माँ से प्यारी सास
शादी का दिन था।
घर में शहनाइयों की आवाज़ गूँज रही थी, लेकिन काव्या के दिल में अजीब-सी घबराहट थी।
माँ की कमी उसे हर मौके पर खलती थी, पर आज तो वो कमी और गहरी हो गई थी।
पिता ने पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा… सब ठीक रहेगा। जब मन करे, आ जाना। ये घर आज भी तेरा है।”
काव्या की आँखें भर आईं।
“पापा… आप अकेले कैसे रहेंगे?”
“अरे पगली,”
पिता मुस्कुराए,
“तेरी ससुराल दूर थोड़ी है। मैं आ जाऊँगा, तू आ जाया करेगी।”
पीछे से आवाज़ आई—
“हो गया भावुक ड्रामा? जल्दी कर, देर हो रही है।”
ये आवाज़ थी सौतेली माँ—नीलम की।
वही रूखापन, वही ताना।
काव्या कुछ न बोली।
बस चुपचाप पिता के पैर छुए और विदा हो गई।
ससुराल पहुँची तो सबने बड़े प्यार से स्वागत किया।
फूलों की वर्षा, हल्दी की खुशबू और मुस्कुराते चेहरे।
तभी एक नरम-सी आवाज़ आई—
“आ जा बेटी… डरने की ज़रूरत नहीं।”
काव्या ने सिर उठाया।
सामने खड़ी थीं उसकी सास—शारदा देवी।
उनकी आँखों में अपनापन था।
ऐसा अपनापन, जो काव्या ने कभी महसूस नहीं किया था।
“थक गई होगी,”
शारदा देवी बोलीं,
“पहले आराम कर ले। रस्में बाद में भी हो जाएँगी।”
काव्या चौंक गई।
पहली बार किसी ने उससे काम से पहले उसकी थकान पूछी थी।
डर की परछाईं...
दोपहर के दो बज चुके थे।
काव्या की नींद अचानक टूट गई।
घड़ी पर नज़र पड़ते ही उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
“हे भगवान…”
उसके मुँह से निकल गया,
“इतनी देर हो गई!
पहली रसोई की रस्म…
सब लोग नाराज़ होंगे।”
घबराहट में वह हड़बड़ाकर उठी।
जल्दी-जल्दी गहने उतारते हुए
नहाने के लिए कमरे से बाहर निकली।
उसी समय सामने से उसका पति आ गया।
अचानक टकराव हुआ,
तो उसने तुरंत उसे संभाल लिया।
“संभलकर,”
वह नरमी से बोला,
“इतनी घबराने की ज़रूरत नहीं है।
सब ठीक है, कोई जल्दी नहीं।”
काव्या कुछ कह पाती,
उससे पहले ही सास की नज़र उन पर पड़ गई।
“अरे बच्चों,”
वे हल्की मुस्कान के साथ बोलीं,
“कम से कम दरवाज़ा तो बंद कर लिया करो।”
फिर काव्या की ओर देखकर प्यार से कहा,
“और बहू, आराम से आना।
यहाँ कोई डाँटने वाला नहीं है।”
उनके शब्द सुनते ही
काव्या का मन अतीत में चला गया…
सुबह के दस बज गए हैं!
अब तक सो रही है!
कोई काम नहीं करती, रानी बनकर आई है!
वो कड़वी आवाज़ें
आज भी उसके कानों में गूँज उठीं।
पल भर में
उसकी आँखें भर आईं।
लेकिन इस बार
डर नहीं था…
बस
एक माँ के प्यार की
हल्की-सी राहत थी।
पहली रसोई और टूटा डर...
काव्या ने रसोई में मिठाई बनानी शुरू की।
पहली बार अपने ससुराल में कुछ अपने हाथों से बना रही थी।
उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।
डर मन में बैठा था—
कहीं कुछ गलत न हो जाए…
जैसे ही उसने प्लेट उठाई,
अचानक उसका पैर फिसल गया।
मिठाई से भरी प्लेट ज़मीन पर गिर पड़ी।
“हे भगवान!”
काव्या का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसका पूरा शरीर काँप उठा।
आँखों में आँसू भर आए।
“अब… अब तो मार पड़ेगी…”
वो घबराकर फुसफुसाई।
उसी पल शारदा देवी दौड़ती हुई रसोई में आईं।
“अरे बहू!”
उन्होंने घबराकर पूछा—
“तू ठीक तो है न?
कहीं चोट तो नहीं लगी?”
ये शब्द सुनते ही काव्या टूट गई।
वो वहीं बैठकर रो पड़ी।
“म… मुझे मत मारिए माजी,”
काँपती आवाज़ में बोली,
“मुझसे गलती हो गई…
मैं फिर से मिठाई बना दूँगी…”
शारदा देवी एक पल को स्तब्ध रह गईं।
उनकी आँखों में हैरानी और दर्द उतर आया।
“मारना?”
उन्होंने धीरे से कहा।
फिर काव्या को उठाकर
अपने सीने से लगा लिया।
“बेटी…”
उनकी आवाज़ में ममता घुल गई,
“ये घर है…
कोई जेल नहीं।”
उस पल
काव्या को पहली बार
डर के बिना
माँ की गोद का एहसास हुआ।
सच का बोझ...
एक दिन काव्या दूध लेने बाहर गई।
गली लगभग खाली थी।
दूधवाला दूध नाप रहा था, लेकिन उसकी नज़र बार-बार काव्या पर फिसल रही थी।
जैसे ही काव्या ने पैसे आगे बढ़ाए,
उसने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।
“अरे… छोड़िए!”
काव्या घबराकर पीछे हटी।
दूधवाला हँस पड़ा—
“इतनी खूबसूरत होकर अकेली घूमोगी तो ऐसा ही होगा।”
काव्या का शरीर काँप उठा।
उसने पूरी ताकत से चिल्लाया—
“छोड़ो मुझे!”
उसकी आवाज़ सुनते ही
घर के भीतर से शारदा देवी दौड़ती हुई बाहर आईं।
“क्या हुआ बहू?”
आँखों में चिंता थी।
दूधवाला तुरंत पलट गया
“अरे माँ जी, आपकी बहू ही उलटी-सीधी बातें कर रही है।
बेकार में हंगामा कर रही है।”
बस…
यही सुनते ही शारदा देवी का सब्र टूट गया।
उन्होंने बिना एक पल सोचे
दूधवाले के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
“शर्म नहीं आती तुझे?”
उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन आँखों में आग थी।
“मेरी बहू पर उँगली उठाई तो
याद रख, ज़िंदा नहीं छोड़ूँगी।”
गली में सन्नाटा छा गया।
“अभी इसी वक्त निकल यहाँ से,”
उन्होंने उँगली दिखाकर कहा,
“और दोबारा इस गली में दिखाई दिया
तो पुलिस तक घसीट कर ले जाऊँगी।”
दूधवाला डरकर भाग गया।
काव्या वहीं खड़ी काँप रही थी।
आँखों से आँसू बह रहे थे, साँसें तेज़ थीं।
शारदा देवी ने आगे बढ़कर
उसे अपने सीने से लगा लिया।
“डर मत बेटी,”
उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा,
“अब तू अकेली नहीं है।
मैं हूँ न…
और जब तक मैं हूँ,
तेरी तरफ़ कोई आँख उठाकर नहीं देख सकता।”
काव्या पहली बार
किसी माँ की बाँहों में
सचमुच सुरक्षित महसूस कर रही थी।
बीता हुआ दर्द...
उस रात काव्या सास के पास बैठी थी।
दिन भर दबा हुआ दर्द अब उसके आँसुओं के साथ बाहर आने लगा।
वह रोते-रोते सब कुछ कह बैठी—
“माजी…
मेरी माँ मुझे जन्म देकर चली गई।
मैंने कभी माँ का आँचल नहीं देखा।
पापा ने दूसरी शादी की…
पर सौतेली माँ ने मुझे कभी बेटी नहीं माना।
हर छोटी गलती पर मार पड़ी,
और जब कभी सच बोला,
तो उसी सच को मेरा कसूर बना दिया गया।
मैं हमेशा यही सोचती रही
कि शायद मुझमें ही कोई कमी है,
इसलिए कोई मुझे प्यार नहीं करता…”
काव्या का गला भर आया।
उसके शब्द टूटने लगे।
शारदा देवी की आँखें छलक उठीं।
उन्होंने काव्या को अपने सीने से लगा लिया,
प्यार से उसका माथा चूमा और कहा—
“नहीं बेटी…
कमी तुममें नहीं थी।
कमी तो हालातों की थी।
अब डरने की ज़रूरत नहीं है।
आज से तुम अकेली नहीं हो।
मैं हूँ न…
तुम्हारी माँ बनकर।”
काव्या पहली बार
माँ की गोद में सुकून से रो पाई।
पछतावे की दस्तक...
कुछ दिनों बाद नीलम—काव्या की सौतेली माँ—अचानक उसके ससुराल पहुँच गई।
वह बिना बताए आई थी।
घर के बाहर गाड़ी रुकवाकर जैसे ही वह दरवाज़े की ओर बढ़ी,
उसी समय अंदर काव्या और उसकी सास की बातचीत चल रही थी।
दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था—
हल्का-सा खुला हुआ था।
नीलम अनजाने में वहीं ठहर गई।
अंदर से आती काव्या की काँपती आवाज़ उसके कानों में पड़ गई—
“मुझे कभी माँ का प्यार नहीं मिला…”
नीलम के कदम रुक गए।
वह चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाई।
एक-एक शब्द
उसके दिल में उतरता चला गया—
काव्या का दर्द,
उसकी शिकायत नहीं,
उसका सच।
नीलम वहीं दरवाज़े के पास खड़ी रही,
आँखों से आँसू बहते रहे।
उसे पहली बार एहसास हुआ
कि जिस बेटी को वह कठोर बनाना चाहती थी,
असल में वह सिर्फ़ प्यार माँग रही थी।
काफी देर बाद
काँपते हाथों से उसने दरवाज़े की घंटी बजाई…
उसके हाथ काँप रहे थे, आँखों से आँसू बह रहे थे।
काफी देर तक वह कुछ बोल ही नहीं पाई।
आख़िर हिम्मत जुटाकर बोली—
“मुझे माफ़ कर दे, बेटी…
मैंने एक ही बेटी पाई थी,
और अपने ही हाथों से उसे खो दिया।”
काव्या कुछ पल चुप रही।
उसकी आँखों में बीते हुए ज़ख़्मों की तस्वीरें तैर गईं—
डाँट, मार, ताने और अकेलापन।
फिर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
नीलम के काँपते कंधों पर हाथ रखा और बोली—
“जो बीत गया, उसे जाने दीजिए माँ।
आज अगर आप सच में पछता रही हैं,
तो वही मेरे लिए बहुत है।”
नीलम फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसने काव्या को कसकर गले लगा लिया—
जैसे सालों का बोझ आज उतर गया हो।
उस पल
काव्या को पहली बार
दो माँओं का प्यार
एक साथ महसूस हुआ।
उस दिन काव्या को एक गहरी सच्चाई समझ में आ गई—
रिश्ते खून से नहीं,
व्यवहार, विश्वास और अपनापन से बनते हैं।
जिस माँ के प्यार को वह बरसों से तरसती रही,
वही ममता उसे अपनी सास के रूप में मिली।
और उसी निश्छल प्यार ने
टूटी हुई काव्या को
फिर से मुस्कुराना,
फिर से भरोसा करना
और
फिर से जीना सिखा दिया।

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