बराबरी का घर
सर्दियों की धूप आँगन में फैली हुई थी। घर के बाहर आम के पेड़ पर रंगीन झालरें टंगी थीं। आज घर में खुशी का दिन था — सुनीता और अजय की शादी की सालगिरह।
पूरे परिवार को बुलाया गया था। रिश्तेदार, पड़ोसी, हँसी-मजाक… सब कुछ अच्छा चल रहा था।
घर की मालकिन थीं — सावित्री देवी। उम्र साठ के करीब, स्वभाव थोड़ा सख्त, लेकिन दिल से बुरी नहीं।
उनकी दो बेटियाँ थीं — बड़ी बेटी काव्या और छोटी बेटी रानी।
काव्या का विवाह शहर के अमीर व्यापारी परिवार में हुआ था। बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, हर त्यौहार पर महंगे कपड़े।
रानी का विवाह पास के गांव में एक स्कूल शिक्षक से हुआ था। साधारण जिंदगी, सीमित आय, पर सुकून भरा घर।
समारोह की तैयारी...
सावित्री देवी सुबह से ही कमरे में बैठी कुछ तैयार कर रही थीं। उनके सामने दो गिफ्ट पैकेट रखे थे।
एक बड़ा डिब्बा था — सुनहरे रंग के चमकदार कागज़ में सलीके से लिपटा हुआ, ऊपर रिबन भी बंधा था।
दूसरा पैकेट छोटा था — साधारण भूरे कागज़ में लिपटा, बिना किसी सजावट के।
सुनीता पानी लेने कमरे में आई तो उसकी नज़र अनजाने में उन पैकेटों पर पड़ गई। वह कुछ पल उन्हें देखती रही, फिर हल्के स्वर में पूछ बैठी —
“माँजी… ये दो अलग-अलग पैकेट क्यों?”
सावित्री देवी ने पहले तो बात टालने की कोशिश की, पर फिर धीमे से बोलीं —
“अरे बहू, काव्या के ससुराल वाले बहुत देखते-परखते हैं। वहाँ छोटी-सी बात भी चर्चा बन जाती है। उसकी इज्जत बनी रहे, इसलिए उसे थोड़ा अच्छा देना पड़ेगा।”
सुनीता ने शांत भाव से अगला सवाल किया —
“और रानी?”
सावित्री देवी ने सहजता से कहा —
“अरे उसका घर सीधा-सादा है। वहाँ इतना दिखावा कौन करता है? उसे इतना सब देने की जरूरत नहीं।”
कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
सुनीता ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके भीतर जैसे कोई सवाल जाग उठा था —
क्या इज्जत सच में पैकेट के आकार से तय होती है?
या माँ का दिल भी कभी-कभी तराज़ू पर तौलने लगता है?
वह चुपचाप बाहर आ गई, पर उसके मन में हलचल शुरू हो चुकी थी।
दोनों बेटियाँ आती हैं...
दोपहर होते-होते काव्या आ गई। महँगी रेशमी साड़ी, ऊँची सैंडल और हाथ में छोटा-सा गिफ्ट बैग। आते ही उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“मम्मी, मैं ज्यादा देर नहीं रुक पाऊँगी। शाम को एक पार्टी में जाना है।”
उसकी आवाज़ में अपनापन कम और औपचारिकता ज्यादा थी। वह ड्रॉइंगरूम के सोफे पर बैठ गई और मोबाइल देखने लगी।
थोड़ी देर बाद रानी भी पहुँची। साधारण-सा सूट पहने, हाथ में स्टील का बड़ा डिब्बा संभाले हुए। अंदर आते ही उसने मुस्कुराकर माँ के पैर छुए और बोली,
“माँ, मैंने अपने हाथ से गाजर का हलवा बनाया है। आपको और पापा को बहुत पसंद है ना…”
यह कहकर वह सीधे रसोई में चली गई। बिना किसी दिखावे के उसने चुन्नी समेटी, हाथ धोए और चुपचाप काम में लग गई—कभी प्लेटें सजाने लगी, कभी चाय चढ़ा दी। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन मन में सच्ची लगन और अपनापन साफ झलक रहा था।
सच सामने आता है...
केक काटने के बाद माहौल में अब भी मिठास घुली हुई थी। तालियों की आवाज़ धीरे-धीरे थम चुकी थी। तभी सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए दोनों बेटियों को अपने पास बुलाया।
उन्होंने मेज़ पर रखे दो पैकेट उठाए।
एक बड़ा, चमकदार रैपर में सजा हुआ।
दूसरा छोटा, सादे कागज़ में लिपटा हुआ।
उन्होंने बड़ा डिब्बा काव्या की ओर बढ़ाया और छोटा पैकेट रानी को थमा दिया।
रानी ने बिना कुछ सोचे मुस्कुराकर कहा,
“धन्यवाद माँ…”
उसने पैकेट वैसे ही अपने पास रख लिया, जैसे उसके लिए बस माँ का आशीर्वाद ही काफी हो।
तभी सुनीता ने धीमे लेकिन साफ़ स्वर में कहा,
“माँजी… अगर बुरा न मानें तो एक बात कहूँ? क्यों न दोनों गिफ्ट यहीं सबके सामने खोल लिए जाएँ? खुशी का मौका है, सब देखेंगे तो अच्छा लगेगा।”
सावित्री देवी एक पल को रुक गईं। चेहरे पर हल्की-सी असहजता उभर आई, पर अब मना करने का कोई कारण भी नहीं था। उन्होंने धीमे से कहा,
“हाँ… खोल लो।”
सबकी निगाहें दोनों बहनों पर टिक गईं।
सबसे पहले काव्या ने अपना बड़ा डिब्बा खोला। अंदर मखमली डिब्बी में सजी एक सोने की सुंदर चेन चमक रही थी। रोशनी पड़ते ही उसकी चमक और उभर आई। कुछ रिश्तेदारों ने धीमे से “वाह” भी कहा।
फिर रानी ने अपना छोटा पैकेट खोला। उसमें चांदी की एक साधारण-सी पायल रखी थी। न कोई मखमली डिब्बी, न खास सजावट — बस सादगी।
कमरे में अचानक हल्की-सी खामोशी छा गई।
काव्या के होंठों पर एक क्षणिक मुस्कान आ गई, जैसे उसे इसमें कुछ असामान्य न लगा हो — जैसे यह तो होना ही था।
रानी ने बस पायल को हाथ में उठाया। उसकी उंगलियाँ उसे हल्के से सहलाने लगीं। उसने सिर झुकाकर मुस्कुराते हुए कहा,
“बहुत सुंदर है माँ…”
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी — सिर्फ आदर था।
लेकिन उस खामोशी में बहुत कुछ अनकहा तैर रहा था।
बहू की बात...
सुनीता धीरे-धीरे आगे बढ़ी। कमरे में हल्की खामोशी थी।
“माँजी… अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूँ?”
सावित्री देवी ने थोड़ा असहज होकर उसकी ओर देखा, फिर धीमे से सिर हिला दिया।
“कहो बहू…”
सुनीता ने विनम्र लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,
“आप हमेशा कहती हैं कि काव्या दीदी और रानी दीदी — दोनों आपकी आँखों का तारा हैं। फिर आज एक को सोने की चेन और दूसरी को चाँदी की पायल क्यों?”
सावित्री देवी ने तुरंत सफाई दी,
“अरे बहू, तू समझती क्यों नहीं? काव्या का ससुराल बड़ा है। वहाँ लोगों की नजर रहती है। उसकी इज्जत बनी रहे, इसलिए…”
सुनीता ने बीच में टोके बिना बात पूरी होने दी। फिर शांत स्वर में बोली,
“माँजी, अगर बड़ा घर ही मापदंड है, तो फिर तो रानी दीदी को ज्यादा मिलना चाहिए। उनके घर में सुविधाएँ कम हैं। लेकिन मैं यह भी नहीं कह रही कि किसी को ज्यादा दें। मैं तो बस इतना कह रही हूँ — जो भी दें, बराबर दें।”
रानी घबरा गई।
“भाभी, रहने दीजिए ना… मुझे सच में कोई शिकायत नहीं है।”
लेकिन सुनीता अब रुकने वाली नहीं थी। उसकी आवाज़ में कठोरता नहीं थी, बस सच्चाई थी।
“माँजी, आपने गौर किया? काव्या दीदी खाली हाथ आई हैं। शायद व्यस्त रही होंगी, मैं समझ सकती हूँ। लेकिन रानी दीदी अपने हाथ से हलवा बनाकर लाई हैं। उन्होंने समय निकाला, मेहनत की… सिर्फ इसलिए कि घर में मिठास रहे। अब आप ही बताइए — किसने ज्यादा दिया? पैसे से नहीं… दिल से।”
कमरे में गहरी खामोशी छा गई।
सावित्री देवी की आँखें झुक गईं। उनके चेहरे पर पछतावे की हल्की रेखा उभर आई। शायद पहली बार उन्होंने अपनी ही सोच को आईने में देखा था।
निर्णय...
कुछ क्षण तक कमरे में गहरा सन्नाटा छाया रहा। सावित्री देवी की नजरें झुकी हुई थीं, जैसे वे अपने ही फैसले को मन-ही-मन तौल रही हों। अचानक उन्होंने धीमे से पल्लू संभाला और बिना कुछ कहे अंदर अपने कमरे की ओर चली गईं।
सबकी निगाहें दरवाज़े की तरफ टिक गईं।
कुछ पल बाद वे वापस लौटीं। उनके हाथ में एक छोटा-सा लाल मखमली डिब्बा था। वह वही डिब्बा था जिसे उन्होंने बरसों से अपनी अलमारी में संभालकर रखा था — अपने लिए।
वे सीधे रानी के सामने आकर रुक गईं। उनकी आवाज़ पहले जैसी सख्त नहीं थी, बल्कि हल्की-सी काँप रही थी।
“बेटी…” उन्होंने डिब्बा आगे बढ़ाते हुए कहा,
“आज मैं अपनी गलती सुधार रही हूँ। माँ का दिल बराबर होना चाहिए। मैंने लोगों के डर से फैसला लिया… लेकिन डर के कारण न्याय नहीं बदलना चाहिए।”
रानी हैरान थी। उसने धीरे से डिब्बा खोला। अंदर सोने की सुंदर चेन रखी थी — बिलकुल वैसी ही जैसी काव्या को दी गई थी।
रानी की आँखें नम हो गईं। उसके होंठ काँपे।
“माँ… मुझे गहनों की ज़रूरत नहीं है। मुझे तो बस आपका प्यार चाहिए… आपका भरोसा चाहिए।”
सावित्री देवी की आँखों से भी आँसू ढलक पड़े। उन्होंने बिना कुछ कहे रानी को अपनी बाँहों में भर लिया।
“पगली,” उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“प्यार तो हमेशा बराबर था… बस मैं दिखा नहीं पा रही थी। आज से इस घर में तुलना नहीं होगी। न बड़ा, न छोटा। दोनों मेरी बेटियाँ हैं… और दोनों बराबर हैं।”
कमरे के एक कोने में खड़ी काव्या यह सब देख रही थी। उसके चेहरे की कठोरता धीरे-धीरे पिघल रही थी। पहली बार वह बिना कुछ बोले खड़ी रही। शायद उसे भी महसूस हो रहा था कि रिश्तों की असली कीमत सोने-चांदी से नहीं, संवेदना और सम्मान से तय होती है।
उस दिन उस घर में सिर्फ एक गहना नहीं बाँटा गया था —
एक माँ का दिल भी बराबर हो गया था।
शाम ढल चुकी थी। मेहमान विदा हो गए थे। आँगन में सन्नाटा था, बस कहीं-कहीं बर्तनों की हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
सावित्री देवी धीरे-धीरे चलकर बरामदे में आईं, जहाँ सुनीता दीयों की लौ ठीक कर रही थी। कुछ क्षण चुप खड़ी रहीं, फिर बोलीं—
“बहू… आज तूने सच में मेरी आँखें खोल दीं। मैं लोगों के डर में उलझकर न्याय करना भूल गई थी।”
उनकी आवाज़ में पछतावा था, लेकिन साथ ही हल्कापन भी।
सुनीता ने आदर से सिर झुकाया और मुस्कुराकर कहा—
“माँजी, घर तभी घर कहलाता है, जब उसमें सबको बराबर मान दिया जाए। जहाँ भेद शुरू होता है, वहाँ दूरी भी शुरू हो जाती है।”
आँगन में रखा दीया अब शांत और स्थिर लौ के साथ जल रहा था, जैसे वह भी इस नए संकल्प का साक्षी हो।
उस रात सावित्री देवी ने मन ही मन एक निर्णय लिया—
अब इस घर में किसी बेटी के साथ बड़ा-छोटा नहीं होगा। न अमीरी का फर्क, न हालात का।
क्योंकि आखिरकार सच यही है—
रिश्ते धन से नहीं, सम्मान और समान व्यवहार से टिकते हैं।

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