बेटी का साया
सुबह का समय था।
घर के आँगन में धूप उतर रही थी और तुलसी के पास रखे मटके में चिड़ियाँ पानी पी रही थीं।
रमेश बाबू आज कुछ ज़्यादा ही खामोश थे।
उनकी बेटी निशा की शादी तय हो चुकी थी।
लड़का पढ़ा-लिखा, सुलझा हुआ और परिवार भी सभ्य।
लोग बधाइयाँ दे रहे थे—
“अब तो आपकी ज़िम्मेदारी पूरी हो गई रमेश जी!”
रमेश बाबू मुस्कुरा तो देते,
लेकिन दिल के किसी कोने में एक अनजाना डर भी था—
मेरी बच्ची वहाँ खुश रहेगी ना?
शादी से कुछ दिन पहले
लड़के के घर से फ़ोन आया—
“रविवार को आप सबको खाने पर आना है।”
रमेश बाबू उस समय ठीक महसूस नहीं कर रहे थे।
डॉक्टर ने उन्हें तेल-मसाले वाला खाना खाने से मना किया था।
ब्लड प्रेशर भी अक्सर ऊपर-नीचे रहता था।
मन तो उनका मना करने का था,
लेकिन होंठों से “ना” निकल ही नहीं पाया।
आख़िर बेटी की ससुराल का बुलावा था…
ऐसे मौक़े पर मना करने की
हिम्मत भी कहाँ होती है।
जब वे वहाँ पहुँचे,
तो दरवाज़े पर ही उनका बड़े अपनापन से स्वागत किया गया।
घर में कदम रखते ही
लड़के की माँ ने आगे बढ़कर कहा—
“आइए, अंदर आइए… सफ़र थका देने वाला रहा होगा।”
निशा थोड़ी पीछे खड़ी थी।
उसने बस हल्की-सी मुस्कान के साथ
झुककर उनके पैर छुए।
थोड़ी देर बाद चाय आ गई।
रमेश बाबू ने कप हाथ में लिया
और मन ही मन सोचने लगे—
अब क्या करूँ… मना भी तो नहीं कर सकता।
उन्होंने चाय की पहली घूँट ली
और अचानक रुक गए।
चाय में ज़रा भी चीनी नहीं थी।
ऊपर से तुलसी और अदरक की हल्की-सी खुशबू घुली हुई थी।
रमेश बाबू ने बिना कुछ कहे
धीरे से नज़र उठाई
और सामने बैठी
लड़के की माँ की ओर देखा…
उनकी आँखों में सवाल भी था
और एक गहरा सुकून भी।
दोपहर के खाने में भी
सब कुछ बिल्कुल उनकी सेहत के मुताबिक था—
कम नमक, हल्का मसाला,
उबली हुई सब्ज़ियाँ और सादी दाल।
खाना खाने के बाद
उन्हें आराम के लिए एक सादा-सा कमरा दिया गया।
न कोई दिखावा,
न कोई बनावट—
बस सुकून और अपनापन।
शाम ढलते ही
उनके लिए गुनगुना पानी लाया गया,
और दवा भी समय पर दे दी गई।
इतनी सावधानी,
इतना ध्यान देखकर
रमेश बाबू का मन अनायास ही बेचैन हो उठा।
विदा लेते समय
वह खुद को रोक नहीं पाए।
हल्की-सी झिझक के साथ उन्होंने पूछा—
“आप लोगों को कैसे पता था
कि मुझे क्या खाना चाहिए
और क्या नहीं?
मेरी सेहत का इतना ध्यान…?”
निशा की सास के चेहरे पर
एक स्नेहभरी मुस्कान फैल गई।
उन्होंने धीरे से कहा—
“कल रात आपकी बेटी का फ़ोन आया था।
उसने कहा था—
‘मेरे पापा स्वभाव से बहुत सीधे हैं,
कभी अपनी तकलीफ़ नहीं बताते।
बाहर से मज़बूत दिखते हैं,
लेकिन अंदर से बहुत कोमल हैं।
अगर हो सके तो
कृपया उनका ध्यान रखिएगा।’”
> रमेश बाबू की आँखें भर आईं।
निशा चुपचाप सिर झुकाए खड़ी थी,
जैसे शब्दों से ज़्यादा उसकी ख़ामोशी बोल रही हो।
वही बेटी,
जो कभी उनकी उँगली पकड़कर
लड़खड़ाते क़दमों से स्कूल जाया करती थी,
आज भी उनका हाथ थामे खड़ी थी—
फर्क बस इतना था,
अब उसकी उँगलियों में बचपन नहीं,
बल्कि समझदारी और फ़िक्र बसी हुई थी।
घर लौटकर
रमेश बाबू कुछ देर तक चुपचाप बैठक में खड़े रहे।
दीवार पर टंगी
अपनी स्वर्गवासी माँ की पुरानी तस्वीर को
वे देर तक देखते रहे।
फिर धीरे से आगे बढ़े
और तस्वीर से फूलों की माला उतार ली।
पत्नी यह देखकर घबरा गई।
वह पास आई और बोली—
“ये आप क्या कर रहे हो?”
रमेश बाबू की आँखें भर आईं।
गला रुंध गया।
कुछ पल चुप रहने के बाद
भरी हुई आवाज़ में बोले—
“जिस माँ ने सारी ज़िंदगी
मेरा ध्यान रखा…
वो माँ कहीं गई नहीं है।
वो तो आज भी
मेरे साथ ही रहती है—
बस अब वो
मेरी बेटी के रूप में
इस घर में मौजूद है।”
इतना कहते ही
उनका संयम टूट गया।
ज़िंदगी में पहली बार
वो सबके सामने
बच्चों की तरह
फूट-फूटकर रो पड़े।
लोग कहते हैं—
बेटी पराया धन होती है।
लेकिन सच तो यह है—
बेटी घर छोड़ सकती है,
माँ-बाप का दिल नहीं।
वह जहाँ भी जाती है,
अपने माँ-बाप की परछाईं बनकर जाती है।
और माँ-बाप…
उम्र भर उसी परछाईं में
खुद को सुरक्षित, संपूर्ण और कभी अकेला नहीं महसूस करते।

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