शब्दों से नहीं, साथ से
रिया आज सुबह से ही कुछ अलग थी।
बार-बार मोबाइल देखती, फिर खिड़की से बाहर झाँकती।
कभी माँ से पूछती—
“माँ, वो कब तक आएँगे?”
और कभी छोटी बहन से—
“देख तो सही, गली में कोई गाड़ी तो नहीं आई?”
कारण भी खास था।
शादी के दो साल बाद उसकी बड़ी बहन कविता पहली बार अपने पति अमित के साथ मायके आ रही थी।
माँ सुधा रसोई में सब्ज़ी काटते हुए मुस्कुरा दीं—
“अरे रिया, ऐसे पूछ रही है जैसे वो कोई मेहमान नहीं, परीक्षा का रिज़ल्ट हो।”
रिया हँस पड़ी—
“माँ, जीजू को देखने का मन है। दीदी तो बस इतना कहती है—
‘वो ज़्यादा बोलते नहीं।’
पर मुझे तो ज़्यादा बोलने वाले लोग पसंद हैं।”
माँ ने हल्की-सी चेतावनी दी—
“अमित शांत स्वभाव के हैं। ज़्यादा सवाल-जवाब मत करना। पहली बार आ रहे हैं।”
रिया ने मुँह बनाया—
“माँ, अगर बोलेंगे ही नहीं तो पता कैसे चलेगा कि अच्छे हैं?”
शाम को जब गाड़ी रुकी,
घर में जैसे रौनक भर गई।
कविता, अमित और उनके पापा-मम्मी अंदर आए।
सबका स्वागत हुआ, चाय आई, मिठाई आई।
रिया का ध्यान बस अमित पर था।
वो सोफ़े के एक कोने में बैठे थे—
सीधे, सधे हुए, हल्की-सी मुस्कान के साथ।
रिया ने बातचीत शुरू की—
“जीजू, रास्ते में ट्रैफिक बहुत था?”
“ऑफिस में काम ज़्यादा रहता होगा ना?”
“आपको घूमना पसंद है?”
अमित बस धीरे से जवाब देते—
“हाँ।”
“ठीक ही रहता है।”
“कभी-कभी।”
रिया का मन बुझने लगा।
“इतने चुप क्यों रहते हैं ये?”
वह सोचने लगी—
“दीदी ने हीरो समझा रखा है, पर ये तो बिल्कुल फीके हैं।”
कुछ देर बाद वह अमित की माँ के पास बैठ गई।
धीरे से बोली—
“आंटी, जीजू ऐसे ही कम बोलते हैं क्या?”
आंटी मुस्कुरा दीं—
“हाँ बेटा, बचपन से। शब्द बचाकर रखते हैं।”
रिया ने बिना सोचे कह दिया—
“मुझे तो ऐसे लोग बोरिंग लगते हैं।”
आंटी ने प्यार से कहा—
“बेटा, हर इंसान अपने जज़्बात ज़ाहिर करने का तरीका अलग रखता है।
कोई शब्दों में अपना प्यार जताता है,
तो कोई बिना बोले, अपने कामों से।”
रिया ने सिर हिला दिया, पर समझ नहीं आई।
समय बीत गया।
तीन साल निकल गए।
अब उसी घर में हलचल थी—
क्योंकि रिया की शादी तय हो गई थी।
घर में जैसे कामों की लाइन लग गई—
कार्ड, हलवाई, कपड़े, मेहमान।
सब परेशान थे।
और सबसे ज़्यादा व्यस्त इंसान—
अमित।
वो कभी पंडाल में खड़े होकर मज़दूरों को समझाते,
कभी पापा जी के साथ बाज़ार जाते,
कभी माँ को दवाइयों की याद दिलाते।
किसी को बोलते नहीं—
पर हर काम खुद आगे बढ़कर करते।
एक दिन रिया बाज़ार से लौटी।
देखा—
अमित बिजली वाले से कह रहे थे—
“लाइट ऐसी लगाना कि रात में बुज़ुर्गों को दिक्कत न हो।”
फिर हलवाई से—
“मीठा थोड़ा कम रखना, माँ को शुगर है।”
रिया वहीं ठहर गई।
उसकी आँखें भर आईं।
उसे याद आया—
तीन साल पहले का वो “बोरिंग” इंसान।
आज वही इंसान
पूरे घर की रीढ़ बना हुआ था।
रात को रिया अपने कमरे में बैठी थी।
आँसू चुपचाप गिर रहे थे।
कविता अंदर आई—
“अरे, अभी से रोने लगी?”
रिया ने भर्राई आवाज़ में कहा—
“दीदी… मैंने जीजू को कितना गलत समझा था।
वो बोलते नहीं…
पर सबका ख्याल सबसे ज़्यादा वही रखते हैं।”
कविता मुस्कुरा दी—
“मैं जानती थी, एक दिन तू समझ जाएगी।”
रिया बोली—
“आज समझ आया…
रिश्ते आवाज़ से नहीं,
जिम्मेदारी से निभाए जाते हैं।”
नीचे से अमित की आवाज़ आई—
“रिया, कल की लिस्ट दे देना…
अगर कुछ छूट गया हो तो अभी देख लेंगे।”
रिया के चेहरे पर सुकून उतर आया।
उसने मन ही मन कहा—
“जो कम बोलते हैं,
वही सबसे गहरा साथ देते हैं।”
और उस दिन
रिया ने जीवन की एक बड़ी सीख सीख ली—
“इंसान की पहचान उसके कहे हुए शब्दों से नहीं,
बल्कि उसके निभाए हुए साथ से होती है।”

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