सर्द रात और नई शुरुआत
सर्दियों की वह रात कुछ ज़्यादा ही चुप थी।
आसमान पर धुँध की पतली चादर तनी हुई थी और गलियों में जलती पीली स्ट्रीट लाइटें भी जैसे ठंड से काँप रही थीं। दूर कहीं किसी घर से जलती लकड़ियों की महक हवा में घुलकर वातावरण को और भी उदास बना रही थी।
घर के भीतर, खिड़की के पास खड़ी थी अनु।
उसने दोनों हाथों से शॉल को कसकर पकड़ रखा था, पर ठंड सिर्फ़ उसके तन में नहीं थी—
ठंड तो उसके मन में जम चुकी थी।
दीवार पर टँगी घड़ी की सुई धीरे-धीरे सात की ओर बढ़ रही थी।
उसे पता था, राहुल अब किसी भी पल घर लौटेगा।
वही राहुल…
जिसके लिए उसने अपना सब कुछ छोड़ दिया था।
अनु को अचानक कॉलेज के दिन याद आ गए।
“तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगे न?”
लाइब्रेरी के एक कोने में बैठे-बैठे उसने डरते हुए पूछा था।
राहुल हँसा था—
“अगर तुम साथ हो, तो मैं दुनिया से भी लड़ लूँगा।”
उस दिन अनु को लगा था जैसे उसे पूरी ज़िंदगी मिल गई हो।
प्रेम से विवाह तक...
राहुल एक साधारण परिवार से था।
अनु के घरवाले चाहते थे कि वह किसी बड़े अफ़सर से शादी करे।
लेकिन अनु अड़ी रही।
आँसू सहे, नाराज़गी झेली, चुप्पी ओढ़े रही।
आख़िरकार दोनों का विवाह हुआ।
छोटा-सा घर था,
सीमित सामान,
लेकिन दिलों में सपनों का अंबार।
सुबह की चाय,
शाम की बालकनी,
और रात की लंबी-लंबी बातें—
वक़्त जैसे ठहर गया था।
फिर वक़्त बदला।
राहुल को नौकरी मिल गई।
नई दोस्तियाँ बनीं।
ऑफ़िस के बाद पार्टियाँ होने लगीं,
और देर रात लौटने की आदत पड़ गई।
“आज मत जाओ…”
अनु ने कई बार कहा।
“बस आज आख़िरी बार…”
राहुल हर बार यही बोलता।
लेकिन वह आख़िरी बार कभी आख़िरी नहीं हुआ।
घर में बातें कम होने लगीं।
ख़ामोशी बढ़ती चली गई।
अनु ने शिकायत नहीं की।
बस इंतज़ार करती रही।
नया साल, पुरानी उदासी...
इकत्तीस दिसंबर की शाम थी।
बाहर लोग हँस रहे थे,
मोबाइल पर नए साल की बधाइयों के संदेश आ रहे थे।
लेकिन अनु को सब कुछ बेकार लग रहा था।
“नया साल…”
उसने बुदबुदाकर कहा—
“मेरे लिए तो सब कुछ वही है।”
उधर पार्टी में तेज़ म्यूज़िक बज रहा था।
दोस्त नाच रहे थे, जश्न मना रहे थे।
लेकिन राहुल का मन कहीं और था।
अनु का चेहरा बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था—
चुप, थका हुआ, उदास।
उसे शादी का वह दिन याद आ गया,
जब उसने वादा किया था—
“मैं तुम्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने दूँगा।”
उसका सीना भारी हो गया।
राहुल अचानक उठ खड़ा हुआ।
“मुझे जाना होगा।”
दोस्तों ने रोका,
लेकिन वह नहीं रुका।
सच का सामना...
घर के दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई।
अनु चौंकी।
दरवाज़ा खोला तो सामने राहुल खड़ा था—
थका हुआ, शर्मिंदा, लेकिन सच्चा।
“मुझसे गलती हो गई…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“मैं तुम्हें समय नहीं दे सका,
सम्मान नहीं दे सका।”
अनु चुप रही।
“अगर तुम चाहो,
तो मैं आज से सब बदल दूँगा।
और अगर तुम कहो कि देर हो गई है…”
तो मैं उसे भी स्वीकार कर लूँगा।”
अनु की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैं बदलाव नहीं माँग रही थी, राहुल,”
उसने धीरे से कहा,
“मैं बस तुम्हें वापस चाहती थी।”
नया साल, नई शुरुआत...
राहुल ने आगे बढ़कर अनु का हाथ थाम लिया।
“तो फिर यही मेरा नए साल का संकल्प है—
मैं तुम्हारा साथ कभी हल्के में नहीं लूँगा।”
बाहर आसमान में पटाखे फूट रहे थे,
रंगीन रोशनी से रात चमक उठी थी।
और अंदर—
टूटी हुई खामोशियों के बीच
दो दिल एक बार फिर जुड़ रहे थे।
सर्द रात में
एक घर दोबारा गरम हो गया था।
सीख:
रिश्ते शब्दों से नहीं, समय और सम्मान से निभते हैं।
जो अपने साथी को आज नज़रअंदाज़ करता है, वह कल उसे खो सकता है।

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