जब गोद खाली रह जाती है

A middle-aged Indian woman sitting quietly in a sunlit courtyard, expressing deep emotions of longing and compassion, with soft morning light and a calm, reflective atmosphere.


सुबह का सूरज आँगन में उतर आया था,

लेकिन शारदा देवी के भीतर अँधेरा था।


आज उनका छप्पनवाँ जन्मदिन था।


घर में सब कुछ था—

फूल, मिठाइयाँ, रिश्तेदारों की आवाज़ें,

लेकिन उनकी गोद…

बरसों से वैसी ही खाली थी।


वे खिड़की के पास खड़ी होकर

पड़ोस की छत देख रही थीं।

वहाँ एक बच्चा रो रहा था,

माँ उसे सीने से लगाकर चुप करा रही थी।


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


“काश… कोई मुझे भी ऐसे चुप कराने के लिए

माँ कहकर पुकारता…”


मन का सन्नाटा...


वे कमरे में आईं।

अलमारी खोली।

अंदर अब भी वे छोटे-छोटे कपड़े रखे थे—

जो कभी पहने नहीं गए।


हर जन्मदिन पर

वे खुद से एक ही सवाल पूछती थीं—

“क्या मेरी कमी इतनी बड़ी है

कि भगवान ने मुझे माँ बनने लायक नहीं समझा?”


लेक्चरर होते हुए भी

आज वे खुद को सबसे अनपढ़ समझ रही थीं—

क्योंकि मातृत्व का पाठ

वे कभी पढ़ ही नहीं पाईं।


बीते साल...


शादी के शुरुआती दिनों में

हरिनाथ जी ने हँसते हुए कहा था—

“हमारा बच्चा तुमसे संस्कृत सीखेगा

और मुझसे गणित।”


शारदा देवी मुस्कुरा दी थीं।


लेकिन साल गुजरते गए,

और हँसी सवालों में बदल गई।


डॉक्टर, दवाइयाँ, पूजा,

हर उम्मीद एक-एक कर टूटती गई।


एक दिन उनकी सास ने कहा—

“बेटी, शायद भगवान ने तुम्हारे भाग्य में

माँ बनना लिखा ही नहीं।”


उस दिन शारदा देवी पहली बार

अंदर ही अंदर मर गई थीं।


अनकहा दर्द...


कॉलेज में बच्चे उन्हें घेर लेते—

“मैडम, आप इतनी केयर करती हैं

जैसे हमारी माँ हों।”


वे मुस्कुरा देतीं,

लेकिन अंदर से चीख उठतीं—


“अगर मैं माँ हूँ

तो मेरी गोद क्यों खाली है?”


रात को

हरिनाथ जी सो जाते,

और वे तकिये से लिपटकर

खामोशी से रोतीं।


जन्मदिन का सवाल...


शाम को केक काटा गया।


हरिनाथ जी ने पूछा—

“क्या गिफ्ट चाहिए?”


शारदा देवी की आवाज़ काँप गई—

“मुझे कोई ऐसा चाहिए

जो मुझे बस एक बार

माँ कह दे…”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


वह बच्ची...


कुछ दिन बाद

वे झुग्गी बस्ती पहुँचीं।


एक दुबली-सी बच्ची

उनकी साड़ी पकड़कर बोली—

“आप रोज़ आओगी न?”


उस दिन

शारदा देवी को लगा

जैसे किसी ने उनकी उँगली थाम ली हो।


जब बच्ची ने पहली बार कहा—

“अम्मा…”


तो शारदा देवी वहीं बैठकर

बिलख पड़ीं।


अब उनकी सुबह

बच्चों की आवाज़ से होती।


कोई बुखार में

उनकी गोद चाहता,

कोई डर में

उनका आँचल।


हरिनाथ जी एक दिन बोले—

“शारदा,

शायद भगवान ने तुम्हें माँ नहीं,

माँओं की छाँव बनाया है।”


शारदा देवी मुस्कुरा दीं—

आँसुओं के बीच।


आज उनका जन्मदिन

केक से नहीं,

बच्चों के गले लगने से मनाया गया।


गोद अब भी खाली नहीं थी—

वह दिल से भर चुकी थी।


और शारदा देवी समझ गईं—


माँ बनने के लिए

कोख नहीं,

किसी टूटे दिल को सहारा देना काफी होता है।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.