रोने का समय किसके पास था

 

Young Indian woman cooking food in kitchen during mourning ceremony while children sit beside her in traditional home setting


आज घर में ससुर जी का तेरहवाँ था।

सुबह से ही आंगन में दरी बिछी थी। बाहर कुर्सियाँ लगी थीं। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था।


बड़ी बहू संगीता सफेद साड़ी में सिर ढके आँगन के एक कोने में चुपचाप बैठी थी।


जो भी रिश्तेदार आता, पहले उसके पास बैठता, उसके हाथ थामकर सांत्वना देता, दो पल दुख बाँटता और फिर धीरे-धीरे उठकर आगे बढ़ जाता।

छोटी बहू राधिका रसोई में थी।


घर के दोनों बेटे पंडित जी के साथ पूजा में बैठे थे।

ननद रीमा भी आई हुई थी और बड़ी भाभी के पास बैठी थी।


राधिका के हिस्से में क्या आया था?


पूरे घर की जिम्मेदारी।


कभी पंडित जी आवाज़ लगाते —

“बहू, ज़रा घी भिजवा देना।”


कभी बाहर टेंट वाला कहता —

“पानी की व्यवस्था कम पड़ रही है।”


हलवाई रसोई के दरवाज़े से झाँक कर बोल देता —

“चीनी खत्म हो गई है, जल्दी भेज दीजिए।”


और तभी कोई रिश्तेदार पुकार देता —

“बहू, एक कप चाय मिल जाती क्या?”


रसोई से आँगन…

आँगन से बरामदे…

बरामदे से मुख्य दरवाज़े तक —


राधिका बिना रुके भागती फिर रही थी।

उसके कदम थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।


उसका सात साल का बेटा आयुष और उसकी जेठानी का पाँच साल का बेटा चिंटू, दोनों ही बार-बार रसोई में आकर उसके पास चुपचाप बैठ जाते।

पिछले बारह दिनों से घर में सादा खाना बन रहा था।

उबली दाल, फीकी सब्ज़ी, सूखी रोटी।


बच्चे पहले तो खा लेते थे, पर अब उनका मन भर गया था।


दोपहर के डेढ़ बज रहे थे।

ब्राह्मण भोज अभी बाकी था। घर के मुख्य लोग तो पूजा के बाद ही खाना खा सकते थे।


आयुष ने धीरे से माँ का पल्लू पकड़ा —

“मम्मा, बहुत भूख लगी है…”


राधिका ने जल्दी से दूध गरम किया।

पर बच्चे ने सिर हिला दिया।


“कुछ और दे दो ना…”


“क्या खाओगे बेटा?”

“मम्मा… आलू के पराठे…”

चिंटू भी बोला, “हाँ चाची, पराठा बना दो ना।”


राधिका एक पल को रुक गई।

आज के दिन पराठा?

अगर किसी ने देख लिया तो?


पर बच्चों के चेहरे देख कर उसका दिल पिघल गया।

सुबह से उन्होंने कुछ ठीक से खाया भी नहीं था।


उसने चुपचाप दरवाज़ा आधा बंद किया।

आटा गूंथकर तवा चढ़ा दिया।


तवे पर जैसे ही घी पड़ा, हल्की सी खुशबू उठी।

और खुशबू तो दीवार नहीं मानती… वो बाहर तक चली गई।


तभी ननद रीमा तेज़ कदमों से रसोई में आई।


“भाभी! ये क्या बना रही हो?”


राधिका घबरा गई।

“बच्चों के लिए… पराठा…”


“आपको शर्म नहीं आती? आज पापा का तेरहवाँ है और आप यहाँ घी वाला पराठा बना रही हैं? लोग क्या कहेंगे?”


राधिका ने धीरे से कहा,

“रीमा, बच्चे सुबह से भूखे हैं। पूजा खत्म होते-होते तीन बज जाएंगे…”


इतने में बड़ी बहू संगीता भी आ गई।


“राधिका, थोड़ा इंतजार कर लेती। खाना तो बन ही रहा है।”


राधिका की आँखें भर आईं —

“भाभी, बच्चे हैं… कब तक समझाएँ? भूख का क्या करें?”


बाहर बैठी कुछ औरतों की फुसफुसाहट भी शुरू हो गई।


“देखा छोटी बहू को? रोने की बजाय पराठे बना रही है…”

“आजकल की बहुएँ ऐसी ही होती हैं…”


राधिका ने सुना, पर चुप रही।

उसे पता था — जवाब देगी तो बात बढ़ेगी।


इतने में ससुराल की बड़ी ताई जी अंदर आईं।

उन्होंने सब सुन लिया था।


उन्होंने बिना कुछ कहे गैस के पास जाकर तवा देखा।

फिर बच्चों की तरफ देखा जो डरे हुए खड़े थे।


“राधिका, पराठे पलट दे। जल न जाएँ।”


सब चौंक गए।


ताई जी ने रीमा की तरफ देखा —

“बेटी, तेरे पापा गए हैं, हम सबका दुख है। पर क्या बच्चों को भूखा रखेंगे? भूख तो रुकती नहीं।”


रीमा चुप हो गई।


ताई जी ने सबकी तरफ गम्भीर नज़र से देखते हुए कहा —


“जिसके कंधों पर जिम्मेदारी होती है, उसके पास बैठकर रोने का समय नहीं होता। ये राधिका सुबह से एक पल को भी चैन से बैठी है क्या? तुम सब बाहर बैठकर आँसू बहा पा रही हो, क्योंकि ये अंदर रसोई, मेहमान और बच्चों को संभाल रही है।


घर सिर्फ रोने से नहीं चलता…

घर उन हाथों से चलता है जो चुपचाप अपना फर्ज निभाते रहते हैं।”


बड़ी बहू ने सिर झुका लिया।


ताई जी ने बाहर की औरतों की तरफ देखा —

“जिसे जो कहना है, मेरे सामने कहे। दुख दिल में होता है, दिखावे में नहीं।”


पूरा घर शांत हो गया।


राधिका ने प्लेट में दो छोटे पराठे रखे।

बच्चों को दिया।


दोनों ने मुस्कुराकर खाना शुरू किया।


उसी वक्त राधिका की आँखों से चुपचाप आँसू गिर पड़े।

पर इस बार वो शर्म के नहीं थे।

वो राहत के थे।


ताई जी ने उसके सिर पर हाथ रखा —

“बहू, घर वही संभालता है जो चुपचाप जिम्मेदारी निभाता है।”


रसोई में अब पराठे की खुशबू थी।

पर उस खुशबू से ज्यादा सुकून था।


क्योंकि आज किसी ने समझ लिया था —

दुख सिर्फ रोने से नहीं, निभाने से भी जताया जाता है।





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