एक बोझ… जो दिखता नहीं

Emotional Indian family scene showing a mother and her sons during a tense household discussion


उस दिन घर में शोर नहीं था,

लेकिन हर दीवार के भीतर कुछ टूट रहा था।


घड़ी की टिक–टिक साफ़ सुनाई दे रही थी,

जैसे हर सेकंड किसी पुराने ज़ख़्म को कुरेद रही हो।


ड्राइंग रूम में सास कुर्सी पर बैठी थीं।

आँखें सूजी हुई थीं,

पर उनमें पछतावे से ज़्यादा अधिकार था।


सामने खड़ी थीं दोनों बहुएँ—

बड़ी बहू सुमन,

और छोटी बहू काव्या।


सुमन की आवाज़ काँप रही थी,

लेकिन शब्द सधे हुए थे।


“मम्मी जी…

अगर देवरानी–जेठानी एक होकर रहना भी चाहें,

तो ससुराल वाले ही कभी न कभी

बीच में ज़हर घोल देते हैं।

कभी तानों से,

कभी तुलना से…

और कभी चुपचाप बाँटी गई ज़िम्मेदारियों से।”


काव्या ने सुमन की तरफ देखा,

फिर अपनी नज़रें ज़मीन पर टिकाकर बोली—


“और जब हममें फूट नहीं डलती,

तो बेटों के बीच खाई बना दी जाती है।

आज जो घर में हो रहा है,

वो बहुओं की वजह से नहीं है मम्मी जी…

वो उन बोझों की वजह से है

जो बराबर नहीं बाँटे गए।”


सास की आँखें भर आईं।

आवाज़ ऊँची हो गई।


“मेरे बेटे पहले ऐसे नहीं थे।

तुम दोनों के आने के बाद बदले हैं।

अब मुझ पर ही इल्ज़ाम?”


काव्या ने धीरे से कहा—


“माफ़ कीजिएगा…

लेकिन आपने कभी दोनों बेटों को

एक जैसा देखा ही नहीं।

एक को हमेशा उसकी कमाई से तौला,

और दूसरे को हमेशा बचाकर रखा।”


“एक पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ डाल दिया,

और दूसरे को हल्का रख दिया,”

सुमन की आँखों से आँसू गिर पड़े।


“हाय राम!”

सास ने माथा पकड़ लिया।

“मैं अपने ही घर को क्यों तोड़ूँगी?

मैंने जन्म दिया है दोनों को।”


तभी तेज़ आवाज़ आई—


“बस करो तुम दोनों!”


बड़े बेटे राहुल का गुस्सा फूट पड़ा।

“मम्मी पर इल्ज़ाम लगाना बंद करो।

जाओ, रसोई संभालो।”


दोनों बहुएँ कुछ नहीं बोलीं।

बस एक-दूसरे को देखा—

और बिना शब्दों के

अपनी बेबसी समेटकर

रसोई में चली गईं।


अब कमरे में

सिर्फ माँ और दो बेटे थे।


माँ ने तुरंत कहना शुरू किया—


“देखा?

कैसे मुझ पर आरोप लगा रही थीं।

इसीलिए कहते हैं—

दूसरे घर से आई लड़कियों के सामने

घर की बातें नहीं करनी चाहिए।”


राहुल की आँखें लाल थीं।

“मम्मी… आप भी बस कीजिए।”


“हाँ, मुझे ही चुप कराओ,”

माँ तमतमाईं।


राहुल ने सिर झुका लिया।

आवाज़ भर्रा गई।


“मम्मी…

गलती आपकी भी है।”


माँ सन्न रह गईं।


“जिस तरह आपने बहुओं में काम बाँटा,

अगर उसी तरह बेटों में खर्च बाँटा होता,

तो आज ये नौबत नहीं आती।”


राहुल कुछ पल चुप रहा।

फिर अचानक बोल पड़ा—


“पापा के जाने के बाद

मैं सिर्फ उन्नीस साल का था।

पढ़ाई अधूरी,

कंधों पर पूरा घर।”


“कहा गया—

पापा की जगह नौकरी मिली है,

तो अब सब कुछ तुझे ही करना होगा।”


“अंकित की पढ़ाई,

घर का खर्च,

बहन की शादी,

कर्ज़…

सब मैंने उठाया।”


उसकी आवाज़ टूटने लगी।


“मैंने कभी मना नहीं किया मम्मी।

कभी नहीं।

लेकिन उम्मीद थी कि

जब मेरा छोटा भाई कमाएगा,

तो मेरा बोझ थोड़ा हल्का होगा।”


उसने अंकित की तरफ देखा।


“पर आपने उसे कभी ज़िम्मेदार बनाया ही नहीं।

आज उसकी नौकरी अच्छी है,

उसके पास ज़मीन है,

और मैं अब भी कर्ज़ चुका रहा हूँ।”


राहुल की आँखों से आँसू बह निकले।


“तेरह साल की नौकरी में

मैंने सिर्फ ज़िम्मेदारियाँ कमाईं।

और वो…

आठ साल में सब कुछ।”


राहुल अचानक माँ के सामने

हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।


“मम्मी…

हाथ जोड़कर कहता हूँ—

मुझे आज़ाद कर दीजिए।

या तो खर्च बाँट दीजिए,

या मुझे अलग कर दीजिए।”


माँ ने पहली बार

कुछ नहीं कहा।


उस कमरे में

आँसू भी चुप थे।


कुछ दिनों बाद

घर दो हिस्सों में बँट गया।


अलग रसोई,

अलग खर्च,

अलग ज़िंदगियाँ।


क्योंकि छोटा बेटा

ज़िम्मेदारी बाँटने को तैयार नहीं था।


और माँ…

अब देर से समझ रही थीं—


कि कभी-कभी

घर बहुओं से नहीं टूटते,

घर टूटते हैं

बराबरी न करने से।


और सबसे भारी बोझ

वो होता है

जिसे सालों तक

“फ़र्ज़” कहकर

एक कंधे पर रख दिया जाता है।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.