ताजे स्वाद की खुशबू
शाम का समय था।
घर के आँगन में तुलसी के पास बैठी शीतल सब्ज़ियाँ साफ कर रही थी।
रसोई से हल्की-हल्की जीरे की खुशबू फैल रही थी।
शीतल इस घर की बड़ी बहू थी।
शांत, समझदार और काम में निपुण।
छत पर लगे उसके गमले सिर्फ़ मिट्टी नहीं थे,
वो उसकी मेहनत, धैर्य और प्रेम की पहचान थे।
धनिया, टमाटर, मिर्च, लौकी, बैंगन—
हर पौधा जैसे उसका अपना बच्चा हो।
छोटी बहू की एंट्री...
कुछ महीनों पहले रवी की शादी हुई थी।
छोटी बहू पूनम —
शहर में पली-बढ़ी,
कॉलेज लाइफ, दोस्त, इंस्टेंट फूड उसकी दुनिया थी।
पहले दिन सबने सोचा—
“नई बहू है, समय लगेगा।”
लेकिन समय बीतता गया।
सुबह नाश्ते में—
पैकेट वाले नूडल्स
शाम को—
इंस्टेंट सूप
कभी पिज़्ज़ा, कभी फ्रेंच फ्राइज
घर में एक अजीब सी बदबू फैलने लगी।
सास इंदुमती परेशान रहने लगीं।
“नाश्ते से पेट नहीं भरता, उल्टा मन खराब हो जाता है।”
तुलना शुरू हो गई...
उधर शीतल के हाथों से—
गरमा-गरम उपमा
गोभी के पकौड़े
दही से बने कबाब
खुशबू ऐसी कि
पड़ोसी भी खिंचे चले आते।
ललित जी अक्सर हँसते हुए कहते—
“भाभी के हाथों में कोई जादू है।”
यहीं से पूनम के मन में
एक काँटा चुभने लगा।
“सबको यही क्यों पसंद आती है?”
“मेरे खाने में क्या कमी है?”
जलन का बीज...
एक रात
सब सो चुके थे।
तभी…
छत की ओर से
हल्की-सी खड़खड़ाहट सुनाई दी।
शीतल की नींद
जैसे अचानक टूट गई।
दिल ने अनजानी आशंका में
एक ज़ोर की धड़कन ली।
वह बिना किसी आहट के
चुपचाप बाहर निकली—
और जो उसने देखा…
उस पल
उसका दिल
मानो वहीं ठहर गया।
पूनम
गमलों की मिट्टी को बेरहमी से उखाड़ रही थी।
उसके हाथों में कोई हड़बड़ी नहीं थी,
बल्कि भीतर दबी जलन की सख़्ती थी।
धनिया की नाज़ुक जड़ें
मिट्टी से अलग होकर
छत पर बिखर चुकी थीं।
टमाटर के हरे-भरे पौधे,
जो कल तक हवा में झूमते थे,
अब टूटकर एक कोने में पड़े थे।
मिट्टी, पत्ते और सपने—
सब अस्त-व्यस्त हो चुके थे।
सीढ़ियों पर खड़ी शीतल
सब कुछ देख रही थी।
उसने न टोका,
न आवाज़ दी,
न कोई सवाल किया।
बस एक गहरी साँस ली,
मन के भीतर दर्द समेटा
और चुपचाप वापस लौट आई।
अगली सुबह...
उसी समय पूनम के दोस्त बिना बताए घर आ पहुँचे।
“सरप्राइज़!”
सब एक साथ हँस पड़े।
पूनम उन्हें देखकर खुशी से खिल उठी।
उसे लगा आज का दिन खास बनाना चाहिए।
वह जल्दी से किचन में गई
और आदत के मुताबिक
फिर वही पैकेट वाले स्नैक्स तैयार करने लगी।
कुछ ही देर में
वह ट्रे लेकर दोस्तों के पास पहुँची।
लेकिन पहला निवाला लेते ही
एक दोस्त ने नाक सिकोड़ते हुए कहा—
“यार… कुछ अजीब-सी बदबू आ रही है।”
दूसरा बोला—
“लगता है पैकेट वाला ही है…”
उनकी बातें सुनते ही
पूनम के चेहरे की मुस्कान
धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
आँखों में उतर आई
एक ऐसी चुप्पी
जो शब्दों से ज़्यादा कह रही थी।
उसी पल
शीतल चुपचाप रसोई से बाहर आई।
उसके हाथों में थे—
गरमा-गरम पनीर के पकौड़े,
ताज़ा बना क्रीमी पास्ता,
और घर का बना नरम रसगुल्ला।
जैसे ही वह हॉल में पहुँची,
खुशबू हवा में फैल गई—
ऐसी खुशबू
जो भूख ही नहीं,
मन तक को छू जाए।
पल भर में
पूरा हॉल उस सुगंध से भर गया।
दोस्त एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा उठे।
दोस्त तारीफ़ करने लगे।
“वाह…”
“ये खुशबू तो कमाल की है!”
“बिना खाए ही समझ आ रहा है—
स्नैक्स बहुत स्वादिष्ट होंगे।”
और शीतल
बस चुपचाप खड़ी
हल्की-सी मुस्कान के साथ
सब कुछ देखती रही।
टूटना और समझना...
पूनम की आँखें भर आईं।
होंठ काँपने लगे,
और नज़रें ज़मीन पर टिक गईं।
उस रात
शीतल की नींद खुली।
छत की तरफ़ से
हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी।
वह चुपचाप
छत पर पहुँची।
वहाँ पूनम थी।
लेकिन आज का दृश्य
कल से बिल्कुल अलग था।
आज उसके हाथ
पौधे उखाड़ नहीं रहे थे।
वह टूटे हुए गमलों में
फिर से मिट्टी भर रही थी।
नन्हे-नन्हे बीज
सावधानी से मिट्टी में दबा रही थी।
हर बीज के साथ
जैसे अपनी गलती भी
मिट्टी में दफना रही हो।
उसकी आँखों से
लगातार आँसू गिर रहे थे—
कभी मिट्टी पर,
तो कभी
उसके अपने हाथों पर।
पूनम कुछ नहीं बोल रही थी,
लेकिन उसकी खामोशी
सब कुछ कह रही थी।
शीतल दूर खड़ी
बस उसे देखती रही—
बिना कुछ कहे,
क्योंकि
कुछ पछतावे
शब्दों से नहीं,
खामोशी से सुधरते हैं।
सच का सामना...
“माफ कर दीजिए भाभी जी…”
पूनम की आवाज़ काँप रही थी।
“मैं जलन में अंधी हो गई थी।
मुझे लगा था कि आप जानबूझकर मुझसे बेहतर बनना चाहती हैं…
सबकी नज़रों में मुझसे आगे निकल जाना चाहती हैं।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
शीतल ने चुपचाप उसका हाथ थाम लिया।
न कोई शिकायत, न कोई ताना।
हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“पूनम, खाना भी रिश्तों की तरह ही होता है।
जब उसमें मेहनत, प्यार और सच्चाई होती है,
तो वो अपने आप खुशबू बनकर फैल जाता है।
और जब उसमें जलन, जल्दबाज़ी या बनावट आ जाए,
तो वो बासी हो जाता है…
फिर चाहे वो कितना भी सजाया गया क्यों न हो।”
पूनम ने सिर झुका लिया।
आज उसे पहली बार
खुशबू और बदबू का फर्क समझ में आ गया था।
कुछ हफ्तों बाद—
किचन से
आज पहली बार
धनिया और अदरक की
सोंधी–सी खुशबू आई।
सास के चेहरे पर
अनायास ही
एक सुकून भरी मुस्कान
खिल उठी।
पूनम—
आज उसने
अपने ही हाथों से
सब्ज़ियाँ काटी थीं।
छत के गमलों में
नए पौधे लहरा रहे थे।
कहानी का सार:
रिश्ते हों या भोजन—
पैकेट से नहीं,
धैर्य और मेहनत से बनते हैं।
और
ईर्ष्या से नहीं,
समझ और सीख से टिकते हैं।

Post a Comment