सौ रुपये की कीमत

A thoughtful Indian man showing kindness to a poor street cobbler in a residential colony, highlighting humanity and social responsibility.



अमन को इस कॉलोनी में आए अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए थे।

सरकारी नौकरी लगी थी, इसलिए शहर बदलना पड़ा।

कॉलोनी साफ़-सुथरी थी, लोग अपने-अपने काम में डूबे हुए,

और अमन—सबसे थोड़ा अलग—चुपचाप सब कुछ देखता रहता था।


उसके घर के बगल में रहते थे शर्मा जी।

पचपन-साठ की उम्र, मोटी तोंद, गले में सोने की चेन,

और आवाज़ में हमेशा हुक्म झलकता था।

पहले-पहले तो अमन को लगा—सामान्य से आदमी हैं।

पर कुछ दिनों में तस्वीर साफ़ होने लगी।


एक सुबह अमन बालकनी में चाय पी रहा था।

नीचे सड़क पर सब्ज़ीवाला खड़ा था।


“साहब, सौ रुपये किलो है टमाटर,”

सब्ज़ीवाला बोला।


“क्या?”

शर्मा जी भड़क गए।

“पचास से एक रुपया ज़्यादा नहीं दूँगा। लेना है तो दे,

वरना निकल यहाँ से!”


सब्ज़ीवाले ने कहा,

“साहब, महँगाई बहुत है… मंडी में—”


“अरे तू मुझे सिखाएगा?”

शर्मा जी चिल्लाए।

“पचास में दे या उठा ठेला!”


थोड़ी देर बहस के बाद

सब्ज़ीवाला चुपचाप पचास में सब्ज़ी दे गया।

उसकी आँखों में गुस्सा नहीं,

थकान थी।


अमन ने यह सब देखा,

पर कुछ कहा नहीं।



अगले हफ्ते की बात थी।

शाम का समय था।


दूधवाला रोज़ की तरह दूध देकर पैसे लेने आया।

वह कुछ कहना ही चाहता था कि—


“भैया, पिछले महीने के पैसे…”


उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई।


“अरे, कितनी बार बोलूँ?”

शर्मा जी झल्लाकर बोले।

“दो दिन बाद आना। रोज़-रोज़ आकर दिमाग मत खाया करो!”


दूधवाला कुछ पल चुप खड़ा रहा।

फिर बिना कुछ कहे सिर झुका लिया

और धीरे-धीरे वहाँ से चला गया।


अमन उसे जाते हुए देखता रहा।

उसे लगा जैसे दूध की बोतलों से ज़्यादा

उस आदमी के कंधों पर

उधार और मजबूरी का बोझ लटका हुआ है।



एक दिन रविवार था।

अमन घर पर ही था।


अचानक नीचे से आवाज़ आई—


“साहब, साठ रुपये हुए।”


यह आवाज़ एक मोची की थी,

जो सड़क किनारे बैठकर

एक टूटी हुई चप्पल सिल रहा था।


“साठ?”

शर्मा जी हँस पड़े।

“बीस ले और निकल।

इतने से काम के साठ रुपये?”


मोची ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

“साहब, धागा लगा है, गोंद भी…”


“अरे, भाग यहाँ से!”

शर्मा जी झल्लाकर बोले।


मोची ने अब कुछ नहीं कहा।

उसने चुपचाप बीस रुपये लिए,

अपनी पुरानी पेटी समेटी

और जाने लगा।


उसी पल अमन सीढ़ियाँ उतरता हुआ आया।


उसने मोची से कहा,

“ज़रा चप्पल दीजिए।”


मोची घबरा गया।

“नहीं साहब… मैंने तो पैसे ले लिए…”


अमन ने उसकी हथेली में

दो सौ रुपये का नोट रख दिया।


फिर शांत स्वर में बोला,

“आपका काम साठ रुपये का नहीं है,

आपकी मेहनत उससे कहीं ज़्यादा कीमती है।”


मोची की आँखें भर आईं।

वह कुछ कह नहीं पाया—

बस सिर झुकाकर

धन्यवाद कहने की कोशिश करता रहा।



शर्मा जी गुस्से में बोले,

“तुम्हें क्या ज़रूरत थी बीच में पड़ने की?”


अमन ने बिना आवाज़ ऊँची किए कहा,

“ज़रूरत इसलिए थी क्योंकि

जिस बीस रुपये को बचाकर

आप खुद को बहुत समझदार समझते हैं,

वही किसी के घर का चूल्हा जलाता है।”


शर्मा जी कुछ पल के लिए चुप हो गए।

इसलिए नहीं कि बात गलत थी,

बल्कि इसलिए कि

सच हमेशा सुनने वाले से

ज़्यादा महँगा होता है।



उस शाम अमन ने देखा—


शर्मा जी मोबाइल पर

ऑनलाइन खाना मंगवा रहे थे।


पाँच सौ का बर्गर,

तीन सौ की ठंडी ड्रिंक,

ऊपर से डिलीवरी का अलग चार्ज।


मोबाइल रखते हुए

वे संतोष से बोले,

“आज मन है कुछ अच्छा खाने का।”


अमन ने उनकी ओर देखा

और हल्की-सी मुस्कान उसके होंठों पर आ गई—

ऐसी मुस्कान

जिसमें हँसी कम

और सच्चाई की चुभन ज़्यादा थी।



उस रात

उसे एक सच्चाई पूरी तरह समझ आ गई—


इस देश में

गरीब की मेहनत

सबसे सस्ती समझी जाती है,


और अमीर की भूख

सबसे महँगी।


यहाँ

रिक्शेवाले के बीस रुपये

बहुत भारी लगते हैं,


लेकिन

जीभ के थोड़े से स्वाद के लिए

पाँच सौ रुपये

हल्के पड़ जाते हैं।


और सबसे दुखद सच यह है कि

इन सौदों के बीच कहीं

इंसानियत

चुपचाप खो जाती है।





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