जब बहू को सास का प्यार समझ आया
रसोई में खड़ी प्रिया तेजी से काम कर रही थी। गैस पर तीन-तीन बर्तन चढ़े हुए थे। एक तरफ ससुर जी के लिए दलिया बन रहा था, दूसरी तरफ बच्चों के लिए नाश्ता और तीसरी तरफ दोपहर के खाने की तैयारी।
सुबह के आठ बज चुके थे, लेकिन प्रिया ने अभी तक चाय भी ठीक से नहीं पी थी।
तभी ड्रॉइंग रूम से उसकी ननद कविता की हँसने की आवाज आई। वह अपनी माँ शारदा जी के पास बैठी बातें कर रही थी।
“माँ, आपने फिर इतना महंगा सूट क्यों भेज दिया? अभी पिछले महीने ही तो साड़ी भेजी थी।”
शारदा जी मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे बेटी, तू पहनती है तो मेरा मन खुश हो जाता है। और फिर तेरे ससुराल में भी तो अच्छा लगना चाहिए ना मेरी बेटी को।”
प्रिया रसोई से सब सुन रही थी। उसके हाथ चलते रहे, लेकिन चेहरे पर हल्की उदासी उतर आई।
थोड़ी देर बाद उसका पति अमित ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर आया और बोला, “प्रिया, मेरा टिफिन तैयार है क्या?”
प्रिया बिना उसकी तरफ देखे बोली, “हाँ, डाइनिंग टेबल पर रखा है।”
अमित ने तुरंत समझ लिया कि कुछ बात जरूर है।
वो धीरे से बोला, “क्या हुआ?”
प्रिया हल्के ताने में बोली, “कुछ नहीं। बस सोच रही हूँ कि कुछ लोग शादी के बाद भी बेटी बने रहते हैं… और कुछ लोग सिर्फ बहू बनकर रह जाते हैं।”
अमित समझ गया कि बात फिर मायके और ससुराल की तुलना तक पहुँच गई है।
वो शांत स्वर में बोला, “तुम फिर वही बातें सोच रही हो?”
प्रिया इस बार रुक नहीं पाई।
“हाँ सोच रही हूँ। क्योंकि मैं भी किसी की बेटी हूँ। लेकिन यहाँ कभी किसी ने ये नहीं पूछा कि मुझे क्या पसंद है, मुझे क्या चाहिए। बस जिम्मेदारियाँ दे दीं।”
इतने में शारदा जी पानी लेने रसोई की तरफ आईं। उन्होंने प्रिया की बातें सुन लीं, लेकिन कुछ नहीं बोलीं। बस चुपचाप पानी लेकर वापस चली गईं।
उनकी खामोशी देखकर अमित भी चुप हो गया और ऑफिस चला गया।
दोपहर को शारदा जी अकेले अपने कमरे में बैठी थीं। उनके हाथ में पुराना एल्बम था। उसमें अमित और कविता की बचपन की तस्वीरें लगी थीं।
तभी उनके पति हरिशंकर जी कमरे में आए और बोले, “क्या सोच रही हो?”
शारदा जी धीमे स्वर में बोलीं, “लगता है बहू के मन में हमारे लिए अपनापन अभी तक नहीं आया।”
हरिशंकर जी बोले, “अपनापन समय से आता है। कभी-कभी इंसान तुलना करते-करते रिश्तों की अच्छाई देख ही नहीं पाता।”
शाम को प्रिया की माँ का फोन आया।
“बेटा, अगले हफ्ते तीज है ना… इसलिए तेरे लिए सोने की पायल बनवाई है।”
प्रिया खुशी से खिल उठी।
वो तुरंत बोली, “सच माँ?”
“हाँ, और तेरे भाई के हाथ भेज दूँगी।”
फोन रखते ही प्रिया खुशी-खुशी पड़ोसन सीमा के घर चली गई और बोली, “देखना भाभी, मेरी माँ आज भी मुझे कितना मान देती हैं।”
सीमा मुस्कुराई, लेकिन बोली कुछ नहीं।
उधर शारदा जी बालकनी में खड़ी सब सुन रही थीं।
रात को खाने की टेबल पर प्रिया बार-बार अपनी पायल की बात कर रही थी।
“आजकल कौन देता है बहू को इतना सब? मायके वाले ही असली अपने होते हैं।”
उसकी ये बात सुनकर कविता थोड़ा असहज हो गई। उसने माहौल बदलने के लिए कहा, “भाभी, आपकी मम्मी सच में बहुत प्यार करती हैं आपको।”
प्रिया गर्व से बोली, “हाँ, मेरी माँ कभी फर्क नहीं करती।”
शारदा जी ने चुपचाप खाना खत्म किया और उठ गईं।
कुछ दिनों बाद हरिशंकर जी की पुरानी दोस्ती वाले परिवार में शादी थी। पूरे घर को वहाँ जाना था।
शारदा जी ने अलमारी से एक सुंदर बनारसी साड़ी निकाली और प्रिया को देते हुए बोलीं, “बहू, ये पहन लेना शादी में।”
प्रिया ने साड़ी देखते ही कहा, “ये तो पुरानी लग रही है माजी।”
शारदा जी हल्का मुस्कुराईं, “हाँ, पुरानी है। लेकिन मैंने अपनी शादी में पहनी थी।”
प्रिया तुरंत बोली, “तो फिर आप अपनी बेटी को दे दीजिए ना। आखिर आपकी चीजों पर पहला हक उन्हीं का है।”
ये सुनकर शारदा जी का दिल दुख गया।
लेकिन उन्होंने फिर भी शांत रहकर कहा, “ठीक है बहू, जैसा तुम्हें ठीक लगे।”
अगले दिन कविता चुपचाप माँ के पास आई और बोली, “माँ, भाभी को आपकी भावना समझ नहीं आई।”
शारदा जी बोलीं, “कोई बात नहीं बेटी। कभी-कभी इंसान चीजों की कीमत देखता है, भावनाओं की नहीं।”
समय धीरे-धीरे बीतता गया।
एक दिन अचानक प्रिया के पिता को हार्ट अटैक आ गया।
खबर सुनते ही प्रिया के हाथ-पाँव फूल गए। उसका भाई शहर से बाहर था। माँ अकेली अस्पताल में थीं।
प्रिया घबराकर रोने लगी।
तभी अमित बोला, “चलो, अभी चलते हैं।”
प्रिया बोली, “लेकिन बच्चों का क्या होगा? घर का क्या होगा?”
इतने में शारदा जी आगे आईं और बोलीं, “तुम चिंता मत करो। बच्चे और घर मैं संभाल लूँगी। तुम बस अपने पापा के पास जाओ।”
हरिशंकर जी ने भी अमित को पैसे देते हुए कहा, “अस्पताल में जरूरत पड़े तो काम आएंगे।”
प्रिया की आँखें भर आईं।
अस्पताल में पूरे पाँच दिन लगे।
इन पाँच दिनों में शारदा जी रोज फोन करके पूछतीं, “बेटा खाना खाया? हिम्मत मत हारना।”
प्रिया पहली बार महसूस कर रही थी कि ये चिंता सिर्फ दिखावे की नहीं थी।
पाँचवें दिन उसके पिता की हालत सुधर गई।
घर लौटते समय रास्ते भर प्रिया खामोश रही।
घर पहुँचते ही उसने देखा कि बच्चे साफ-सुथरे कपड़ों में खुश खेल रहे थे। घर भी पूरी तरह व्यवस्थित था।
रसोई में उसके पसंद की खिचड़ी बनी हुई थी।
प्रिया की आँखें भर आईं।
वो सीधे शारदा जी के पास गई और उनके पैर पकड़ लिए।
शारदा जी घबरा गईं।
“अरे बहू, क्या हुआ?”
प्रिया रोते हुए बोली, “माजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं हमेशा चीजों में प्यार ढूँढती रही। मुझे लगता था मायके वाले ही अपने होते हैं। लेकिन अब समझ आया… अपना वो होता है जो मुश्किल समय में साथ खड़ा रहे।”
शारदा जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
तभी हरिशंकर जी मुस्कुराकर बोले, “बेटी, रिश्ते जेवरों से नहीं चलते। अगर ऐसा होता तो अमीर लोग कभी दुखी नहीं होते।”
प्रिया चुपचाप सुनती रही।
हरिशंकर जी आगे बोले, “घर तब अपना बनता है जब इंसान हिसाब रखना छोड़ देता है। जहाँ हर बात में तुलना हो, वहाँ अपनापन धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।”
उस दिन पहली बार प्रिया ने पूरे मन से उस घर को अपना घर माना।
अब ना उसे मायके के उपहारों का घमंड था और ना ही ससुराल से शिकायत।
क्योंकि उसे समझ आ चुका था कि रिश्तों की असली कीमत सोने-चाँदी से नहीं… बल्कि साथ, सम्मान और अपनापन से होती है।

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