बहू के अहंकार ने तोड़ दिया पूरा परिवार, फिर कैमरे में कैद हुआ सच
ड्रॉइंग रूम में बैठी सविता देवी अपने पुराने चश्मे से बिजली का बिल देख रही थीं। तभी उनकी बहू निशा तेज़ कदमों से वहाँ आई और ऊँची आवाज़ में बोली—
“मम्मी जी, ये क्या तरीका है घर चलाने का? हर महीने खर्च बढ़ता जा रहा है। आपको पैसों की कोई समझ ही नहीं है। अगर मैंने समय रहते हिसाब अपने हाथ में नहीं लिया होता तो अब तक घर कर्ज़ में डूब गया होता।”
सविता देवी ने धीरे से कहा— “बहू, मैंने तो हमेशा घर बचाकर ही चलाया है। अपने पति की कमाई से दोनों बच्चों को पढ़ाया, घर बनाया, शादी-ब्याह किए। कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।”
निशा व्यंग्य से हँस पड़ी— “बस बस मम्मी जी… पुराने जमाने की बातें मत सुनाइए। अब ये घर मैं संभालूँगी। आपको बस पूजा-पाठ करना आता है, वही कीजिए।”
इतना कहकर निशा वहाँ से चली गई।
सविता देवी की आँखें भर आईं। वे चुपचाप अपने कमरे में जाकर बैठ गईं। तभी उन्हें वो दिन याद आने लगा जब उन्होंने बड़े बेटे अमन की शादी निशा से करवाई थी।
शुरू-शुरू में निशा इतनी मीठी बातें करती कि पूरा परिवार उसकी तारीफ करता था। रिश्तेदार कहते— “वाह! अमन की किस्मत खुल गई। इतनी संस्कारी बहू मिली है।”
मगर शादी के कुछ महीनों बाद ही निशा का असली स्वभाव सामने आने लगा।
वो घर के हर खर्च का हिसाब मांगती। सास-ससुर को छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी ताने देती। कभी दूध ज्यादा इस्तेमाल होने पर झगड़ा करती तो कभी बिजली का पंखा चलने पर।
सविता देवी के पति हरिराम जी रिटायर हो चुके थे। अब घर और दुकान की जिम्मेदारी अमन संभालता था। इसलिए वे ज्यादा कुछ बोलते नहीं थे।
अमन अपनी पत्नी पर आँख मूँदकर भरोसा करता था। निशा हर रात उसके कान भरती—
“तुम्हारी माँ मुझे पसंद नहीं करतीं। पूरे दिन काम करवाती हैं और ऊपर से ताने देती हैं। मैं इस घर के लिए कितना करती हूँ मगर किसी को मेरी कदर नहीं।”
धीरे-धीरे अमन भी बदलने लगा।
एक दिन उसने माँ से कहा— “माँ, अगर निशा खर्च संभालना चाहती है तो आपको दिक्कत क्यों है? आखिर वो भी तो इस घर की बहू है।”
सविता देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्हें डर था कि कहीं बेटा बहू के कहने में आकर अलग न हो जाए।
घर का छोटा बेटा रोहित शहर में नौकरी करता था। जब भी घर आता, भाभी का व्यवहार देखकर परेशान हो जाता।
वो माँ से कहता— “माँ, कब तक चुप रहोगी? गलत सहना भी गलत होता है।”
मगर सविता देवी हमेशा यही कहतीं— “बेटा, घर टूटना नहीं चाहिए।”
निशा बाहर के लोगों के सामने बहुत अच्छी बनने का नाटक करती। मंदिर जाती, पड़ोसियों से मीठा बोलती, गरीबों को खाना बाँटती। पूरे मोहल्ले में उसकी छवि एक आदर्श बहू जैसी थी।
लेकिन घर के अंदर उसका रूप बिल्कुल अलग था।
एक सुबह सविता देवी से गलती से चाय का कप टूट गया। बस फिर क्या था…
निशा गुस्से से चीख पड़ी— “आपसे कोई काम ढंग से नहीं होता। पता है ये कप कितने महंगे थे?”
सविता देवी डर गईं— “गलती हो गई बहू…”
निशा ने उनका हाथ झटकते हुए कहा— “अब ये मत कहना कि गलती से हुआ।”
इतने में पड़ोस की शांता काकी वहाँ आ गईं। उन्होंने सब अपनी आँखों से देख लिया, मगर उस समय चुप रहीं।
कुछ दिनों बाद रोहित अचानक बिना बताए घर आया। उसने देखा कि निशा गुस्से में अपनी सास पर चिल्ला रही थी।
“आपको कितनी बार कहा है कि मेरी अलमारी को हाथ मत लगाया करो!”
इतना कहकर उसने सविता देवी को धक्का दे दिया। सविता देवी पीछे रखी मेज़ से टकरा गईं और उनके हाथ में चोट लग गई।
रोहित दौड़कर आया— “भाभी! ये क्या कर रही हैं आप?”
निशा आँखें तरेरते हुए बोली— “तुम बीच में मत पड़ो। वरना तुम्हारे ऊपर दहेज प्रताड़ना का केस कर दूँगी। सारी जिंदगी कोर्ट के चक्कर लगाते रहोगे।”
रोहित हैरान रह गया।
शाम को अमन घर लौटा तो निशा पहले से रोने का नाटक करने लगी। उसने अपने हाथ पर खुद ही खरोंच के निशान बना लिए थे।
रोते हुए बोली— “आपके भाई ने आज मुझ पर हाथ उठाया। मैं इस घर में सुरक्षित नहीं हूँ।”
अमन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने आते ही रोहित को थप्पड़ मार दिया।
“मेरी पत्नी पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?”
रोहित कुछ बोलता उससे पहले सविता देवी रोते हुए बोलीं— “नहीं बेटा, सच ऐसा नहीं है…”
मगर अमन ने किसी की बात नहीं सुनी।
हरिराम जी गुस्से में बोले— “अमन! तू अपनी पत्नी के प्यार में अंधा हो चुका है। सच देखने की कोशिश कर।”
अमन चिल्लाया— “बस! अब मुझे किसी की बातें नहीं सुननी।”
उस रात पूरा घर रोया, मगर निशा अपने कमरे में मुस्कुरा रही थी।
धीरे-धीरे मोहल्ले में बातें फैलने लगीं। शांता काकी ने कई बार निशा का व्यवहार देखा था। एक दिन उन्होंने अमन को रास्ते में रोक लिया।
“बेटा, बुरा मत मानना… मगर तुम्हारी माँ बहुत सीधी हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि तुम्हारी पत्नी उनके साथ कैसा व्यवहार करती है।”
अमन पहले तो चौंका, मगर फिर सोच में पड़ गया।
उसे याद आने लगा कि हर बार झगड़े के समय निशा ही पहले कहानी बनाकर सुनाती थी। उसे पहली बार शक हुआ।
उसने किसी को बताए बिना घर में छोटे-छोटे कैमरे लगवा दिए।
करीब एक हफ्ते बाद फिर घर में झगड़ा हुआ।
निशा जोर-जोर से चिल्ला रही थी— “ये घर मेरा है। यहाँ वही होगा जो मैं चाहूँगी।”
सविता देवी चुपचाप रो रही थीं।
शाम को निशा फिर अमन के पास पहुँची— “आज आपकी माँ ने मुझे धक्का दिया।”
अमन शांत स्वर में बोला— “अच्छा… सच?”
निशा बोली— “हाँ, और रोहित ने भी मुझे धमकाया।”
तभी अमन ने टीवी ऑन किया।
कैमरे की रिकॉर्डिंग चलने लगी।
वीडियो में साफ दिख रहा था कि निशा ही सविता देवी को धक्का दे रही थी। दूसरी रिकॉर्डिंग में वो रोहित को झूठे केस में फँसाने की धमकी दे रही थी।
पूरा कमरा शांत हो गया।
निशा के चेहरे का रंग उड़ चुका था।
अमन की आँखों में आँसू थे।
वो अपनी माँ के पास जाकर घुटनों पर बैठ गया— “माँ… मुझे माफ कर दो। मैंने आपकी जगह एक झूठी इंसान की बातों पर भरोसा किया।”
सविता देवी बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए रो पड़ीं।
हरिराम जी की आँखें भी भर आईं।
अमन फिर निशा की तरफ मुड़ा— “मैंने तुम्हें इस घर की बहू बनाकर सम्मान दिया था। मगर तुमने इस परिवार को तोड़ने की कोशिश की। अगर तुम्हें अपनी गलती का एहसास है तो सबसे माफी माँगो।”
लेकिन निशा का अहंकार अभी भी कम नहीं हुआ था।
वो बोली— “मैंने कुछ गलत नहीं किया।”
अमन ने गहरी साँस ली— “फिर शायद इस घर में तुम्हारे लिए जगह नहीं बची।”
निशा अपना सामान लेकर घर छोड़कर चली गई।
उसके जाने के बाद घर में फिर शांति लौट आई। सविता देवी अब खुलकर मुस्कुराने लगीं। रोहित भी अक्सर घर आने लगा। और अमन ने भी समझ लिया कि रिश्ते भरोसे से चलते हैं, मगर अंधा भरोसा रिश्तों को बर्बाद कर देता है।
दोस्तों, कई बार इंसान प्यार में इतना अंधा हो जाता है कि सही और गलत की पहचान खो देता है। मगर सच ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता।
अब आप बताइए… क्या निशा को अपनी गलती मानकर माफी माँग लेनी चाहिए थी, या उसका घर छोड़कर जाना सही था?

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