भूख, संस्कार और समझ

Indian family drama scene during Navratri showing two daughters-in-law in a traditional home, one emotional and regretful near the prayer area while the other comforts her, warm lighting and spiritual atmosphere.



सुबह-सुबह घर में चहल-पहल थी।
रसोई से प्लेटों की आवाज़ आ रही थी और आंगन में धूप फैल चुकी थी।

नेहा अपने कमरे से बाहर निकलते हुए बोली,
“अरे वाह! आज तो कुछ खास आने वाला है लगता है।”

उसी वक्त संगीता दरवाज़े से अंदर आती दिखीं —
एक हाथ में मोबाइल,
दूसरे हाथ में छोले-भटूरे का पैकेट,
और कान में ईयरफोन लगा हुआ।

“डिलीवरी आ गई,”
वो खुश होते हुए बोली,
“सुबह से ही मन कर रहा था।”

“दीदी, अभी तो आपने नाश्ते में आलू पराठा, मक्खन और चाय पी थी,”
नेहा ने हल्के से कहा।

“अरे वो तो नाश्ता था,”
संगीता हँस दी,
“ये तो पेट की दूसरी भूख है।”

नेहा कुछ कहती,
उससे पहले ही संगीता अपने कमरे की ओर बढ़ गई।




घर के ज़्यादातर काम नेहा ही सँभालती थी।
सास कमला देवी उम्रदराज़ थीं,
घुटनों का दर्द उन्हें जल्दी थका देता था,
इसलिए वे ज़्यादा काम नहीं कर पाती थीं।

संगीता देर से उठती,
थोड़ा-बहुत हाथ बँटा देती
और फिर थकान का बहाना बना लेती।

“मेरे शरीर में अब ताकत नहीं रही,”
वह अक्सर कहा करती,
“पता नहीं नेहा कैसे दिन भर भाग-दौड़ करती रहती है।”

नेहा यह सब सुनकर
बस हल्की-सी मुस्कान के साथ कह देती,
“आदत पड़ गई है, माजी।”




शाम ढल चुकी थी।
रसोई से तेल गरम होने की खुशबू फैल रही थी।

कमला देवी ने आवाज़ लगाई,
“नेहा, चाय बना दे और थोड़े पकौड़े भी तल दे।”

नेहा तुरंत रसोई में जुट गई।
तभी संगीता भी वहाँ आ पहुँची।

“मैं भी मदद कर देती हूँ,”
कहते हुए उसने बेसन का घोल तैयार किया।

लेकिन पकौड़े कढ़ाही से निकलते ही
आधे सीधे उसके मुँह में चले जाते।

नेहा ने संकोच से कहा,
“दीदी, माजी के लिए भी थोड़ा छोड़ दीजिए।”

संगीता ने बेपरवाही से मुँह पोंछा,
“अरे, बन तो रहे हैं ना।”

कुछ देर बाद जब प्लेट माजी के सामने रखी गई,
तो उसमें बस गिनती के ही पकौड़े थे।

कमला देवी ने एक पकौड़ा उठाया,
कौर लिया और चुपचाप प्लेट रख दी।

सब समझ चुकी थीं।

धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोलीं,
“नेहा, तू अलग से फिर बना दे।”





नवरात्रि का पावन समय आ गया था।
नेहा ने पूरे नौ दिन का व्रत रखा था।

सुबह सबसे पहले पूजा करती,
फिर झाड़ू-पोंछा,
रसोई का सारा काम
और घर की बाकी ज़िम्मेदारियाँ —
सब कुछ वही संभालती थी।

वहीं संगीता सिर्फ पूजा के समय आती,
माता के आगे माथा टेकती
और उसके बाद चुपचाप अपने कमरे में चली जाती।

कभी कहती,
“मेरे सिर में बहुत दर्द है,”
तो कभी बहाना बनाती,
“आज बहुत कमजोरी महसूस हो रही है।”

माजी यह सब देखती रहतीं।
कई बार उनसे रहा नहीं जाता।

वे गहरी साँस लेकर कहतीं,
“बड़ी बहू होकर भी
घर की ज़िम्मेदारी नहीं समझती।”




कन्या पूजन का दिन...



कन्या पूजन का दिन

कन्या पूजन वाले दिन
नेहा सुबह से ही काम में जुट गई थी।

रसोई में पूजा की शांति घुली हुई थी।
हलवा धीरे-धीरे पक रहा था,
चना ठीक से उबल चुके थे,
पूड़ियाँ सुनहरी होकर फूल रही थीं
और खीर की खुशबू पूरे घर में फैल गई थी।

सब कुछ उसने बड़े प्रेम और श्रद्धा से बनाया
और माता रानी के सामने सजा दिया।

संतोष की साँस लेते हुए नेहा बोली,
“अब बस बच्चियों को बुला लाऊँ।”
यह कहकर वह बाहर चली गई।

इधर, घर के अंदर
संगीता के पेट में फिर वही हलचल शुरू हो गई।

उसने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए सोचा,
“आज सुबह से कुछ ढंग का खाया भी तो नहीं है।”

वह रसोई में गई,
इधर-उधर नज़र दौड़ाई
और जैसे ही उसकी नज़र
मंदिर के सामने रखे प्रसाद पर पड़ी,
उसके कदम अपने आप वहीं रुक गए।

“थोड़ा-सा ही तो खाऊँगी,”
उसने खुद को समझाया।

पर एक कौर के बाद दूसरा,
और फिर तीसरा…
कहते-कहते
सारा प्रसाद कब खत्म हो गया,
उसे खुद भी पता नहीं चला।




गलती का एहसास...


जैसे ही नेहा नौ कन्याओं को लेकर घर के अंदर आई,
एक पल को पूरा माहौल ठहर-सा गया।
मंदिर के सामने सजा स्थान खाली था।
ना हलवा, ना पूड़ी, ना खीर — कुछ भी नहीं।

“प्रसाद…?”
माजी की आवाज़ अचानक रुक गई,
फिर काँपते हुए निकली,
“प्रसाद कहाँ है?”

संगीता का चेहरा पीला पड़ गया।
उसकी आँखें झुक गईं,
होंठ काँपने लगे।

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई माजी,”
वह फूट-फूटकर रो पड़ी,
“मैंने जानबूझकर नहीं किया।
मुझे लगा कन्याएँ जा चुकी हैं…
मैं अपनी भूख पर काबू नहीं रख पाई।”

कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।

नेहा धीरे से आगे बढ़ी।
उसने संगीता का काँपता हुआ हाथ थाम लिया।

“अब रोने से कुछ नहीं होगा, दीदी,”
नेहा ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“गलती हो गई है, तो उसका समाधान भी हम दोनों मिलकर करेंगे।
माता रानी दया की देवी हैं —
अगर मन सच्चा हो, तो रास्ता भी वही दिखाती हैं।”

संगीता ने आँसू भरी आँखों से नेहा की ओर देखा।
उसे पहली बार
अपनी भूल का असली एहसास हुआ।




बदलाव की शुरुआत...


दोनों बहुएँ बिना देर किए
फिर से रसोई में जुट गईं।

नेहा आटा गूँथने लगी
और संगीता चुपचाप कढ़ाही चढ़ाने लगी।
आज न कोई शिकायत थी,
न आलस का बहाना —
बस एक अपराधबोध
और उसे सुधारने की सच्ची इच्छा।

कुछ ही समय में
हलवा, चना और पूड़ियाँ
फिर से तैयार हो गए।

कन्याओं को प्रेम और श्रद्धा से भोजन कराया गया।
माता रानी की पूजा
विधि-विधान से पूरी हुई
और घर का वातावरण
फिर से पवित्र और शांत हो गया।

उस दिन के बाद
संगीता में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।

अब वह
कम खाती थी
और ज़्यादा काम में हाथ बँटाने लगी थी।

एक दिन
वह खुद नेहा के पास आकर बोली,
“शायद मेरी भूख
पेट की नहीं थी,
मन की थी —
जो अब समझ में आ गई है।”

नेहा ने कुछ नहीं कहा,
बस हल्की-सी मुस्कान के साथ
उसकी बात सुन ली।

और इसी समझ के साथ
घर में फिर से
संतुलन लौट आया।




सीख:

भूख अगर समझ से बाहर हो जाए
तो रिश्ते बिगड़ने लगते हैं।
और
अगर समझ आ जाए
तो वही भूख
संस्कार बन जाती है।





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