसी।
रिया, छोटी बेटी, की शादी एक साधारण परिवार में हुई।
छोटा सा घर,
एक ही पंखा,
और सीमित साधन।
विदाई के समय दोनों बहनों ने एक-दूसरे से वादा किया—
“हम हमेशा एक-दूसरे के साथ रहेंगी।”
दो अलग-अलग ज़िंदगी...
श्वेता अपने ससुराल में बहुत खुश थी।
उसकी पहली रसोई एसी वाली थी।
“वाह,”
वह मन ही मन सोचती,
“एसी में खाना बनाते हुए पसीना तक नहीं आता।”
उधर रिया…
चूल्हे के सामने खड़ी थी।
गर्मी से पसीना बह रहा था।
घर में सिर्फ़ एक पंखा था,
जिसके नीचे उसके ससुर और पति बैठे थे।
रिया मन में बोली,
“ऐसे में वहाँ बैठना ठीक नहीं होगा।”
वह वापस रसोई में ही चली गई।
“मायके में हालात जैसे भी रहे हों,”
उसने मन ही मन खुद से कहा,
“लेकिन अब माँ और दीदी को मेरी तकलीफ़ का पता नहीं चलना चाहिए।
मैं नहीं चाहती कि वे मेरे लिए परेशान हों।”
झूठी मुस्कान...
एक दिन श्वेता का फोन आया।
“रिया, कैसी हो?
अपने ससुराल में खुश हो ना?”
रिया ने मुस्कराकर कहा,
“हाँ दीदी, बहुत खुश हूँ।
मेरी रसोई में तो एसी लगा है।”
फोन रखते ही उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े।
“मैं झूठ क्यों बोल रही हूँ?”
उसने खुद से पूछा।
“क्योंकि मैं अपनी दीदी को परेशान नहीं करना चाहती,”
रिया ने मन ही मन खुद को समझाया।
अचानक सच सामने...
एक दिन श्वेता ने बिना बताए रिया को सरप्राइज़ देने का फैसला किया।
उसने सोचा, आज अचानक पहुँचकर अपनी छोटी बहन को खुश कर दूँगी।
कुछ गिफ्ट खरीदे और अपनी कार से रिया के ससुराल की ओर निकल पड़ी।
दरवाज़े पर पहुँचते ही जैसे उसके कदम थम गए।
सामने
एक छोटा-सा घर था,
अंदर रसोई में भरी हुई गर्मी,
और चूल्हे के सामने खड़ी रिया—
पसीने से तर-बतर,
आँचल से बार-बार माथा पोंछती हुई
चुपचाप खाना बना रही थी।
वह दृश्य देखते ही श्वेता की आँखें भर आईं।
दिल जैसे किसी ने कसकर पकड़ लिया हो।
“रिया…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“तूने मुझसे इतना बड़ा सच क्यों छुपाया?”
रिया पलटी।
सामने अपनी दीदी को देखकर
उसका सब्र टूट गया।
आँखों से आँसू बह निकले।
“दीदी,”
वह रोते हुए बोली,
“मैं नहीं चाहती थी कि आप मेरे लिए परेशान हों।
मैं आपकी खुशी के बीच अपनी तकलीफ़ नहीं लाना चाहती थी।”
श्वेता आगे बढ़ी
और बिना कुछ कहे
रिया को अपने सीने से लगा लिया।
“पगली,”
वह भावुक होकर बोली,
“बहनें कभी बोझ नहीं होतीं।
वे तो एक-दूसरे का सहारा होती हैं—
हर हाल में, हर दर्द में।”
नई शुरुआत...
श्वेता ने अपने पति से बात की।
रिया के पति को अच्छी नौकरी दिलवाई।
धीरे-धीरे हालात बदलने लगे।
कुछ समय बाद
रिया के घर की रसोई में भी एसी लग गया।
उस दिन रिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“दीदी,
आज डिनर हमारे घर होगा।”
श्वेता ने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
रसोई में ठंडी हवा फैल रही थी,
और रिया के चेहरे पर संतोष की चमक थी।
श्वेता का दिल भर आया।
वह मन ही मन बोली—
“आज सच में
मेरी छोटी बहन खुश है।”
उस दिन
दोनों बहनें
एक ही मेज़ पर बैठी
मुस्कुराते हुए खाना खा रही थीं।
अब केवल रसोई में ही ठंडक नहीं थी,
बल्कि उनके दिल भी
सुकून और संतोष से भर चुके थे।
क्योंकि उन्होंने समझ लिया था—
असली ठंडक
एसी की हवा से नहीं,
अपनेपन की गर्माहट से मिलती है।

Post a Comment