कटी हुई चुनरी और भाभी का आँचल
सुबह का समय था।
आँगन में तुलसी के पास धूप उतर आई थी।
घर के कोने में रखी पुरानी सिलाई मशीन से
धीमी–धीमी ट्र्र… ट्र्र… की आवाज़ आ रही थी।
सीमा मशीन पर बैठी थी।
कमर सीधी नहीं हो पा रही थी,
पेट पर हाथ रख-रखकर कभी रुकती, कभी फिर सिलाई में लग जाती।
चार महीनों की गर्भवती थी,
लेकिन घर की ज़िम्मेदारियों ने
उसे माँ बनने से पहले ही
सबकी माँ बना दिया था।
उसका पति मोहन
एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी करता था।
तनख्वाह उतनी नहीं थी
कि सपने आराम से देखे जा सकें।
मोहन की छोटी बहन पायल
कॉलेज के आख़िरी साल में थी।
माँ–बाप बचपन में ही चले गए थे।
पायल के लिए “माँ” का मतलब
सिर्फ़ सीमा था।
तभी पायल तैयार होकर आई।
“भाभी, मैं कॉलेज जा रही हूँ।
आप आज बिल्कुल काम मत करना।
मैं लौटकर सब कर लूँगी।”
सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“अरे पायल, मेरी फिक्र मत करो।
बस पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ।”
पायल की आँखें भर आईं।
“भाभी…
आप न होतीं तो मैं शायद टूट जाती।
आपने कभी मुझे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी।”
इतने में मोहन बोला—
“अरे, मेरी भी थोड़ी तारीफ़ कर दो।”
तीनों हँस दिए,
लेकिन सीमा के दिल में
चिंताओं का सन्नाटा था।
एक छोटा सपना...
शाम को पायल बोली—
“भाभी, कल कॉलेज में गेट-टुगेदर है।
मुझे स्टेज पर कविता पढ़नी है।”
सीमा की आँखें चमक उठीं।
“अरे वाह!
पर पहनोगी क्या?”
पायल चुप हो गई।
“वही पुराना सूट…”
सीमा समझ गई।
रात को उसने मोहन से कहा—
“अगर थोड़े पैसे होते
तो पायल को नया सूट दिला देते।”
मोहन ने कुछ नहीं कहा।
बस सिर झुका लिया।
उसकी ख़ामोशी ही सब कुछ कह रही थी।
“सीमा…
मैं चाहता हूँ, लेकिन चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रहा,”
उसकी आवाज़ भारी हो गई।
उस रात सीमा की आँखों में नींद नहीं आई।
वह करवटें बदलती रही,
दिल में एक ही दर्द थी—
क्या सच में माँ बनने से पहले
हर सपने को कुर्बान करना पड़ता है?
सुबह होते ही वह फिर सिलाई मशीन पर बैठ गई।
आज उसने सामान्य से कहीं ज़्यादा कपड़े सिले।
कमर में तेज़ दर्द उठा,
आँखों से आँसू छलक पड़े,
लेकिन उसके हाथ नहीं रुके।
शाम को जब पायल घर लौटी,
तो सीमा ने चुपचाप उसके हाथ में
एक सादा-सा नया सूट रख दिया।
पायल फूट-फूटकर रो पड़ी।
“भाभी…
आपने अपने बच्चे का हक़ काटकर
मुझे खुश किया है।”
सीमा ने उसे गले से लगा लिया।
“माँ बनना तो बाद में है,
पहले तुम्हारी भाभी हूँ।”
रिश्ता और अपमान...
कुछ महीनों बाद पायल के लिए एक रिश्ता आया।
लड़का स्वभाव से ठीक था,
लेकिन उसकी माँ की बातें दिल को चुभने वाली थीं।
बातों-बातों में उसने साफ़ शब्दों में कह दिया—
“दहेज में दो लाख रुपये और एक गाड़ी चाहिए।”
मोहन ने सिर झुकाकर,
बहुत ही विनम्रता से उत्तर दिया—
“बहन जी, हम इतना देने में असमर्थ हैं।”
इतना सुनते ही लड़के वालों का स्वर बदल गया।
उन्होंने ताने कसते हुए कहा—
“आजकल बिना खर्च किए अच्छे रिश्ते नहीं मिलते।”
यह कहकर वे लोग घर से उठकर चले गए।
उनके जाते ही पायल की आँखों से
आँसुओं का बाँध टूट गया।
वह दौड़कर सीमा से लिपट गई और सिसकते हुए बोली—
“भाभी…
क्या हमारी गरीबी इतनी बड़ी गलती है
कि हमें अच्छा रिश्ता भी नसीब नहीं होता?”
सीमा का कलेजा काँप उठा।
उसने पायल को कसकर अपने सीने से लगाया,
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दृढ़ स्वर में कहा—
“नहीं पायल,
गरीबी कभी गुनाह नहीं होती।
गुनाह तो लालच होता है,
जो इंसान की इंसानियत छीन लेता है।”
जब प्यार दरवाज़ा खटखटाए...
कुछ समय बाद
पायल की ज़िंदगी में आदित्य आया।
सादा स्वभाव,
सच्चा दिल,
और नज़रों में सम्मान।
उसने किसी शर्त, किसी माँग के बिना
सीधे रिश्ता भेज दिया।
घर में उम्मीद की रोशनी फैल गई।
सगाई की तारीख़ तय हो गई।
लेकिन सगाई वाले दिन
आदित्य की भाभी की नज़र
पायल के लहंगे पर जा टिकी।
उसने होंठ सिकोड़ते हुए कहा—
“इतना साधारण लहंगा?
लोग क्या कहेंगे?”
सीमा का दिल जैसे सुलग उठा।
अपनी ननद की आँखों में
उसने अपमान की नमी देख ली।
उसने आवाज़ को शांत रखा,
लेकिन शब्दों में हिम्मत थी—
“शादी में मेरी ननद
दस लाख का लहंगा पहनेगी।”
यह सुनते ही पायल घबरा गई।
वह धीरे से बोली—
“भाभी…
हम इतना कहाँ से लाएँगे?”
सीमा ने उसे पास खींच लिया,
माथे पर प्यार से चुम्बन दिया और कहा—
“माँ कभी यह नहीं बताती
कि इंतज़ाम कैसे होते हैं।
वह बस कर देती है…
क्योंकि उसे करना आता है।”
कटी हुई चुनरी...
एक दिन बाज़ार में घूमते हुए
उनकी नज़र एक बड़े शोरूम के कोने पर पड़ी।
वहाँ एक लहंगा चुपचाप टंगा था —
जैसे अपनी किस्मत पर उदास हो।
नीचे से वह थोड़ा कटा हुआ था,
मानो किसी की लापरवाही ने
उसकी सुंदरता को घायल कर दिया हो।
सीमा ने दुकानदार से पूछा तो
वह हल्की उदासी के साथ बोला—
“बहन जी, यह लहंगा पूरे दस लाख का था।
लेकिन अब नीचे से कट जाने के कारण
कोई इसे खरीदने को तैयार नहीं है।
अगर आप चाहें तो
इसे पाँच लाख में ले जा सकती हैं।”
सीमा ने उस लहंगे को ध्यान से देखा।
उसे ऐसा लगा,
मानो वह किसी घायल लड़की को देख रही हो —
जो टूटी तो है,
पर अब भी सुंदर बनने की आस लिए खड़ी है।
वह धीरे से बोली—
“अगर मैं इसे फिर से सुंदर बना दूँ…?”
दुकानदार पहले तो हँस पड़ा,
फिर उसकी आँखों में झाँककर बोला—
“अगर सच में बना पाईं,
तो यह लहंगा आपका हुआ।”
उस रात सीमा ने
अपनी नींद,
अपनी थकान,
अपनी सारी तकलीफ़
एक–एक टांके में पिरो दी।
कमर दर्द से उसका शरीर काँप रहा था,
पेट पर हाथ रखकर
वह अपने अजन्मे बच्चे से फुसफुसाई—
“थोड़ा मेरा साथ देना बेटा…
आज तुम्हारी बुआ की इज़्ज़त
मेरे इन हाथों में है।”
आँचल की जीत...
शादी वाले दिन
जब पायल मंडप की ओर बढ़ी,
तो पल भर को
हर नज़र वहीं ठहर गई।
उसके लहंगे की चमक नहीं,
उसमें बुनी गई मेहनत,
त्याग और ममता
सबको चुप करा गई।
आदित्य की भाभी,
जो कभी तानों से नहीं थकती थी,
आज निःशब्द खड़ी रह गई।
धीमे स्वर में बस इतना पूछ सकी—
“इतना सुंदर लहंगा…
कहाँ से लिया?”
सीमा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
“ये कभी कटी हुई चुनरी थी…
माँ के आँचल ने इसे फिर से पूरा कर दिया।”
आज वही शोरूम,
जो कभी उसे अनदेखा करता था,
उसके हुनर का क़द्रदान बन गया।
सीमा को वहाँ से
नियमित काम मिलने लगा।
पायल सम्मान,
आत्मविश्वास
और प्रेम के साथ विदा हुई।
और उस दिन सीमा ने
दिल से समझ लिया—
रिश्ते खून से नहीं,
त्याग से बनते हैं।

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